ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए

आजादी के 70 साल बाद भी मजदूरों की भी कोई गरिमा है क्या?


Updated: May-11, 2020, 08:09 PM IST

ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए
Photo courtesy : economictimes

कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों का शहरों से गांवों की ओर पलायन आर्थिक प्रगति, सामाजिक मूल्यों और राजनीतिक दायित्व के उल्टी दिशा में चलने की कथा कहता है। इस दारुण महागाथा में सैकड़ों कहानियां बिखरी पड़ी हैं जिसमें भूख, भय, दमन और बीमारी के साथ अपनों के पास पहुंचने के सुखांत के साथ- साथ रास्ते में ही मर जाने या ट्रेन से कुचल जाने के दुखांत प्रसंग शामिल हैं। 25 मार्च को अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सब कुछ बंद कर दिए जाने की घोषणा ने अपने ही देश में बेगानों की तरह रह रहे 45 करोड़ मजदूरों को और भी लाचार और बेगाना बना दिया। यह दुनिया की सबसे बड़ी तालाबंदी थी और मजदूर वर्ग के लिए उपस्थित सर्वाधिक यातनामयी जीवन। इसने मजदूरों के सामने कई सवाल खड़े कर दिए। आजादी के 70 साल बाद उनकी भी कोई गरिमा है क्या? क्या यह वही देश है जो अपने संविधान में सभी नागरिकों को कहीं आने जाने और बसने की मौलिक आजादी देता है? विभिन्न सरकारों द्वारा उन्हें औद्योगिक गतिविधियों के लिए जबरदस्ती रोके जाने पर यह भी सवाल उठता है कि मजदूर किसके हैं? वे उद्योगपतियों के हैं ? वे सरकारों के हैं, ठेकेदारों के हैं या वे ग्रामीण जमींदारों के हैं? 
हाल में ही आई एक ई- बुक जमीनी स्थिति का वर्णन करती हुई  इन तमाम सवालों को उठाती है। पुस्तक का नाम है—बार्डर्स आफ एन इपिडमिक (Borders of an Epidemic)। इस पुस्तक को तैयार किया है कोलकाता रिसर्च ग्रुप ने और इसका संपादन किया है राणाबीर समद्दार ने। तात्कालिक स्थितियों को लेकर तैयार की गई यह पुस्तक दीर्घकालिक सवालों को उठाती है। कुल 20 लेखकों द्वारा तैयार किए गए 14 शोध आलेखों वाली इस पुस्तक में जिन चार विषयों को उठाया गया है वे हैः-इस संकट का वैश्विक अर्थव्यवस्था और उसके आपूर्ति तंत्र पर क्या असर पड़ेगा?  दूसरा विषय है इस संकट का मजदूरों और विशेषकर प्रवासी मजदूरों पर क्या असर पड़ेगा? तीसरा विषय है सेवा और सेवा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव। चौथा विषय है नस्ल, जाति और लिंग संबंधी विभेद को किस तरह संरक्षण का हथियार बनाया जा रहा है।

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अपने लंबे संपादकीय में राणाबीर समद्दार ने ऐतिहासिक उदाहरणों से यह बताने का प्रयास किया है कि युद्ध औऱ महामारी से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं बदल जाती हैं। युद्ध से भूगोल बदल जाता है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद क्रांतियां हुईं, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपनिवेशवाद समाप्त हो गया। कहा जाता है कि प्लेग से रोम का साम्राज्य ध्वस्त हो गया था। चूंकि प्लेग ने धर्म और कानून के प्रति एक प्रकार की अवमानना पैदा की थी इसलिए दोनों कड़े कर दिए गए। उन्होंने महामारियों से समय- समय पर बने विभिन्न उद्गमों को रेखांकित करते हुए कहा है कि 19 वीं सदी के मध्य में चीन से निकला प्लेग अमेरिका, आस्ट्रेलिया और अफ्रीकी देशों में फैला। इसी तरह स्पेन के अमेरिकी देश मैक्सिको पर आक्रमण के बाद बीमारियों का इतिहास बदल गया और अमेरिकी देशों में यूरोप से तमाम बीमारियां फैल गईं। इसी प्रकार 1918-19 के ताऊन और स्पानी बुखार ने बहुत कुछ बदल दिया। उसी कड़ी में कोविड-19 ने मौजूदा उदार व्यवस्था पर गंभीर दबाव पैदा कर दिया है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार तालाबंदी और घरबंदी की गई है वह व्यवस्था पुराने यातना शिविरों से मिलती जुलती है। 
दूसरा आलेख न्यूयार्क में अध्यापन कर रहे रवि अरविंद पालत का है जो कहते हैं कि वैश्वीकरण के रास्ते पर चल रही पुरानी अर्थव्यवस्था तो मृत हो चुकी है लेकिन नई का जन्म हुआ नहीं है। निश्चित तौर पर हमारी स्मृतियों में 1918-19 की महामारी और 1929 की महामंदी आती है लेकिन आज की अर्थव्यवस्था 1929-33 की महामंदी से कहीं ज्यादा एक दूसरे से जुड़ी हुई है। चीन से होने वाला हवाई यातायात दस गुना बढ़ चुका है। लेकिन वायरस का असर अमीर और गरीब देशों में अलग अलग पड़ेगा। आने वाले समय में रोबोट और मशीनों का उपयोग बढ़ेगा और साथ ही बढ़ेगी बेरोजगारी। एक प्रकार से पूंजीवाद का स्वर्ण युग समाप्त हो रहा है। 

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तीसरा लेख आयसर मोहाली के मानविकी विभाग से संबद्ध रिताज्योति बंदोपाध्याय का है जो चंडीगढ़ में प्रवासी मजदूरों की दशा का वर्णन करते हुए बताती हैं कि किस प्रकार सब्जी बेचने वाले, फल बेचने वाले और चाय बेचने वालों का पूरा धंधा चौपट हो गया। उनका कहना है कि 2020 का यह संकट अनौपचारिक क्षेत्र को 2008-09 की मंदी के मुकाबले ज्यादा प्रभावित करेगा। तालाबंदी संभरण तंत्र(लाजिस्टिक सेक्टर) और वैसे शहरों को अधिक नुकसान पहुंचाएगी। उनके अध्ययन में चंडीगढ़ के दो छोरों पर स्थित मोहाली और पंचकुला जैसे उपनगरों से सटे गांवों का अध्ययन है। वहां तमाम प्रवासी मजदूर रह रहे थे जो महामारी के बाद संक्रमण फैलाने वाले माने जाने लगे और भागने पर मजबूर हुए। 

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एक अन्य लेख में इलाहाबाद के जीबी पंत संस्थान के निदेशक बद्री नारायण तिवारी कहते हैं कि गांवों में यह आख्यान तेजी से चल रहा है कि बीमारी पहले तब्लीगियों ने फैलाई और फिर बाहर से आने वाले मजदूरों ने। लेकिन लोग इस पर विचार करने को तैयार नहीं हैं कि सभ्यता की प्रगति आव्रजन के साथ ही होती है और फिर उसी से साथ आता है पैसा, संस्कृति और बीमारी। 1871 के प्लेग को बंगाल का प्लेग कहा जाता है लेकिन वह बंगाल में नहीं पैदा हुआ। उसका आगमन आयरिश सेना के माध्यम से हुआ था। स्माल पाक्स, प्लेग, येलो फीवर, हैजा, रसियन  फ्लू, एचआईवी यह सारी बीमारियां दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्रवासियों के माध्यम से ही फैलीं। हमारे प्रशासकों के लिए मजदूर सिर्फ जैव वैज्ञानिक इकाई हैं। उन्होंने उनके मनुष्य होने के अहसास को खत्म कर दिया है। इसीलिए उन पर बरेली में केमिकल का छिड़काव किया गया। आज इस समाज का एक मात्र मूल्य यही बचा है कि किसी तरह से अपनी जान बचाई जाए। बाकी मानवीय गरिमा के मूल्य समाप्त हो रहे हैं।

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कोलकाता रिसर्च ग्रुप की उत्सा सर्मिन ने `भूख अपमान और मृत्यु’ शीर्षक से उन मजदूरों की कहानियां लिखी हैं जो दिल्ली और मुंबई से अपने घरों की ओर लौटते हुए थक कर रास्ते में ही मर गए। मुंबई के टिस से जुड़े मनीष कुमार झा और मणिपुर के विश्वविद्यालय से जुड़े अजीत कुमार पंकज ने अपने आलेख में कहा है कि असुरक्षा और भय के कारण मजदूरों ने महामारी के समय में लंबी लंबी यात्राएं की हैं। चूंकि यह तालाबंदी बिना योजना के की गई थी इसलिए मजदूरों को सबसे ज्यादा दिक्कत का सामना करना पड़ा। राज्य उनके आवागमन पर तमाम तरह की रुकावटें लगा रहे हैं। वे जिन राज्यों में काम करने गए थे वहां उन्हें खाना नहीं मिल रहा है और अगर वे अपने प्रदेश में लौटना चाह रहे हैं तो प्रदेशों की सीमाएं सील हैं। इस दौर में लोग महज जान बचाने के लिए तमाम तरह के मानवाधिकारों के उल्लंघन को तैयार हैं। अमानवीयता एक सामान्य नियम बन चुकी है। सोशल मीडिया पर जो भी पुलिस से मानवीय व्यवहार की अपेक्षा करता है उसका मजाक उड़ाया जाता है। उससे भी ज्यादा समस्या यह है कि प्रवासी मजदूरों को उनका परिवार और गांव भी सहज स्वीकार करने को तैयार नहीं है। मजदूरों के लौटने से पंचायतें तनाव में हैं और वहां सफाई और प्रदूषण के नए नियम बन रहे हैं। गांवों के दबंग मजदूरों पर क्वारंटीन के साथ नए नियम थोप रहे हैं।
बिहारी मजदूरों की घर वापसी पर एक रिपोर्ट अनामिका प्रियदर्शी और सोनमनि चौधरी ने तैयार की है जिसमें उन्होंने बताया है कि बिहार में किस तरह से पीपीई और वेंटीलेटर का अभाव था। लेकिन धीरे धीरे सरकार ने तैयारियां कीं और गरुण ऐप के माध्यम से लौटने वाले मजदूरों का पता लगाना शुरू किया। यह देखकर हैरानी होती है कि जो सरकार जमीनी हक देने के लिए लोगों के बासकीत का परचा तैयार नहीं करती आज वह उन्हें नियंत्रित करने के लिए तमाम फौरी कार्रवाइयां करने की चुस्ती दिखा रही है।

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पत्रकार रजत राय बंगलुरू में मालदा से काम करने गए राजगीर संग्राम तुदू की कहानी के माध्यम से बताते हैं कि किस प्रकार वह एक 24 मंजिली इमारत में काम करने गया था लेकिन काम बंद होने से वहां फंस गया। उसे वहां पर भूखों रहने की नौबत आ गई क्योंकि राशन की दुकान पर लंबी लाइन लगने के कारण राशन मिलने में घंटों लग जाते थे और जब तक नंबर आए तब तक दुकान बंद हो जाती थी। प्रवासी मजदूर सड़कों पर, रेलवे लाइनों पर वापस लौटेते दिखते हैं या राहत शिविरों में घर लौटने को बेचैन तो दिखाई देते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर या प्रांतीय स्तर पर उनकी कोई आवाज नहीं है।

Click  शिवराज का एक और किसान विरोधी फैसला
पश्चिम बंगाल के सरोजिनी नायडू कालेज में पढ़ाने वाली माधुरीलता और शिबाजी बसु ने इस तालाबंदी की तुलना नोटबंदी से की है। वह फैसला भी मनमाने तरीके से लिया गया था और यह भी। उन्होंने ज्यां द्रेज के हवाले से कहा है कि मजदूरों का बड़ा वर्ग ऐसा है जो रोज कमाता है और रोज खाता है। वह 21 दिन तक काम बंद हो जाने के बाद जी नहीं सकता था। इसीलिए बड़ी संख्या में लोग घर की ओर चल पड़े और बीच में कई लोग मर गए। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि सरकार के पास आंतरिक प्रवासियों के लिए कोई नीति नहीं है। इस समय पूरी दुनिया में अंधराष्ट्रवाद और नस्लवाद पनप रहा है। अगर यूरोप में एशियाई और चीनी लोगों को हिकारत और नफरत से देखा जा रहा है तो भारत में तब्लीगी जमात के बहाने मुस्लिमों को। इस समय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 को भुला दिया गया है।
दिल्ली में अध्यापन कर रही इशिता डे ने अपने प्रपत्र में लिखा है कि सामाजिक दूरी के नारे ने नए किस्म का छुआछूत शुरू करवा दिया है और राज्य के साथ समाज के शक्तिशाली लोग मजदूरों के शरीर पर निगरानी रख रहे हैं। इसमें सबसे कड़ी निगाह उन मजदूरों पर है जो घरों के भीतर काम करते हैं। समंत विश्वास ने 2020 के इस सामाजिक विभाजन और पलायन की तुलना 1947 के भारत पाक विभाजन से की है। उन्होंने कई चित्रों और कोलाज के माध्यम से दोनों के साम्य को प्रदर्शित किया है। जबकि पाउला बनर्जी ने लैंगिक भेदभाव का प्रश्न उठाया है। उनका कहना है कि महिलाएं इस महामारी के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े पैमाने पर अपना योगदान दे रही हैं लेकिन उन्हें न तो पुरुषों के बराबर वेतन मिलता है और न ही छुट्टियां। महिलाओं को इस दौरान घरेलू हिंसा का भी ज्यादा शिकार होना पड़ रहा है। यूरोप से लेकर भारत तक इस तरह की शिकायतें बढ़ी हैं। 
कुल मिलाकर यह पुस्तक इस कठिन समय में जल्दी में तैयार किया गया एक दस्तावेज है जिसके आंकड़े तेजी से बदल रहे हैं। कुछ मामलों में परेशानियां बढ़ी हैं तो कहीं रेलगाड़ियां चलाए जाने से नए किस्म की राहत और किराए की चुनौतियां उपस्थित हुई हैं। इसलिए इसे पढ़ते पढ़ते बहुत कुछ बासी लगने लगता है। फिर भी प्रवासी मजदूरों की समस्या को केंद्र में रखकर तैयार किया गया यह शोध संकलन पठनीय है और जहां उसे किसी नीति और सिद्धांत के साथ गूंथा गया है वहां वह ज्यादा सामयिक और दीर्घकालिक बन पड़ा है। इस संकलन की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए और इसकी दृष्टि को नीति निर्माण में शामिल किया जाना चाहिए।