जी भाई साहब जी: जब राष्‍ट्रपति पेसा एक्‍ट लागू कर रही थीं तभी उठ रही थी पेसा के उल्‍लंघन की शिकायतें 

25 सालों बाद मध्‍य प्रदेश में पेसा एक्‍ट को लागू करने के भी अपने राजनीतिक निहितार्थ हैं। 230 सदस्यीय विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों पर बीजेपी की नजर है। दूसरी तरफ, वंशवाद का विरोध करने वाली बीजेपी के नेताओं को अब अपने वंश की फिक्र सताने लगी है।

Updated: Nov 17, 2022, 08:56 AM IST

जी भाई साहब जी: जब राष्‍ट्रपति पेसा एक्‍ट लागू कर रही थीं तभी उठ रही थी पेसा के उल्‍लंघन की शिकायतें 
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पेसा एक्ट की प्रथम प्रति भेंट की गई

मध्य प्रदेश के आदिवासी नेता दिलीप सिंह भूरिया कमेटी की अनुशंसा के २६ साल बाद प्रदेश में पेसा को मंजूरी मिली। राज्य सरकार ने महामहिम राष्ट्रपति को आमंत्रित कर शहडोल में बड़ा कार्यक्रम कराया और 15 नवंबर से पेसा लागू कर दिया गया। इतने सालों बाद इस कानून को लागू करने के भी अपने राजनीतिक निहितार्थ हैं। 230 सदस्यीय मध्य प्रदेश विधानसभा में आदिवासियों के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं। वहीं, लगभग 30 अन्‍य सीटें ऐसी हैं, जहां आदिवासी वोट बैंक हार-जीत का फैसला करता है। वर्ष 2018 में विधानसभा चुनाव में आदिवासी वोट बैंक के करवट बदलने के चलते ही भाजपा के हाथों से सत्ता फिसल गई थी। 2013 में भाजपा के पास 31 आदिवासी सीटें थीं, लेकिन 2018 में 16 ही बचीं। बीजेपी सरकार ने यह कवायद यह जानते हुए की है कि मिशन 2023 में सत्‍ता की राह आदिवासी समुदाय ही मजबूत करेगा। बीजेपी इसे मास्‍टर स्‍ट्रोक की तरह मान रही है। 

लेकिन ठीक उसी वक्त जब राष्‍ट्रपति द्रोपदी मुर्मु की उपस्थिति में पेसा एक्‍ट लागू किया जा रहा था, आदिवासी समुदाय विभिन्न इलाकों में अपनी जमीन और उत्‍पीड़न से परेशान होकर धरना प्रदर्शन कर रहे थे। 15 नवंबर को रतलाम के धराड़ गांव में जनजातीय गौरव दिवस आयोजन में पहुंचे रतलाम सांसद गुमानसिंह डामोर के वाहन को आदिवासियों ने विरोधस्वरूप घेर लिया था। जयस के नेतृत्‍व में बीजेपी नेताओं का घेराव कर रहे ये आदिवासी अपने क्षेत्र की जमीन उद्योग के लिए देने का विरोध कर रहे थे। यानी जो अधिकार दिलानेवाला नेतृत्व है वही सवालों के घेरे में है। इधर प्रशासन ने भी आदिवासी समुदाय की मदद की बजाय प्रदर्शन करनेवाले नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज कर उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया है। ऐसा ही कुछ प्रदर्शन धार में भी रविवार को देखने को मिला। आदिवासी समाज के लोग जिले में आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ बड़ी संख्‍या में एकत्रित होकर अपनी सुरक्षा और अधिकार की मांग करने के लिे जुटे थे। 

यही नहीं, आदिवासी अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहे संगठन भी आरोप लगा रहे हैं कि 25 बरस बाद बनाए गए पेसा के नियमों में ही बदलाव हो गए हैं। संसद द्वारा पारित अधिनियम की भावना ही बदल गई है। मूल कानून में आदिवासी पंचायतों को विशिष्ट शक्तियां देकर ग्राम सभा की शक्तियों एवं अधिकारों पर अतिक्रमण करने से रोकने का प्रावधान किया गया था। मगर, मप्र पेसा नियम, 2021 में इन्हें राज्य सरकार, जिला पंचायत और जनपद पंचायतों के अभिकर्ता बना दिया गया है। मप्र पेसा नियम 2021 में प्राकृतिक संसाधनों, कृषि एवं भूमि को ग्राम पंचायत के क्षेत्र तक सीमित कर दिया गया है। जबकि इसकी सीमाएं उस समुदाय के अधिवास अधिकार तक जाती हैं। 

मध्‍य प्रदेश पेसा नियम 2021 को लागू करने के लिए राज्य ने अपने कुछ कानूनों जैसे साहूकार अधिनियम, भू-राजस्व संहिता, आबकारी अधिनियम आदि का पेसा के साथ तालमेल किया है जबकि वन, भूमि एवं न्याय से जुड़े कानूनों को पेसा के साथ अनुकूलन नहीं हुआ है। इसलिए लघुवनोपज पर ग्राम सभा की मालिकी स्थापित नहीं हुई है। केन्द्र सरकार ने लघुवनोपज के तहत बांस को शामिल किया है। परन्तु राज्य सरकार ने बांस को लघुवनोपज में शामिल नहीं करने का निर्णय लिया है, इसलिए पेसा कानून से आदिवासी समाज का बांस पर अधिकार कायम नहीं हो सकेगा। 

इस कानून को लागू करने का उद्देश्य जनजातीय समाज को अपने क्षेत्र में निर्णयों का भागीदार बनाना तथा ग्रामसभाओं को सभी गतिविधियों का मुख्य केन्द्र बनाना है। केंद्र ने 24 दिसंबर 1996 को देश में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र के लिए विस्तार) (पेसा) अधिनियम 1996 कानून लागू किया। मध्यप्रदेश के आदिवासी नेता और झाबुआ के सांसद रहे दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता में बनी समिति की अनुशंसा पर ही यह कानून बनाया गया था। सबसे ज्‍यादा आदिवासी आबादी वाले राज्‍य मध्यप्रदेश 1996 से अब तक यह एक्‍ट लागू नहीं हो सका था। 

अवसर और अफवाह के बीच भारत जोड़ो यात्रा 23 नवंबर से मध्‍य प्रदेश में 

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा 23 नवंबर को महाराष्ट्र से मध्‍य प्रदेश में प्रवेश करेगी। दो दिन राहुल गांधी गुजरात में प्रचार करने जाएंगे। अत: 21 और 22 नवंबर को भारत जोड़ो यात्रा का ब्रेक रहेगा। मध्यप्रदेश में यात्रा की शुरुआत बुरहानपुर से 23 नवंबर को होगी। यात्रा 28 नवंबर को इंदौर में पहुंचेगी। उज्जैन में सभा 1 दिसंबर को होगी। यात्रा 5 दिसंबर को राजस्‍थान में प्रवेश कर जाएगी। इस एक पखवाड़े की यात्रा के दौरान राहुल गांधी मालवा-निमाड़ क्षेत्र में रहेंगे जो मिशन 2023 की दृष्टि से बेहद महत्‍वपूर्ण है। 

भारत जोड़ो यात्रा को एक अवसर मानते हुए कांग्रेस ने न केवल शक्ति प्रदर्शन करने की तैयारी की है बल्कि कांग्रेस में उर्जा के संचार की उम्‍मीद लगाई है। इसके लिए गांधी चौपाल का आयोजन करने के साथ ही क्षेत्र में माहौल बनाने के लिए उप यात्राएं निकाली जा रही है।  

दूसरी तरफ, राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के राजनीतिक असर को कम करने के लिए बीजेपी ने आदिवासी क्षेत्रों में यात्रा निकाली। अब मीडिया में ऑपरेशन लोटस की अफवाहें हैं जिनमें कहा जा रहा है कि यात्रा का असर कम करने के लिए कांग्रेस के नेताओं को बीजेपी में शामिल करवाया जाएगा। बीजेपी के नेताओं के बयानों ने इस अफवाहों को हवा ही दी है। जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्‍यक्ष कमलनाथ कह चुके हैं कि बीजेपी के कई नेता उनके संपर्क में है। 

वंशवाद का विरोध करने वालों को अब अपने वंश की फिक्र 

बीजेपी ने राजनीतिक रूप से सफलता पाने के लिए वंशवाद को मुद्दा बनाया है। वह कई सालों से विभिन्‍न दलों पर वंशवाद को प्रोत्‍साहित करने का आरोप लगा रही है मगर अब बीजेपी में ही नेताओं के बेटे राजनीति में उतरने को तैयार खड़े हैं लेकिन चिंता तो पार्टी की गाइड लाइन है। 

मध्य प्रदेश में 2023 के विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी के एक दर्जन वरिष्‍ठ नेताओं के पुत्र व पुत्रियां टिकट पाने की दौड़ में हैं। पूर्व मंत्री और विधायक गौरीशंकर बिसेन तो कह चुके हैं कि वे अगली बार अपनी बेटी मौसमी को टिकट देने की पैरवी करेंगे। उनके अलावा केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के बेटे महाआर्यमन सिंधिया, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बेटे देवेंद्र सिंह तोमर, बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा के बेटे तुषमुल झा, लोक निर्माण मंत्री गोपाल भार्गव के बेटे अभिषेक भार्गव, गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के बेटे सुकर्ण मिश्रा, विजय शाह के बेटे दिव्यादित्य शाह भी टिकट की दौड़ में हैं। यहां तक कि मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का बेटा कार्तिकेय सिंह चौहान भी राजनीति में सक्रिय हैं। 

इससे पहले बीजेपी में ही पूर्व मुख्‍यमंत्री सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, वीरेंद्र सकलेचा, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, कैलाश सांरग, कैलाश विजयवर्गीय आदि नेताओं की संतान पिता की राजनीतिक विरासत संभाल रही हैं। 

जबकि बीजेपी के संसदीय बोर्ड ने ही गुजरात विधानसभा चुनाव में  किसी भी विधायक व सांसद के बेटा-बेटी या परिजन को टिकट नहीं देने का फैसला किया है। जब पार्टी से वंशवाद को मुद्दा बनाते हुए नेता पुत्रों के टिकट काटने शुरू किए हैं तो मध्‍य प्रदेश के वरिष्‍ठ नेताओं में खलबली है। यही कारण है पिछले सप्‍ताह जब बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक हुई तो बीजेपी के संसदीय बोर्ड के सदस्य सत्यनारायण जटिया ने कहा कि नेता का बच्चा होना गलती नहीं है। सभी योग्य नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए टिकट मिलना चाहिए। 

इससे पहले लोक निर्माण मंत्री गोपाल भार्गव भी कई बार कह चुके हैं कि नेता पुत्र यदि योग्‍य है तो उन्‍हें टिकट मिलना चाहिए। मगर पार्टी की मुश्किल यही है कि जिस मुद्दे पर वह कांग्रेस व अन्‍य दलों को घेरती है, उस मुद्दे को वह छोड़े कैसे? 

मंत्रिमंडल विस्‍तार के संकेत, हकीकत या झूनझूना 

मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नवंबर अंत में मंत्रियों के साथ दो दिनों की मैराथन बैठक कर उनके कामकाज की समीक्षा करने वाले हैं। इससे पहले 19 नवंबर को भाजपा विधायक दल की बैठक बुलाई गई है। इसके साथ ही संकेत दे दिए गए हैं कि मंत्रिमंडल में खाली चार पदों को गुजरात चुनाव के बाद भरा जाएगा। इससे मंत्रियों और दावेदारों में बेचैनी है। बेचैनी की वजह परफार्मेंस के आधार पर कुर्सी जाने का डर और दावेदारों में एक अनार सौ बीमार की स्थिति है। 

शिवराज सरकार में फिलहाल 30 मंत्री हैं। नियमों के हिसाब से 4 मंत्रियो की जगह खाली है। अभी पीएचई, जनसंपर्क, सामान्य प्रशासन, विमानन, महिला एवं बाल विकास विभाग मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास हैं। माना जा रहा है कि नए मंत्रियों को शामिल कर पुरानों के विभागों में फेरबदल किया जाएगा। बीजेपी के कई विधायक लंबे समय से मंत्री बनने की आस लगाए बैठे हैं।

2020 में ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के साथ बीजेपी में आए नेताओं के कारण इन विधायकों से मंत्री की कुर्सी और दूर खिसक गई थी। अब यशपाल सिंह सिसोदिया, रमेश मेंदोला, देवेंद्र वर्मा, प्रदीप लारिया, शैलेन्द्र जैन, गोपीलाल जाटव, राजेंद्र पांडेय मंत्री बनने की कोशिश में सारे समीकरण साध रहे हैं। पूर्व मंत्री सुरेंद्र पटवा, राजेंद्र शुक्ला, केदारनाथ शुक्ल, अजय विश्नोई, रामपाल सिंह, गौरीशंकर बिसेन,महेंद्र हार्डिया,संजय पाठक की कोशिश है कि वे चुनावी साल में मंत्री बन कर अपनी स्थिति मजबूत कर लें। 

इस विस्‍तार की अटकलों के साथ इन खबरों ने भी जोर पकड़ा है कि कमजोर प्रदर्शन वाले मंत्रियों को बाहर का रास्‍त दिखाया जा सकता है। इस आकलन के बाद मंत्रियों की सक्रियता बढ़ गई है। राजनीतिक हलके में यह चर्चा जोरों पर है कि शिवराज कैबिनेट में अभी सिंधिया कोटे से छह कैबिनेट और तीन राज्यमंत्री हैं। सिंधिया समर्थक कुछ मंत्रियों का परफॉर्मेंस ठीक नहीं है। उन्हें हटाकर नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है। 

अब देखना होगा कि मंत्रिमंडल विस्‍तार के यह कयास हकीकत में तब्‍दील होंगे या हर बार की तरह राजनीतिक शिगूफा ही साबित होंगे।