दफ्तर दरबारी: इस्‍तीफा देने वाले आईएएस के मन में क्‍या, एमपी दोहराएगा यूपी का इतिहास

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जनवरी 2022 में आईएएस बने वरदमूर्ति मिश्रा के इस्‍तीफे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि उनके मन में क्‍या है? समय पूर्व सेवानिवृत्ति लेने वाले वरदमूर्ति मिश्रा क्‍या 2023 में चुनाव मैदान में होंगे? क्‍या उत्‍तर प्रदेश में पद छोड़ कर मंत्री बने आईपीएस असीम अरूण की तरह उनकी किस्‍मत चमकेगी?  कहीं मध्‍य प्रदेश में 2014 का इतिहास तो नहीं दोहराया जाएगा? 

Updated: Jun 19, 2022, 11:22 AM IST

दफ्तर दरबारी: इस्‍तीफा  देने वाले आईएएस के मन में क्‍या, एमपी दोहराएगा यूपी का इतिहास
ias varadmurti mishra

कहते है इतिहास खुद को दोहराता है तो क्‍या मध्‍य प्रदेश में इतिहास दोहराने की तैयारी है? लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जनवरी 2022 में आईएएस बने वरदमूर्ति मिश्रा के इस्‍तीफे के बाद यह सवाल उठ रहा है। समय पूर्व सेवानिवृत्ति लेने वाले वरदमूर्ति मिश्रा क्‍या 2023 में चुनाव मैदान में होंगे? क्‍या उत्‍तर प्रदेश में पद छोड़ कर मंत्री बने आईपीएस असीम अरूण की तरह उनकी किस्‍मत चमकेगी?  कहीं मध्‍य प्रदेश में 2014 का इतिहास तो नहीं दोहराया जाएगा? 

उत्‍तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में आईपीएस असीम अरूण का चुनाव लड़ना चर्चा में रहा था। कानपुर के पुलिस कमिश्नर असीम अरुण ने विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए वीआरएस ले लिया था। वे मध्य प्रदेश की वरिष्ठ आईएएस रश्मि अरुण शमी के भाई हैं और इस कारण उनकी जीत हार पर मध्य प्रदेश के अफसरों की निगाहें भी लगी थीं। असीम अरूण चुनाव जीते और स्‍वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री भी बनाए गए। 

तभी से अंदाजा लगाया जा रहा है कि उत्‍तर प्रदेश का इतिहास मध्‍य प्रदेश में दोहराया जाएगा। यहां के कई पूर्व व वर्तमान अफसरों के चुनाव मैदान में उतरने के कयास लगाए जा रहे हैं। ये कयास पुख्‍ता होते दिखाई दिए जब बीते हफ्ते मध्यप्रदेश में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी वरदमूर्ति मिश्रा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वरदमूर्ति मिश्रा मूल रूप से राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। जनवरी 2022 में ही उन्‍हें प्रमोशन मिला था। वरदमूर्ति मिश्रा ने आईएएस कैडर पाने के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ी थी क्‍योंकि उनके पहले जूनियर अफसरों को आईएएस अवार्ड हो गया था। लड़ कर अपना हक लेने वाले अफसर ने यकायक आईएएस पद छोड़ा तो चर्चा यही हुई कि वे अब चुनाव लड़ेंगे। 

हालांकि, वरदमूर्ति मिश्रा ने अपने पत्‍ते नहीं खोले हैं मगर माना जा रहा है कि वे कांग्रेस से उम्‍मीदवार हो सकते हैं। इसकी वजह प्रदेश कांग्रेस अध्‍यक्ष कमलनाथ से उनकी निकटता है। जब कमलनाथ मुख्यमंत्री थे तब वरदमूर्ति मिश्रा उनके ओएसडी बनाए गए थे। वरदमूर्ति मिश्रा कमलनाथ के गृहक्षेत्र छिंदवाड़ा में छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार और जिला पंचायत सीईओ भी रह चुके हैं। माना जा रहा है कि कांग्रेस से आश्‍वास मिलने के बाद उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा दे दिया है। 

दूसरी तरफ, कुछ आकलन यह है कि वरदमूर्ति मिश्रा बीजेपी का दामन थामेंगे। उन्‍हें बुंदेलखंड में ब्राह्मण राजनीति साधने के लिए मैदान में उतारा जा सकता है। 

इन खबरों से एक आशंका घर कर गई है कि वे कांग्रेस के लिए अगले भागीरथ प्रसाद साबित न हो जाएं। प्रदेश के वरिष्‍ठ आईएएस रहे भागीरथ प्रसाद को 2009 में पहली बार लोकसभा चुनाव में मैदान में उतारा था। हार के बाद भी 2014 में कांग्रेस ने उन पर फिर भरोसा जताया और लोकसभा का टिकट दिया था मगर टिकट की घोषणा के कुछ घंटों बाद ही वे बीजेपी में शामिल हो गए थे। तब कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को प्रत्याशियों की खरीदफरोख्त का मामला बताया था। अब वरदमूर्ति मिश्रा ने इस्‍तीफा दिया है तो बीजेपी नेताओं से उनके संपर्क की खबरें आने लगी हैं। 

वरदमूर्ति मिश्रा चुनाव लड़ेंगे या नहीं और लड़ेंगे तो किस पार्टी से यह तो साफ नहीं है मगर वे लड़ेंगे तो उत्‍तर प्रदेश में अफसर के मैदान में उतरने के इतिहास का मध्‍य प्रदेश में दोहराव होना तय है और यदि कांग्रेस की निकटता को धता बता कर बीजेपी में शामिल होते हैं तो मध्‍य प्रदेश में ही भागीरथ प्रसाद वाला इतिहास दोहराया जाएगा। 

सीनियर आईपीएस से धोखा तो अपना रहनुमा कौन

जिस पर प्रदेश की जनता की सुरक्षा का जिम्‍मा है उसी पुलिस विभाग के सीनियर आईपीएस के नाम पर खुल कर धोखाधड़ी हो तो जनता बचाने वाला रहनुमा कौन हो? अपराधियों के बुलंद हौसले कि उन्‍होंने भोपाल के अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर यानि एसीपी सचिन अतुलकर के नाम से इंटरनेट मीडिया पर फर्जी प्रोफाइल बनाई है और अब तक कई लोगों को शिकार बनाया है। 

सचिन अतुलकर सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं। सोशल मीडिया पर उनके नाम पर बने अकाउंट को लाखों लोग फॉलो करते हैं। खबर है कि एसपी सचिन अतुलकर का सिर्फ इंस्टाग्राम पर ही वेरिफाइड अकाउंट है। फेसबुक और ट्विटर पर कोई वेरीफॉइड अकाउंट नहीं है। लेकिन सोशल मीडिया पर जैसे ही सचिन अतुलकर का नाम डालेंगे, वैसे ही उनके नाम से दर्जनों अकाउंट मिल जाएंगे। ये अकाउंट्स खबरों, फोटो व वीडियो से लगातार अपडेट होते रहते हैं। जिससे लगता है कि यह वाकई में आईपीएस सचिन अतुलकर का ही अकाउंट है। 

इसी गफलत के कारण बीते दिनो कई लोग धोखे का शिकार हो गए। आईपीएस सचिन अतुलकर के नाम बने फेसबुक अकाउंट पर एक बीमार बच्ची का फोटो लगाकर सहायता की अपील कर डाली। आईपीएस इस अपील को देखकर लोगों ने न केवल उनकी संवेदनशीलता की तारीफ की बल्कि देश के कई पुलिस अधिकारियों व प्रभावी लोगों ने  इस पोस्ट को वायरल कर दिया। एसीपी सचिन अतुलकर को पता चला तो उन्‍होंने अपने अकांउट न होने की जानकारी दे कर मामला साइबर सेल को सौंप दिया। साइबर सेल ने धोखाधड़ी की आरोप में एक कबाड़ी को गिरफ्तार किया है। 

यह कोई एक मामला नहीं है, करीब छह साल पहले जब अतुलकर सागर एसपी थे तब फेसबुक अकाउंट पर उनका फोटो लगा कर युवती को प्रेम जाल में फंसाने और उसके अश्लील फोटो और वीडियो मंगाकर ब्लैकमेल करने का मामला सामने आया था। 

मतलब, एक ही पुलिस अधिकारी के नाम पर प्रदेश में कई सालों से साइबर धोखाधड़ी जारी है और पुलिस कुछ कर नहीं पा रही है। यूं भी बढ़ते साइबर अपराध बीजेपी सरकार के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं। बीते मार्च में विधानसभा के बजट सत्र में बीजेपी के वरिष्ठ विधायक यशपाल सिंह सिसोदिया ने इस बारे में एक प्रश्न पूछा था। इसके जवाब में गृहमंत्री नरोत्‍तम मिश्रा ने बताया था कि मध्यप्रदेश में साइबर क्राइम के बीते 5 साल में 3365 मामले दर्ज हुए हैं, इनमें से 1212 प्रकरण लंबित हैं। 2018 से मार्च 2022 तक 55 करोड़ 48 लाख 93 हजार से ज्यादा राशि के आर्थिक अपराध साइबर क्राइम के माध्यम से हुआ। पुलिस ने अपराधियों से 6 करोड़ 80 लाख 22 हजार रुपए की राशि वसूली है। साइबर अपराधी जनता की 49 करोड़ से राशि हड़प चुके हैं। 

क्रिप्‍टो करेंसी धोखाधड़ी का खुलासा करने पर केंद्र सरकार से प्रशंसा पाने वाली मध्‍य प्रदेश की साइबर पुलिस राजनीतिक मामलों में तो प्रकरण दर्ज करने में जरा देरी नहीं करती है मगर जनता को आर्थिक नुकसान और धोखाधड़ी से बचाने के लिए एकदम फिसड्डी साबित हो रही है। 

अपराधियों को धर दबोचने का जज्‍बा, अफसरों के बंगलों पर चाकरी 

वे कड़ी मेहनत और परीक्षा के बाद पुलिस विभाग में भर्ती हुए थे। कोई आरक्षक बना, कोई एएसआई। जज्‍बा और हौसला ऐसा कि अपराधियों को पकड़ कर सलाखों के पीछे पहुंचा कर अपराध की कमर तोड़ दें। मगर इन्‍हें मैदानी पोस्टिंग नहीं मिली। प्रदेश के 4 हजार से ज्‍यादा ट्रेड आरक्षक प्रदेश के गृहमंत्री, डीजीपी, एडीजी, आईजी, डीआईजी, एसपी, एएसपी, सीएसपी से लेकर आरआई तक के बंगले पर झाड़ू पोंछा, बर्तन, कपड़े, माली, गेट कर्मी, कुक, स्वीपर, ड्राइवर,साफ-सफाई का काम कर रहे हैं। 

गृह विभाग की पड़ताल में यह खुलासा हुआ है कि प्रदेश के कई वर्तमान और पूर्व आईपीएस अफसर आरक्षकों को मैदानी ड्यूटी पर नहीं जाने दे रहे है। एडीजी, आईजी, डीआईजी को 8 ट्रेड आरक्षक रखने की पात्रता है। एसपी 4 ट्रेड आरक्षक रख सकता है। एएसपी को 1 ट्रेड आरक्षक रखने की पात्रता है। वर्तमान में एक आईपीएस अफसर के बंगले पर 25 से 35 तक ट्रेड आरक्षक चाकरी कर रहे हैं। आरआई को पात्रता नहीं, फिर भी ट्रेड आरक्षक को सरकारी घर पर तैनात किया गया है।

ये 4076 सिपाही बंगला ड्यूटी के दौरान कपड़े-बर्तन धोने से लेकर हर वो काम कर रहे हैं जो महरी करती है। इन्हें पीएचक्यू में मर्ज किया जाना है। बंगलों पर चाकरी कर रहे इन पुलिस कर्मचारियों को मैदानी ड्यूटी में लगाया जाता है तो पुलिस बल बढ़ जाएगा और बल की कमी के कारण हो रहे अपराधों पर नियंत्रण संभव होगा। 

हमारे पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में ट्रेड आरक्षक संविलियन की प्रक्रिया चालू है मगर मध्‍य प्रदेश में यह प्रक्रिया 9 सालों से बंद है। पूर्व डीजीपी विवेक जौहरी ने ट्रेड आरक्षक के संविलियन के संबंध में एक कमेटी का गठन किया था, लेकिन यह सब खानापूर्ति ही साबित हुई। शिवराज सरकार में काम आगे बढ़ा लेकिन फाइल 2 महीने से अटकी पड़ी है। आईपीएस लॉबी ऐसा होने ही नहीं दे रही क्योंकि बंगलों पर चाकरी कर रहे आरक्षक उनके हाथ से निकल जाएंगे।