जी भाई साहब जी: राहुल गांधी की पदयात्रा के प्रतिद्वंद्विता में बीजेपी का रथयात्रा प्‍लान 

आदिवासियों को लुभाने के लिए बीजेपी पूरी ताकत लगा रही है उस समुदाय से बीजेपी के वरिष्‍ठ मंत्री और नेता रूठे बैठे हैं। ‘गुड़ खाए और गुलगुलों से परहेज’ का बीजेपी का यह अंदाज क्‍या गुल खिलाएगा यह देखना होगा।  20 सालों बाद प्रदेश में ऐसा क्‍यों लग रहा है कि सड़क से सत्‍ता में आई बीजेपी क्‍या सड़क से ही जाएगी?

Updated: Nov 08, 2022, 01:27 PM IST

जी भाई साहब जी: राहुल गांधी की पदयात्रा के प्रतिद्वंद्विता में बीजेपी का रथयात्रा प्‍लान 
राहुुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा महाराष्‍ट्र में प्रवेश कर चुकी है और जल्‍द ही मध्‍य प्रदेश में पहुंचेगी। ज्‍यों-ज्‍यों पदयात्रा मध्‍य प्रदेश की तरफ बढ़ रही है, यह यात्रा चर्चा और खबरों में जगह बना रही है। इस मामले पर सियासत भी गरमा रही है। राहुल गांधी की इस पदयात्रा का असर मालवा-निमाड़ के साथ आदिवासी समुदाय पर होना तय माना जा रहा है। राजनीति की दृष्टि से मालवा-निमाड़ और आदिवासी वोट बैंक का बड़ा महत्‍व है। ये दोनों फैक्‍टर हार-जीत तय करते हैं। यही कारण है कि वोटरों को लुभाने की प्रतिद्वंद्विता में बीजेपी ने पदयात्रा के जवाब में रथयात्रा प्‍लान की है। यह बात ओर है कि बीजेपी जिन आदिवासी वोटरों को लुभाने का जतन कर रही है, उसी समुदाय के नेता पार्टी से रूठे बैठे हैं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महाकाल लोक के लोकार्पण अवसर पर उज्‍जैन आने तथा अगले एक साल में मालवा में बड़े आयोजन कर पीएम मोदी को बुलाने की बीजेपी और सरकार की तैयारियों को देख कर समझा जा सकता है कि मालवा-निमाड़ का कितना राजनीतिक महत्‍व है। पिछले 2 विधानसभा चुनाव के परिणाम भी इस महत्‍व का खुलासा करते हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में मालवा-निमाड़ की 67 में से 57 सीटें भाजपा के खाते में गई थी और कांग्रेस को 10 सीटें मिली थी। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 67 सीटों में से 35 सीटें जीती थीं जबकि बीजेपी केवल 28 सीट जीत पाई थी। इसी उलटफेर के कारण कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की थी। 

इसी तरह राज्य में 43 समूहों वाले आदिवासियों की आबादी 2 करोड़ से ज्यादा है। ये 230 में से 78 विधानसभा सीटों पर असर डालते हैं। आदिवासी जिलों में अपनी पकड़ मजबूत कर बीजेपी ने राजनीतिक बाजियां पलटी हैं मगर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के बाद जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन (जयस) के उभरने के बाद आदिवासी क्षेत्रों में बीजेपी को चुनौती मिली है। 

इस स्थितियों के बीच अब राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा मध्‍यप्रदेश में आ रही है। लगभग 13 दिनों तक वे मालवा-निमाड़ में रहेंगे। यहां से संदेश प्रदेश के अन्‍य आदिवासी क्षेत्रों तक जाना तय है। इस पद यात्रा के बरअक्‍स आदिवासियों के वोट पाने की प्रतिद्वंद्विता में बीजेपी रथयात्रा निकाल रही है। रथयात्रा के दौरान सरकार द्वारा आदिवासियों के लिए चलाई जा रहीं योजनाओं का प्रचार किया जाएगा। इस बीच 15 नवंबर को बिरसा मुंडा की जयंती पर शहडोल में तथा 4 दिसंबर को आदिवासी क्रांतिकारी टंट्या मामा भील के बलिदान दिवस पर इंदौर बड़ा आयोजन होगा। इस दिन रथयात्रा का समापन होगा। 

मजेदार बात यह है कि जिन आदिवासियों को लुभाने के लिए बीजेपी पूरी ताकत लगा रही है उस समुदाय से बीजेपी के वरिष्‍ठ मंत्री और नेता रूठे बैठे हैं। वरिष्‍ठ मंत्री विजय शाह जबलपुर में हुए कार्यक्रम में जाने से रोक दिए जाने पर ऐसे बिफरे थे कि आयोजन स्‍थल से ही चले गए थे। उनकी नाराजगी एक बार फिर उभरी है जब चीतों को बड़े बाड़े में छोड़ने की जानकारी उनके ही विभाग के अधिकारियों ने नहीं दी। वन मंत्री विजय शाह को उनके ही विभाग के अफसर किसके दम पर नजरअंदाज कर रहे हैं?  इसके पहले कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में गए बिसाहूलाल सिंह अपने बयानों से अलग-थलग पड़ जाते हैं।

दूसरी तरफ, मंडला-डिंडोरी क्षेत्र में राष्‍ट्रीय मंत्री ओमप्रकाश धुर्वे और केंद्रीय मंत्री फग्‍गन सिंह कुलस्‍ते आपसी प्रतिस्‍पर्धा के चलते समग्र आदिवासी राजनीति के हाशिए पर हैं। पूर्व मंत्री रंजना बघेल हों या कांग्रेस से बीजपी में आई सुलोचना रावत या सांसद सुमेर सिंह सोलंकी, बीजेपी ने आदिवासी चेहरे के नाम पर इन नेताओं को समय-समय पर आगे तो किया लेकिन फिर बाद में उपेक्षा के चलते ये नेता बीजेपी नेतृत्‍व से खफा हैं।  ‘गुड़ खाए और गुलगुलों से परहेज’ का बीजेपी का यह अंदाज आदिवासी समुदाय को कितना प्रभावित कर पाएगा यह देखना होगा।  

सड़क से आए थे, सड़क से जाएंगे? 

बसपा यानि बिजली, पानी और सड़क को मुद्दा बना कर 2003 में सत्‍ता में आई बीजेपी सरकार क्‍या अब सड़क के कारण ही सत्‍ता से जाएगी? प्रदेश में सड़कों की खस्‍ता हालत पर मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नाराजगी और अब केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा माफी मांगने के बाद तो यही सवाल उठ रहा है। 

मंडला पहुंचे केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मध्य प्रदेश की खराब सड़क के लिए माफी मांगते हुए कहा कि अगर गलती हुई है तो इसके लिए जनता से माफी भी मांगनी चाहिए। गडकरी ने बरेला से मंडला तक बन रहे टू लेन सड़क की हालत से नाराजगी जताई। इसके पहले एक सुबह भोपाल में जायजा लेने निकले मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यहां की सड़कों की दशा देख अफसरों पर कुपित हो गए थे। 2018 के चुनाव के पहले मध्‍य प्रदेश की सड़कों को अमेरिका की सड़कों से बेहतर बताने वाले सीएम शिवराज सिंह चौहान कागजों पर चकाचक बताई जाने वाली सड़कों की हालत देख कर बोले थे कि राजधानी की सड़कों की ऐसी दुर्गति होगी, ऐसी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। भोपाल नगर निगम की महापौर मालती राय और निगम अध्‍यक्ष किशन सूर्यवंशी भी सड़कों की दुर्दशा पर अफसरों को पत्र लिख कर अपनी जिम्‍मेदारी की इतिश्री कर चुके हैं। 

इस बीच भोपाल के 40 से अधिक बड़े क्षेत्र पिछले 10 दिनों से अंधेरे में है। नगर निगम ने बिजली बिल नहीं भरा है और करोड़ों रुपए बकाया होने पर बिजली कंपनी ने स्ट्रीट लाइट के कनेक्शन काट दिए हैं। सड़क खराब और तिस पर पसरा अंधेरा, जनता परेशान है। यह वह नगर‍ निगम है जिसके बीजेपी पार्षदों की बैठक में चाय-नाश्‍ते पर लाखों का खर्च कर दिया जाता है लेकिन उसके पास जनता की तकलीफ दूर करने को पैसा नहीं है। 

सीधी में सड़क न होने व भ्रष्‍टाचार के खुलासे का अनूठा मामला सामने आया है। जहां,  उपसरपंच रमेश कुमार यादव ने मझौली के सीईओ व थाना प्रभारी को पत्र लिख कर शिकायत की है कि रात में बनी दस लाख की सड़क सुबह चोरी हो गई। असल में, सड़क बनी ही नहीं थी। इसे बनाने के नाम पर दस लाख के घोटाले का आरोप है। 

बीजेपी नेताओं को फिक्र है कि जिस सड़क के मुद्दे पर वह सत्‍ता में आई थीं, वहीं जाने का कारण न बन जाए। आखिरी, आज 20 सालों बाद भी मध्‍य प्रदेश की राजनीति सड़क के इर्दगिर्द घूम रही है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी माफी मांग रहे हैं तो सीएम शिवराज सिंह चौहान अफसरों पर नाराज हो रहे हैं। मैदान में नेता अफसरों को पत्र लिख कर अपनी जिम्‍मेदारी पूरी कर रहे हैं तो नाराज ग्रामीण सड़क चोरी होने की रिपोर्ट लिखवा रहे हैं। 

इस पॉलिटिक्स का मोहरा कौन, बाबा या नेता, बूझो तो जाने 

राजनेताओं का धार्मिक स्‍थलों और धर्माचार्यों के पास जाना कोई नई बात नहीं है। इस आशीर्वाद के सहारे राजनीतिक वैतरणी पार करने का फार्मूला भी नया नहीं है। धर्म गुरुओं, कथावाचकों ने भी बयानों के जरिए राजनीति को गर्माया है। मगर बीते हफ्ते जो हुआ उसे देख, समझ कर यह निर्धारित करना मुश्किल है कि इस पॉलिटिक्‍स में मोहरा कौन बना, नेता या बाबा। 

हुआ यूं कि कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त इमरती देवी ने पंडोखर सरकार के महंत गुरुशरण महाराज के दरबार में पहुंची। यहां उन्‍होंने पर्ची लिख कर पूछ लिया कि वे चुनाव क्यों हारी? सियासी गुत्थियों को सुलझाने बाबा की शरण में गईं इमरती देवी के सवाल का जवाब भी राजनीति से पगा हुआ ही आया। पंडोखर धाम के महंत ने कहा कि इमरती देवी को उनकी वर्तमान पार्टी यानी बीजेपी के कारण ही हार का सामना करना पड़ा है। उन्‍होंने उस नेता का नाम सार्वजनिक नहीं किया लेकिन कहा कि डबरा में वे नाम बता देंगे। इस तरह पर्ची से आपराधिक मामले का खुलासा करवाने को लेकर एक एएसआई भी चर्चा में आ गए थे। अब इमरती देवी के सवाल से नई राजनीतिक पैंतरेबाजी शुरू हो गई है। इमरती देवी और गृहमंत्री डॉ. नरोत्‍तम मिश्रा की राजनीतिक प्रतिस्‍पर्धा पंचायत चुनाव में सभी ने देखी है जब इमरती देवी ने अपने समर्थकों को जितवा कर गृहमंत्री को चुनौती दी थी। 

मगर, पंडोखर धाम के महंत का जवाब बीजेपी और डबरा क्षेत्र की राजन‍ीतिक समीकरणों तक ही सीमित नहीं है। उनका जवाब तो बाबाओं के व्यक्तिगत मामलों, मतभेद और मनभेद से भी जुड़ा है। पंडोखर सरकार के महंत गुरुशरण महाराज व बागेश्वर सरकार के महंत धीरेन्द्र शास्त्री के मतभेद कई बार सार्वजनिक हुए है। इन दोनों के बीच के वि‍वाद को खत्‍म करवाने की पहल गृहमंत्री डॉ. नरोत्‍तम मिश्रा ने की थी। 

डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने अगस्त में बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर की कथा अपने निर्वाचन क्षेत्र दतिया में करवाई थी। मिश्रा परिवार द्वारा डबरा में नवग्रह मंदिर व विशाल पीठ का निर्माण करवाया जा रहा है। माना जा रहा है कि बागेश्वर सरकार के धीरेंद्र शास्त्री से गृहमंत्री डॉ. मिश्रा की निकटता पंडोखर महंत को रास नहीं आई है। इमरती देवी के सवाल के जवाब में जो कुछ कहा गया उसका मंतव्‍य बागेश्वर व पंडोखर धाम के महंतों के आपसी विवाद तक पहुंचता है। आने वाले दिनों में नेताओं और महंतों की यह आपसी टसल और तीखे रूप में आने की आशंका है।  

अप्रवासी भारतीय सम्‍मेलन बीजेपी के राजनीतिक संपर्क का मंच 

इस बार प्रवासी भारतीय दिवस 2023 का आयोजन इंदौर में 8 से 10 जनवरी होगा। इस सम्मेलन में करीब 3 हजार एनआरआई आएंगे। इसके बाद इंवेस्‍टर्स समिट होगी। सरकार निवेशकों से निवेश जुटाने के प्रयास कर रही है लेकिन बीजेपी का लक्ष्‍य अप्रवासी भारतीयों के परिवार के वोट को पक्‍का करना भी है।

इन्हीं प्रयासों के तहत महाकाल लोक के लोकार्पण समारोह को बीजेपी ने विभिन्‍न देशों में बसे भारतीयों केा ऑनलाइन दिखाया था। दिपावली पर बीजेपी कार्यकर्ताओं को खासतौर से उन परिवारों से संपर्क करने के लिए कहा गया था जिनके बच्‍चे विदेशों में हैं ताकि परिजन यहां अकेलापन अनुभव नहीं करें।

अप्रवासी भारतीय दिवस का इंदौर में आयोजन अप्रवासी भारतीयों के साथ बीजेपी के संपर्क को गहरा करने में मुख्‍य भूमिका निभा सकता है। इस संभावना को देखते हुए तैयारी है कि सम्‍मेलन में आने वाले अप्रवासी भारतीयों को उज्‍जैन और ओंकारेश्‍वर भी घुमाया जाए ताकि धार्मिक पर्यटन से राजनीतिक गणित साधी जा सके।