आत्म कृपा के बिना सभी कृपा व्यर्थ

ब्रह्म साक्षात्कार की क्षमता के कारण मनुष्य परमेश्वर की सर्वोत्तम कृति माना जाता है क्योंकि अन्य शरीरों में इस क्षमता का सर्वथा अभाव है

Publish: Jul-28, 2020, 06:41 AM IST

आत्म कृपा के बिना सभी कृपा व्यर्थ

परम पूज्य गुरुदेव भगवान अपने अमृतमय उपदेशों में कहा करते हैं कि आत्म कल्याण के लिए चार कृपाओं की आवश्यकता पड़ती है-  1-ईश्वर कृपा, 2-शास्त्र कृपा,2-गुरु कृपा और चौथी आत्म कृपा। आत्म कृपा के बिना और सब कृपा व्यर्थ हो जाती हैं। इसलिए हमें अपने ऊपर कृपा करनी चाहिए। अतः ये कहना होगा कि इन चारों कृपा में आत्म कृपा ही सर्वोपरि है।

श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय उद्धव को समझाते हुए कहा- विश्व सृष्टा परमेश्वर ने विविध प्रकार के शरीरों की रचना की। वृक्ष, सरीसृप, खग, मृग, मत्स्य का निर्माण किया पर उनको किसी से भी संतोष नहीं हुआ। जब सबके अन्त में उन्होंने मनुष्य बनाया और देखा कि मनुष्य के भीतर ऐसी बुद्धि है कि जिससे ब्रह्म साक्षात्कार किया जा सकता है तो उन्हें आनंद का अनुभव हुआ।ब्रह्म साक्षात्कार की क्षमता के कारण मनुष्य परमेश्वर की सर्वोत्तम कृति माना जाता है  क्योंकि अन्य शरीरों में इस क्षमता का सर्वथा अभाव है।

अध्यात्म शास्त्रों में बताया गया है ब्रह्मलोक में छाया और धूप के समान माया से विलक्षण ब्रह्म का अनुभव होता है। उससे नीचे के लोकों में चंचल और मलिन सरोवर में दिखलाई पड़ने वाले चन्द्रमा के प्रतिबिंब के समान ब्रह्म दर्शन होता है। किन्तु मनुष्य लोक में तो जैसे दर्पण में मुख दिखाई पड़ता है इस प्रकार ब्रह्मदर्शन होता है।इस दृष्टि से देखा जाए तो मनुष्य शरीर का अन्य सभी शरीरों से अधिक महत्व है। यह भी माना जाता है कि चौरासी लाख योनियों में भटकते-भटकते जब यह जीव परिश्रान्त हो जाता है तब अकारण करुण करुणा वरुणालय सर्वेश्वर सर्व शक्तिमान परमेश्वर इस जीव की दीन दशा पर दयार्द्र होकर इसको मानव शरीर प्रदान करते हैं। इसलिए इसके द्वारा परमेश्वर के स्वरूप का साक्षात्कार करने का प्रयत्न करना इसका परम कर्त्तव्य होने के साथ-साथ भगवान के प्रति कृतज्ञता का द्योतक भी है।

जो काम पशु पक्षियों के शरीर से नहीं हो सकता, मनुष्य शरीर से वही काम करना चाहिए। खाना-पीना,मरना-डरना, और सन्तान उत्पन्न करना तो दूसरे शरीरों से भी हो सकता है। इनके लिए मनुष्य शरीर का उपयोग करना बुद्धिमत्ता नहीं है। अतः ईश्वर कृपा, शास्त्र कृपा और गुरु कृपा का अनुभव करते हुए दृढ़ता पूर्वक कटिबद्ध होकर आत्म कृपा के द्वारा जीवन के लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें।