भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी

धर्म ही मूर्तिमान होकर श्रीराम के रूप में लोक कल्याण की भावना से इस धराधाम पर आते हैं, और अनेक प्रकार की लीलाओं के द्वारा लोक कल्याण करते हैं

Updated: Apr 21, 2021, 08:41 AM IST

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी
Photo courtesy: Mumbai mirror

आज श्रीराम नवमी है। आज से नौ लाख वर्ष पूर्व त्रेतायुग में आज ही दिन समस्त ग्रह तिथि वार आदि की अनुकूल स्थिति आने पर अथवा यूं कहें कि जिस प्रकार का कार्य उन्हें करना था, उसके अनुकूल योग ग्रह आदि के एकत्रित होने पर अखिल ब्रह्माण्ड नायक पूर्णतम पुरुषोत्तम ने श्री अवध धाम में माता कौशल्या की गोद में महाराज चक्रवर्ती नरेन्द्र श्री दशरथ जी के महल में अपने अंशों के साथ चार रूपों में श्रीराम, लक्ष्मण, भरत,और शत्रुघ्न के रूप में अवतार लिया।

नौमी तिथि मधुमास पुनीता

शुकल पक्ष अभिजित हरिप्रीता

तिथि वार आदि तो अनुकूल हुए ही देश,काल परिस्थिति सब अनुकूल हो गए। और उसी समय- भए प्रकट कृपाला

प्रभु श्रीराम प्रकट हो गए। कुछ महानुभावों को ऐसी जिज्ञासा होती है कि ईश्वर का अवतार क्यूँ होता है?

जीव का जन्म तो प्रारब्ध के कारण होता है। लेकिन भगवान इस धरती पर क्योँ आते हैं? जिनके एक संकेत मात्र से पृथ्वी, जल, सूर्य, चन्द्र मण्डल, नक्षत्र मंडल सब नाचते रहते हैं। जिनके भय से वायु चलती है, जिनके भय से सूर्य तपता है।

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सूर्यस्तपति मद्भयात्

सारे ग्रह नक्षत्र अपनी अपनी कक्षाओं में ही भ्रमण करते हैं, कोई भी किसी की कक्षा का अतिक्रमण नहीं करता। भला उन परम पुरुष को इस धरती पर आकर अनेक प्रकार के कष्टों को सहन करने की क्या आवश्यकता है। इस संदर्भ में परम पूज्य गुरुदेव भगवान द्वि पीठाधीश्वर श्री शंकराचार्य जी महाराज कहते हैं कि भगवान का अवतार भी प्रारब्ध के कारण ही होता है। अंतर इतना ही है कि जीव का प्रारब्ध उसके अपने कर्मों के अनुसार बनता है और उसी आधार पर उसका जन्म होता है, लेकिन भगवान का अवतार भक्तों के प्रारब्ध के अनुसार होता है। जैसे- महाराज मनू और शतरूपा जी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उनके पुत्र के रूप में आने का वरदान दिया तो उसके अनुसार भगवान को आना पड़ा।

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बहुत से ऋषि मुनि भगवत्साक्षात्कार के लिए तपस्या कर रहे थे उनका प्रारब्ध, साथ ही में रावण का प्रारब्ध। इन तमाम भक्तों और दुष्टों के प्रारब्धानुसार उन्हें सद्गति प्रदान करने के लिए ही भगवान अवतार ग्रहण करते हैं। और श्री राम के अवतार के पूर्व भी धर्म था,लेकिन वेदों और शास्त्रों में था परन्तु श्रीराम के अवतार के पश्चात वह धर्म साकार हो गया। अगर धर्म को प्रत्यक्ष रूप से कोई देखना चाहता हो तो वह श्री राम को देख ले उसे धर्म का दर्शन हो जाएगा।

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रामो विग्रह वान धर्म:

धर्म ही मूर्तिमान होकर श्रीराम के रूप में लोक कल्याण की भावना से इस धराधाम पर आता है और अनेक प्रकार की लीलाओं के द्वारा लोक कल्याण करते हैं।

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राम नौमी अवध की सुहावन लगे।

अवध नगरी बड़ी मनभावन लगे।।