प्राणिमात्र के लिए अंतर-आत्मा क्या है

गुणरहितं कामनारहितं, प्रतिक्षणवर्धमानं अविच्छिन्नं, सूक्ष्मतरं अनुभवरूपं प्रेमस्वरूपं

Updated: Oct 10, 2020, 05:46 AM IST

प्राणिमात्र के लिए अंतर-आत्मा क्या है

रामचंद्र के भजन बिनु,
जो चह पद निरवान।
ज्ञानवंत अपि सो नर,
पशु बिनु पूंछ विषान।।

आनंद और स्वातंत्र्य की चाह प्राणी मात्र का लक्ष्य होता है। संम्पूर्ण सृष्टि हमारे अधीन रहे लेकिन हम किसी के अधीन न रहें यही जीव मात्र की कामना होती है। किन्तु जब तक हमारे भीतर जीव भाव है तब-तक हम सबके अधिपति नहीं बन सकते। सभी कल्पित पदार्थ कल्पना के अधिष्ठानभूत भगवान के ही परतंत्र हो सकते हैं। प्राणिमात्र के अंतरात्मा भगवान ही हैं। उनसे विमुख होकर नि:सत्व, नि:स्फूर्ति कौन होना चाहेगा? इसी आशय से श्री वाल्मीकि जी की प्रसिद्ध उक्ति है-
लोके न हि स विद्येत
यो न राममनुव्रत:

लोक में ऐसा कोई हुआ ही नहीं जो श्री राम का अनुगामी न हो। निजी सर्वस्व के बिना किसी को भी शांति नहीं मिल सकती। जैसे तरंग समुद्र की होती है लेकिन समुद्र तरंग का नहीं होता है। तरंग समुद्र का अनुगमन करती है उसी प्रकार प्राणी मात्र की भगवदनुगामिता है। अंतर इतना ही है कि ज्ञानी अपने प्रियतम को जानकर प्रेम करता है और दूसरे लोग उसी आनंद के लिए व्यग्र रहते हुए भी उसे जानते नहीं हैं। अस्तु स्वसंबन्धित्वेन ज्ञान पूर्वक प्रभु को ही
 गतिर्भर्त्ता प्रभु: साक्षी
 निवास: शरणं सुहृत्

जानकर उनसे ही प्रेम करना चाहिए। भगवान के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है। विशुद्ध प्रेम में कुछ भी कामना नहीं होती। इसी विशुद्ध प्रेम का वर्णन देवर्षि नारद ने अपने भक्तिसूत्र में किया है।
गुणरहितं कामनारहितं
प्रतिक्षणवर्धमानं अविच्छिन्नं
सूक्ष्मतरं अनुभवरूपं प्रेमस्वरूपं

अपने पर प्रेमास्पद प्राणधन भगवान में गुण दोष देखने का अवकाश ही नहीं मिलता। वे इसलिए प्रेम नहीं करते कि हमारे भगवान गुणों की खान हैं, देवों के देव हैं, सर्वतंत्र स्वतंत्र हैं। क्योंकि किसी गुण को देखकर जो प्रेम होता है वह तो गुण न दिखने पर नष्ट हो जा सकता है। परन्तु विशुद्ध दिव्य प्रेम में गुण गणों की अपेक्षा नहीं होती है। प्रेमी अपने प्रेमास्पद से प्रेम करता ही है चाहे वह समस्त गुणों की खान हो अथवा गुण विहीन, चाहे वह सुन्दराति सुन्दर हो अथवा सौंदर्य विहीन, चाहे ऐश्वर्य सम्पन्न हों या दीन हीन दरिद्र हो। चाहे सर्वतंत्र स्वतंत्र हो या बंधन युक्त हो।

एकबार गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज श्रीमद् वृन्दावन धाम में गए। वहां व्रजेन्द्र नंदन मदन मोहन श्यामसुंदर श्री कृष्ण चंद्र के उपासकों ने उनसे कहा कि महात्मन्! - आप सौन्दर्य माधुर्य रसामृत सारभूत श्री कृष्ण चंद्र की उपासना छोड़कर श्री राघवेन्द्र की उपासना क्यों करते हैं? क्या आपको यह मालूम नहीं है कि श्री राघवेन्द्र जी १२ कला और हमारे श्री कृष्णचंद्र जी १६ कला के पूर्ण अवतार हैं। उन व्रजवासियों की ऐसी बात सुनते ही श्री तुलसी दास जी महाराज ऐसे भाव विभोर हो गए कि उन्हें अपना भान ही नहीं रहा और वे बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। गोस्वामी जी की ऐसी दशा देखकर व्रजवासी घबराए और बेहोशी दूर करने के लिए तरह-तरह के उपाय करने लगे। उन्हें यह पश्चात्ताप भी हो रहा था कि हमने इनके उपास्य की हीनता बतलाकर इनके हृदय को कष्ट पहुंचाया है। अंततोगत्वा कुछ समय के बाद गोस्वामी जी को जब होश आया तो व्रजभक्तों के पूछने पर उन्होंने बताया कि अभी तक तो मैं श्री राघवेन्द्र जी को कौशलराज किशोर जानकर, कौशल्या अम्बा का ललन जानकर एवं श्री रघुनाथ जी के मंगलमय गुण गणों की ओर आकर्षित होकर ही उनकी उपासना करता था, किन्तु आज आपसे यह जानकर कि हमारे राघव जी भगवान के अवतार तो हैं न। चाहे वो १२ कला के हों या इससे भी कम मैं तो परम आनंद में डूब गया। इसे कहते हैं विशुद्ध प्रेम। भगवान के प्रति विशुद्ध प्रेम हुए बिना जीव का कल्याण नहीं हो सकता।