जगद्देशिकं व्यापकं मोक्षरूपं ध्रुवं नित्यशुद्धं च बुद्धं च मुक्तं भवं ज्ञानदं भुक्तिदं मुक्तिदं वै महेश स्वरूपं गुरुं वै नमाम:

मुमुक्षु को मुक्ति और विषयी को भुक्ति प्रदान करने वाले, नित्य शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप हैं। ऐसे सदगुरु की शरणागति हम सभी के लिए परम श्रेयस्कर है

Updated: Nov 06, 2020, 10:21 PM IST

जगद्देशिकं व्यापकं मोक्षरूपं ध्रुवं नित्यशुद्धं च बुद्धं च मुक्तं भवं ज्ञानदं भुक्तिदं मुक्तिदं वै महेश स्वरूपं गुरुं वै नमाम:

जगद्देशिकं व्यापकं मोक्षरूपं
ध्रुवं नित्यशुद्धं च बुद्धं च मुक्तं
भवं ज्ञानदं भुक्तिदं मुक्तिदं वै
महेश स्वरूपं गुरुं वै नमाम:।।

श्लोकार्थ- जो सम्पूर्ण जगत् के आचार्य हैं, व्यापक हैं, मोक्षरूप हैं, ध्रुव हैं, नित्य शुद्ध हैं, बुद्ध हैं, मुक्त हैं, भव हैं, ज्ञान दाता हैं, भोग और मोक्ष को देने वाले हैं ऐसे शिव स्वरूप सदगुरु देव को हम नमन करते हैं। श्लोक में दिए गए लक्षण तत्वदर्शी महापुरुष में ही मिलते है। और वर्तमान समय में हमारे पूज्य गुरुदेव भगवान द्विपीठाधीश्वर श्री जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज में ये सारे लक्षण देखने को मिलते हैं। गुरु देव को शिव स्वरूप माना गया है।श्री राम चरित मानस में  गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है कि-
वंदे बोधमयं नित्यं
गुरुं शंकर रूपिणम्।
यमाश्रितोहि वक्रोSपि
चन्द्र: सर्वत्र वन्द्यते।।

सम्पूर्ण सृष्टि में वक्र (टेढ़े)को कोई भी व्यक्ति स्वीकार नहीं करता। यहां तक कहा गया कि टेढ़े चन्द्रमा को राहु नहीं ग्रसता है। 
वक्र चंद्रमहिं ग्रसइ न राहू  इसीलिए ग्रहण पूर्णिमा को ही लगता है। लेकिन भगवान शशांक शेखर श्री शिव जी ऐसे उदार हैं कि द्वितीया के वक्र चन्द्र को मस्तक पर धारण करके उसे जगत् पूज्य बना दिया।
तुलसिदास त्रैलोक्य 
मान्य भयो कारण इहै 
गह्यो गिरिजा पति

इसलिए यहां सदगुरु देव को शिव स्वरूप बताया गया कि जैसे शिव जी वक्र चन्द्र को स्वीकार करके जगत् पूज्य बना दिए हैं। वैसे ही हमारे गुरुदेव भगवान मुझ जैसे वक्र को अपनी शरण में लेकर आत्म स्वरूप में स्थित होने के लिए निरन्तर उपदेश देते रहते हैं। वक्र को पूज्य बना दिया। भुक्ति और मुक्ति दोनों को प्रदान करने वाले हैं। इसका अनुभव गुरु देव के निजी भक्तों को होता रहता है। और यह बहुत ही स्वाभाविक बात है कि गुरु की शरण में रहने वाले को वैभव की कमी नहीं रहती। गोस्वामी जी के शब्दों में-
जे गुरु चरण रेनु सिर धरहीं
ते जनु सकल विभव बस करहीं

इसलिए- भुक्तिदं मुक्तिदं वै। मुमुक्षु को मुक्ति और विषयी को भुक्ति प्रदान करने वाले हैं। नित्य शुद्ध बुद्ध और मुक्त स्वरूप हैं। ऐसे सदगुरु की शरणागति हम सभी के लिए परम श्रेयस्कर है।