शौर्य और धैर्य धर्म रथ के दो पहिए

राम जी के समान कोई शील निधान स्वामी नहीं, भगवान श्री राम जो कहते हैं वो कर के दिखाते हैं, उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं है, दोनों एक समान

Updated: Sep 10, 2020 01:53 AM IST

शौर्य और धैर्य धर्म रथ के दो पहिए

जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना

भगवान श्री राम का यह उपदेश हम सब के लिए भी है। जिस रथ पर आरूढ़ होकर हम सदा सर्वत्र विजयी होकर अपने जीवन पथ को आलोकित कर सकते हैं,वह धर्म रथ है। और रथ के जितने भी अंग हैं उन सबका वर्णन धर्म रथ में प्रभु ने किया है।

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य शील दृढ़ ध्वजा पताका।।

बल विवेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।।

भगवान श्री राम में धर्म रथ के जितने भी अंग हैं। सब विद्यमान हैं। भगवान श्रीराम क्षत्रिय कुल में अवतरित हुए हैं। इसलिए इस प्रसंग के माध्यम से क्षत्रिय के धर्म का वर्णन करते हैं।

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यंं, युद्धे चाप्त पलायनम्।

दानमीश्वर भावश्च, क्षात्र कर्म स्वभावजम्।।

शौर्य, तेज, धृति, दाक्ष्य, और युद्ध से परांमुख न होना, दान करना, ईश्वर भाव रखना। ये क्षत्रिय का स्वाभाविक कर्म है। भगवान श्रीराम कहते हैं कि जो रथ विजय दिलाने वाला है उसके दो चक्र हैं। शौर्य और धैर्य। भगवान श्री राम में शौर्य है। शौर्य इस प्रकार का है कि विश्वामित्र जी की यज्ञ रक्षा के समय अकेले मारीच और सुबाहु को सेना समेत परास्त कर देते हैं। खर,दूषण से युद्ध करते समय अकेले श्री राघव ने चौदह सहस्र सेना के समेत खर दूषण को परास्त किया।

और धैर्य इतना है कि कितने भी संकट आ जाए, लेकिन उनका मन कभी भी धर्म से विचलित नहीं होता। भगवान श्रीराम को वनवास के समय कितना उत्तेजित किया गया बाल्मीकि रामायण के अनुसार तो लक्ष्मण कुमार तक ने भी कहा। परन्तु भगवान श्रीराम ने धैर्य नहीं खोया। अपने सिद्धांत पर अटल रहे। तो युद्ध में विजय उसी की होती है जिसमें शौर्य और धैर्य दोनों हों। यही दो इस धर्म रथ चक्र हैं। सत्य और शील ही इस रथ के ध्वजा और पताका हैं।

 सत्य शील दृढ़ ध्वजा पताका

प्राचीन काल में रथ में ध्वजा और पताका इसलिए लगाए जाते थे जिससे कि दूर से ही ये देखा जा सके कि रथी सकुशल है। तो मनुष्य यदि धर्म रथ पर बैठा है तो धर्म में उसकी स्थिरता का लक्षण यदि कोई है तो वह है सत्य और शील। क्यूं कि वह दूर से ही दिख जाता है। रथ को तो मनुष्य पास में आकर पहचान पायेगा किन्तु ध्वजा और पताका दूर से ही दिख जाती है। उसी प्रकार जिस मनुष्य के जीवन में सत्य और शील होता है उसकी स्वाभाविक रूप ख्याति हो ही जाती है।

भगवान श्रीराम में सत्यसंधता है वो कभी भी सत्य से विचलित नहीं होते। महाराज दशरथ तो विचलित हो गए थे। उन्होंने श्री राम को लौटाने के लिए सुमंत मंत्री से अनुरोध किया था। लेकिन भगवान श्रीराम ने अपना सत्य छोड़ा ही नहीं पिता के सत्य की भी रक्षा की। उनके स्वर्ग वासी हो जाने पर भी उनके वचनों को प्रमाण बनाया। श्री भरत के अनुरोध करने पर भी वनगमन के निश्चय को बदले नहीं। इसलिए रामजी को सत्यसंध कहते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने तो भगवान श्रीराम के शील की प्रशंसा करते हुए कहा कि

 तुलसी कहूं न राम सों साहिब शील निधान। 

अर्थात्  राम जी के समान कोई शील निधान स्वामी नहीं है। भगवान श्री राम जो कहते हैं वो कर के दिखाते हैं। उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं है, दोनों एक समान है। धर्म रथ के सम्पूर्ण अठारहो अंग भगवान श्रीराम में विद्यमान हैं। क्रमशः एक-एक का दर्शन होगा।