भगवान श्रीराम को क्यों कहा गया कृपानिधान

Shri Ram: विभीषण के शब्द सुन कर राम जी को क्रोध आना चाहिए था लेकिन उन्होंने विभीषण के लिए किया सखा शब्द का प्रयोग

Updated: Sep 09, 2020 04:57 AM IST

भगवान श्रीराम को क्यों कहा गया कृपानिधान

सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना।।

यहां पर गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने भगवान श्रीराम के लिए कृपानिधान शब्द का प्रयोग किया। विभीषण ने ऐसे अवसर पर निराशा व्यक्त की कि जिसको सुनकर कोई भी व्यक्ति क्रुद्ध हो सकता है। कोई योद्धा युद्ध करने के लिए चले उसी समय उसके निर्बलता की कोई याद दिलाए तो उसका तेजो वध होता है। उत्साह में कमी आती है। जब उत्साह में कमी आती है तब वो युद्ध ठीक से नहीं कर पाता है।

महाभारत में कथा आती है कि जब महाभारत युद्ध में कर्ण को सेनापति बनाया गया तो कर्ण ने कहा कि मैं अर्जुन को परास्त करूंगा लेकिन मुझमें और अर्जुन में एक अंतर है अर्जुन के पास कृष्ण जैसा सारथी है और मेरे पास सारथी नहीं है। यदि कृष्ण जैसा सारथी हमको मिल जाए तो निश्चित रूप से हम अर्जुन को परास्त कर देंगे। तब दुर्योधन ने पूछा कि तुम किसको योग्य समझते हो, किसको तुम्हारा सारथी बना दें? तो कर्ण बोला कि यदि शल्य मुझे सारथी के रुप में मिल जायं  तो मैं निश्चित रूप से सफल हो सकता हूं।

शल्य मद्र देश के राजा थे। माद्री उनकी बहन थीं। नकुल और सहदेव उनके भांजे थे। लेकिन घटना ऐसी घटी कि महाराज शल्य पांडवों की ओर से युद्ध करने के लिए चले। दुर्योधन को गुप्तचरों से पता लग गया कि मद्र देश के राजा शल्य पांडवों की ओर से युद्ध करने के लिए आ रहे हैं तो उन्होंने मार्ग में कई कैम्प बना दिए। और स्थान-स्थान पर शल्य का स्वागत किया। अंतिम जो स्वागत का स्थान था उसमें दुर्योधन स्वयं पहुंचा। जब उन्होंने भोजन कर लिया तब प्रसन्न होकर कार्य कर्त्ताओं से पूछने लगे कि हमारे भांजों ने हमारे लिए बड़ा ही सुन्दर प्रबंध किया है। तब दुर्योधन सामने आ गया और बोला कि नहीं मामा जी! ये सेवा तो हमने की है। उनको बड़ा आश्चर्य हुआ।

शल्य ने पूछा कि आप क्या चाहते हैं?  दुर्योधन ने कहा कि हम चाहते हैं कि आप हमारी ओर से युद्ध करें।  चूंकि शल्य ने दुर्योधन का नमक खा लिया था इसलिए उन्हें दुर्योधन की ओर से खड़ा होना पड़ा। शल्य हृदय से तो पांडवों की विजय चाहते थे लेकिन उनको कौरवों की ओर से युद्ध करना पड़ रहा था। अब जब शल्य को कर्ण का सारथी बनने के लिए कहा गया तो तो शल्य बोले कि हम सारथी बन जायेंगे, परन्तु हमारी एक शर्त है कि कर्ण हमारे अपराधों को क्षमा करेंगे। हम कुछ भी बोलें कर्ण उसपर ध्यान नहीं देंगे। और न उसका हमें कोई दंड देंगे।कर्ण ने कहा ठीक है।

अब जब युद्ध प्रारंभ हुआ तो कर्ण आवेश में आकर कहता सारथी! मेरा पौरुष देखो। मैं अभी अर्जुन को परास्त करता हूं। तब शल्य कहता-अरे सूत पुत्र!तू अर्जुन से कभी नहीं जीत सकता। वो पृथा पुत्र है। महान वीर है। तेरी उसकी कोई बराबरी नहीं है। वो सिंह है, तू सृगाल है। ऐसे शब्द सुनकर कर्ण का उत्साह उसी समय कम हो जाता था।

जहां कहीं भी संघर्ष हो वहां ऐसे सारथी की आवश्यकता पड़ती है जो हमारे उत्साह को बढ़ाए। घटाए नहीं। उत्साह घटाने वाला सारथी तो एक तरह से पराजय की ओर ले जाता है। तो विभीषण ने ऐसे अवसर पर पूछा कि  आप कैसे जीतेंगे? ये सुनकर राम जी को क्रोध आना चाहिए था लेकिन राम जी ने विभीषण के लिए सखा शब्द का प्रयोग किया। इसलिए यहां भगवान श्रीराम के लिए कृपानिधान शब्द का प्रयोग किया गया है।

सुनहु सखा कह कृपा निधाना।

(जिस रथ पर विजय प्राप्त होती है वह दूसरा ही रथ है)

सौरज धीरज तेहि रथ चाका।।

(शौर्य और धैर्य ही उस रथ के पहिए (चके) हैं। और भी शेष अंग उसके अलग-अलग हैं)