Women in Indian Air Force : संघर्ष से सफलता तक

Indian Air Force : महिला कैडेट्स के पहले बैच के संघर्ष ने लिखी अगली पीढ़ी के लिए सफलता की इबारत

Publish: Jul-07, 2020, 12:09 AM IST

Women in Indian Air Force :  संघर्ष से सफलता तक

कहानी शुरू होती है नब्बे के दशक की शुरुआत में भारतीय वायुसेना के अपनी ग़ैर तकनीकी शाखाओं में महिला अधिकारियों को शामिल करने की पहल के साथ, रक्षा मंत्रालय से महिला अधिकारियों की भर्ती के लिये अनुमोदन माँगने से। इससे पहले सेना के तीनों अंगों (आर्मी, एयर फ़ोर्स, नेवी) में कभी महिलाओं की भर्ती के बारे में संभवतः कोई विचार नहीं हुआ। सिवाय महिला चिकित्सा अधिकारियों के जो, देश की आज़ादी के समय से ही सैन्य चिकित्सकों में शामिल रहीं, लेकिन उसके बाद के चालीस वर्षों में सेना की दूसरी सभी शाखाओं में कभी महिलाओं को शामिल करने पर विचार नहीं किया गया। तो नब्बे के दशक में यह एक तरह से पहला मौक़ा था जब  
रक्षा मंत्रालय ने भी अलग अलग पहलुओं पर काफ़ी सोच विचार करने के बाद औपचारिक रूप से 26 नवम्बर 1991 को एक पॉलिसी जारी की। इसी के तुरंत बाद वायुसेना ने महिलाओं को एक अनूठे, चुनौतीपूर्ण और सम्मानजनक करियर की ओर आकर्षित करते हुए अपना पहला विज्ञापन दिया। जब तक वायुसेना के इस विज्ञापन के छपने से लेकर चयन तक की प्रक्रिया पूरी होती, भारतीय नौसेना यानी Navy और भारतीय सेना Indian Army ने भी अपने अपने विज्ञापन प्रकाशित कर दिये। जहाँ वायुसेना ने रक्षा मंत्रालय को पॉलिसी जारी करने का माध्यम बनाया, जिसमें पहले दिन से ही महिलाओं को पेंशनेबल सर्विस देने के संकेत थे, वहीं संभवतः आर्मी और नेवी ने पीछे न रहने की होड़ में रक्षा मंत्रालय से सिर्फ़ नॉमिनल सेंक्शन लेते हुए महिला अधिकारियों के अस्थायी कमिशन (शॉर्ट सर्विस कमिशन) की शुरुआत कर दी। ये माना जा सकता है कि शायद आर्मी और नेवी ने तब इस भर्ती को सिर्फ़ एक अस्थायी प्रयोग के रूप में देखा हो और महिलाओं के सेना में अधिकारी बनने को सिर्फ़ एक नयापन  लाने के शग़ल के रूप में लिया हो, जिसके स्थायी होने की सम्भावना ही उनकी दृष्टि में न रही हो। 

बहरहाल, भारतीय वायु सेना के तत्कालीन प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल निर्मल चंद्र सूरी ने प्रारम्भ से ही चयनित पहली 12 महिला कैडेट्स को पुरुष कैडेट्स के समान प्रशिक्षण की पैरवी करते हुए जुलाई 1992 से वायुसेना अकादमी में बराबरी से एक वर्ष (52 सप्ताह) का प्रशिक्षण दिलवाया। जून 1993 में जब ये महिलाएं कमीशन अधिकारी बनीं, तब वे हर तरह के चैलेंज ले सकने में सक्षम और मुस्तैद थीं और पुरुष सहयोगियों के साथ पूरी तरह सहज भी थीं। कहीं पर भी उनका महिला होना उनके लिये प्रिविलेज या सीमितता का विषय नहीं था। ये उत्सुकताओं और उम्मीदों पर खरे उतरने के दिन थे। महिला अफ़सरों में ख़ुद अपने इस नये रोल के लिए बहुत सा सम्मान तो था ही, पर उससे ज़्यादा वे इस बात के लिये सचेत थीं कि उनकी अभी की परफ़ोर्मेंस पर ही भविष्य में चयनित होने वाली महिला अधिकारियों के मापदंड तय होंगे और तभी प्रयोग के रूप में खुले इस नए कैरियर को सफल माना जायेगा। इसलिये लगभग सभी महिला अफ़सर पूरे उत्साह और कर्मठता के साथ वायु सेना का इतिहास रचने को तत्पर हो जुटी हुईं थीं। कमोबेश आर्मी और नेवी की पहले बैचेज़ की महिला अधिकारियों का अनुभव भी ऐसा ही था। 


धीरे-धीरे नयापन ख़त्म होता गया और महिला अफ़सर अपनी अपनी सेनाओं के माहौल में सीखती रहीं, जज़्ब होती रहीं। उनकी बढ़ती हुए उपस्थिति और प्रोफ़ेशनल योग्यता भी स्थापित होती रही। उनके लिये कार्यालयीन क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं (पृथक टॉयलेट्स बनने) की शुरुआत भी हुई। महिला अधिकारी अपने नये नये मक़ाम तय करती रहीं और पुरुष अधिकारियों (वरिष्ठ/ सहकर्मी/ मातहत) को अपने इनिशिएटिव्स और कार्यकुशलता से प्रभावित भी करती रहीं। इस मक़ाम पर वायुसेना द्वारा महिला अफ़सरों को पाँच वर्ष की सेवा के बाद अगले छः वर्षों का पहला एक्सटेंशन देना प्रयोग की सफलता का सशक्त हस्ताक्षर था। महिला अफ़सर बड़ी सहजता से अब कार्यप्रणाली का अभिन्न अंग बन चुकी थीं।
 
शायद ही इनमें से किसी ने महिला होने के नाते कुछ रियायतें चाही होगी, लेकिन बड़ी संख्या में महिला अधिकारी अनुशासित और स्वयंसिद्धा रहीं। परिणामतः कर्तव्यपरायणता और कार्य दक्षता के लिये साल-दर-साल महिला अधिकारियों को प्रमाणपत्रों और मेडल्स से नवाजना भी आम हो गया था। यह समय सेना के तीनों अंगों में  महिला अधिकारियों की शानदार परफ़ार्मेंस का पहला दशक था। इसी दौरान महिला अधिकारियों ने घर भी बसाये। अधिकांश ने सेना के ही पुरुष अधिकारियों से शादी की। उन महिला अधिकारियों को शायद अन्दाज़ा नहीं रहा होगा कि वे और उनका परिवार कहीं न कहीं एक अघोषित ईर्ष्या का शिकार बन रहा है, जो “डबल इनकम ग्रुप” से स्वाभाविक रूप से होनी थी। वातावरण के इन सभी फ़ैक्टर्स से अप्रभावित महिला अधिकारी अपने दोहरे दायित्वों को बख़ूबी निभाती रहीं।
 
अब तक महिला अधिकारियों के अपने-अपने ऑर्गनाईज़ेशंस में लगभग दस वर्ष हो चुके थे। अब वह समय आ रहा था, जिसमें ऑर्गनाईज़ेशन का पिरामिड संकरा होने वाला था। वायुसेना की महिला अधिकारियों को पहला झटका तब लगा जब पहले एक्सटेंशन के छः वर्षों के पूरे होते होते उनसे पेंशनेबल सर्विस के बारे में पूछने की बजाय सिर्फ़ अगले चार वर्षों तक ही सर्विस एक्सटेंड करने के लिये विकल्प माँगा गया। यह बात प्रारम्भिक पॉलिसी और विज्ञापन के ख़िलाफ़ थी। वायुसेना की महिला अधिकारी अलग-अलग समय पर इस विषय को उठाती रहीं, लेकिन ये विषय आगे बढ़े ही नहीं। फिर जैसे ही पहले बैच की महिला अधिकारियों की सर्विस के पंद्रह वर्ष पूरे होने वाले थे, उन्हें जून 2008 में सेवा समाप्ति का ‘रिलीज़ ऑर्डर’ थमा दिया गया। यह बड़ा झटका था। बस यहीं से वर्ष 2007 की अंतिम तिमाही में क़ानूनी लड़ाई का आरम्भ हुआ। विंग कमांडर अनुपमा जोशी और स्क्वाड्रन लीडर रूखसाना हक़ ने न्याय के लिये अदालत का दरवाज़ा ख़टखटाया और धीरे-धीरे वायुसेना की कुल 23 महिला अधिकारियों के अलावा आर्मी की भी कई महिला अधिकारी इस लड़ाई से जुड़ गयीं। लगभग दो वर्षों की क़ानूनी प्रक्रिया के बाद 12 मार्च 2010 को दिल्ली हाई कोर्ट ने न केवल वायुसेना की महिला अधिकारियों को तथ्यों (विज्ञापन, पॉलिसी लेटर) के आधार पर परमानेंट कमिशन का हक़ दिया, आर्मी को भी इसी प्रेसिडेंस को अपनाते हुए अपनी महिला अधिकारियों को भी पर्मानेंट कमीशन देने की सलाह दी। और इस तरह से जहाँ एक ओर भारतीय वायुसेना ने अगस्त 2010 में सभी सम्बद्ध महिला अधिकारियों को दोबारा बुला लिया (रीइंस्टेटमेंट), वहीं भारतीय सेना ने ऐसा नहीं किया और दिल्ली हाई कोर्ट के उस निर्णय के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी। इस समय तक भी नौसेना की महिला अधिकारियों ने अपने हितों के लिये न्यायिक हल पाने का प्रयास नहीं किया था। 
 

आर्मी के तल्ख़ रवैये से व्यथित आर्मी की जुझारू महिला अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट में अपनी लड़ाई लम्बे समय तक जारी रखनी पड़ी। इधर वायुसेना की महिला अधिकारियों की जीत से उत्साहित होकर नौसेना की महिला अधिकारियों ने भी उसी वर्ष अपने-अपने केस हाई कोर्ट में दायर कर दिये थे। सुप्रीम कोर्ट में लगभग दस वर्षों की जिरह के बाद इसी वर्ष यानी 17 फ़रवरी 2020 को आर्मी और 17 मार्च 2020 को नेवी की महिला अधिकारियों ने पेंशन वाली पूर्णकालिक सेवा की लड़ाई जीत ली। इस जीत से बहुत सी योग्य महिला अधिकारियों को सुरक्षित भविष्य तो मिला ही, सेना का भी बहुमूल्य अनुभव सेना में ही रहा, जिसका फ़ायदा ओर्गनाईजेशन को ही होगा। इस मक़ाम से महिला अधिकारियों को सेना में आत्मसात करने की एक दूसरी कहानी शुरू होती है, जो जारी रहेगी।

भविष्य की चुनौतियाँ 

भारतीय फ़ौज में महिला अधिकारियों की उपस्थिति का अब तीसरा दशक ख़त्म होने वाला है, लेकिन उनकी चुनौतियाँ कहीं से कम नहीं हुई हैं। पहले अस्तित्व की जद्दोजहद थी, फिर कुछ ऐसे क्षेत्रों में रास्ते बनाने की, जिनमें जीवट और स्किल साबित करना ज़रूरी था, जैसे फ़ाइटर पाइलट के रोल में महिलाओं का आना। इसके बाद अब चुनौती है करियर के ऊँचे सोपान तक पहुँच पाने की। इस मक़ाम तक पहुँचते-पहुँचते शुरुआती बैचेज़ की कई बहुआयामी महिला अधिकारी प्रमोशन से वंचित रह गयीं क्योंकि क़ानूनी लड़ाई के दौरान उनकी अनुपस्थिति और अधिकृति से सम्बंधित मुद्दों ने उन्हें पीछे कर दिया। उन्हें पर्मानेंट कमिशन मिलने के पहले करियर सम्बंधी परीक्षाओं और प्रशिक्षणों की पात्रता नहीं थी, जिसका सीधा नुक़सान उन्हें जीतकर लौटने के बाद हुआ। ऑर्गनाईजेशन ने भी अवसरों के खोने की बात तो मानी लेकिन कोई उपाय नहीं किया। ख़ैर, ऐसे कई नींव के पत्थरों की कोशिशों का नतीजा है कि प्रारम्भिक बैचेज़ के दस वर्षों बाद चयनित होकर आने वाली महिला अधिकारियों को समान एडवांस प्रशिक्षण की पात्रता हो चुकी है और इस तरह से अब वे कैरियर के उच्च शिखरों तक पहुँच सकेंगी। इस पड़ाव पर ध्यान देने की बात यह है कि देश की स्वतंत्रता के लगभग सत्तर वर्षों के बाद मेडिकल कोर की पहली महिला लेफ़्टिनेंट जनरल अभी-अभी ही बनी हैं। इसलिये नब्बे के दशक से शुरू होने वाली महिलाओं की  सफलता में ऐसे दिन आने में हो सकता है कई वर्ष लगे। लेकिन इन महिला अधिकारियों को भविष्य में मिलने वाली पूर्ण सफलता की कुंजी सिर्फ़ सतत प्रयासों और अपेक्षित धैर्य में ही छिपी है और इसीलिये प्रयोग अब भी जारी है, ये माना जायेगा।

- लेखिका रिटायर्ड विंग कमांडर हैं।