PM के सेक्रेटरी द्वारा CEC को समन भेजना चुनाव आयोग का अपमान: पूर्व चीफ एलेक्शन कमिश्नर

प्रधानमंत्री मोदी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त को किया तलब, चुनाव आयोग की गरिमा को कम करने की कोशिश, पूर्व CEC बोले- कल को इनका सेक्रेटरी सीजेआई को तलब करेगा तो?

Updated: Dec 18, 2021, 12:15 PM IST

PM के सेक्रेटरी द्वारा CEC को समन भेजना चुनाव आयोग का अपमान: पूर्व चीफ एलेक्शन कमिश्नर
Photo Courtesy: Mint

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सेक्रेटरी ने हाल ही में चुनाव आयोग के सर्वोच्च अधिकारियों को तलब किया। इसके लिए कानून मंत्रालय की ओर से पत्र जारी हुए जिनमें लिखा गया कि 'पीएमओ प्रिंसिपल सेक्रेटरी पीके मिश्रा एक बैठक लेंगे। इस बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्र और दोनों चुनाव आयुक्तों राजीव कुमार व अनूप चंद्र को मौजूद रहना है।' शुक्रवार को यह खबर सामने आने के बाद बवाल मच गया कि पीएम का सेक्रेटरी CEC को किस हैसियत से तलब कर सकता है।

मामले पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने गुस्सा जाहिर किया है। कुरैशी ने इस सीधे तौर पर चुनाव आयोग का अपमान बताया है। उन्होंने एक आर्टिकल में लिखा है कि शुक्रवार सुबह मैं इस खबर को पढ़कर स्तब्ध था। कुरैशी कहते हैं यह पढ़ते ही जून 2006 का वो दिन याद आ गया जब पीएमओ से मुझे बताया गया कि आपको चुनाव आयुक्त नियुक्त किया जा रहा है क्या आपको ये स्वीकार है? कुरैशी के मुताबिक ब्यूरोक्रेसी में पोस्टिंग ऑप्शनल नहीं होता, लेकिन चुनाव आयोग जैसी संस्था में पोस्टिंग से पूर्व पूछा जाता है, इसलिए कि IAS को अपने पद से इस्तीफा देना होता है।

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कुरैशी कहते हैं कि बतौर IAS आप सरकार के अधिकारी होते हैं लेकिन चुनाव आयोग की पोस्टिंग के बाद आप संवैधानिक पद पर होते हैं और सरकार के अधीन नहीं होते। प्रधानमंत्री भले ही चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कर सकते हैं लेकिन नियुक्ति के बाद न तो आर्डर दे सकते हैं और न ही हटा सकते हैं। प्रधानमंत्री का सेक्रेटरी न सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त बल्कि पूरे निर्वाचन आयोग के बेंच को तलब करे यह संविधान का उल्लंघन है, भले ही मुद्दा कितना भी बड़ा हो।

कुरैशी कहते हैं कि सेक्रेटरी तो दूर स्वयं प्रधानमंत्री को भी यह हक नहीं है कि वे इस तरह चुनाव आयुक्तों को समन भेजें। क्या आप कल्पना कर सकते हैं की कल को प्रधानमंत्री का सेक्रेटरी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को समन भेजे। पीएमओ द्वारा कहा जाए कि ज्यूडिशियल रिफॉर्म के लिए हम सुप्रीम कोर्ट की बेंच की बैठक लेंगे? ये तो कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट (अवमानना) है। निर्वाचन आयोग भी सुप्रीम कोर्ट जैसी ही स्वायत और न्यूट्रल संस्था है।

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पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी के मुताबिक समन भेजना तो दूर प्रधानमंत्री या उनका सेक्रेटरी बिना सार्वजनिक जानकारी के निर्वाचन आयोग के अधिकारियों से मुलाकात तक नहीं कर सकते। देश के सभी राजनीतिक दलों के नेता चुनाव आयोग के पास अपनी याचिका, शिकायतें और सुझाव लेकर आते हैं वो भी पूरी पारदर्शिता के साथ। चुनाव आयुक्त बनने के बाद मैने भी किसी नेता से अकेले में मुलाकात नहीं की। प्रोटोकॉल के तहत वरीयता को भी देखा जाए तो CEC का कद 9वें स्थान पर होता है जबकि पीएम के पीएम का स्थान 23वां होता है।

कुरैशी बताते हैं इलेक्टोरल रिफॉर्म को लेकर जब काम हो रहा था तब तत्कालीन कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने उन्हें बातचीत के लिए अपने ऑफिस बुलाया था लेकिन उन्होंने जाने से इनकार कर दिया था। क्योंकि ये संविधान की आत्मा को ठेस पहुंचाने वाला था। नतीजतन अगले दिन स्वयं कानून मंत्री को इनके दफ्तर आना पड़ा। कुरैशी के मुताबिक इलेक्टोरल रिफॉर्म जब आखिरी पड़ाव में था तब मोइली को कानून मंत्री के पद से हटा दिया और इसके बाद उन्होंने सीधा प्रधानमंत्री को फोन मिलाया और कहा कि ये 6 महीने के काम पर पानी फेरने वाला होगा।

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कुरैशी के मुताबिक तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि चिंता की बात नहीं है सलमान खुर्शीद इस काम को आगे बढ़ाएंगे। मैं उन्हें आपके पास जाने के लिए कहता हूं। यहां प्रधानमंत्री ने ये नहीं कहा कि आप उनसे मिल लें, बल्कि खुद कानून मंत्री को CEC के पास भेजा जो यह दर्शाता है कि निर्वाचन आयोग के सर्वोच्च पद की क्या गरिमा है। 

बता दें कि जो खबर आई थी उसके मुताबिक पीएमओ सेक्रेटरी के साथ बैठक के लिए पत्र देखकर मुख्य चुनाव आयुक्त नाराज हो गए थे। निर्वाचन आयोग के अधिकारी फिजिकली बैठक में शामिल भी नहीं हुए। हालांकि, ये सभी अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक में शामिल हुए। मीडिया सूत्रों का कहना है कि पत्र में लिखी गई भाषा सीईसी को पसंद नहीं आई। भाषा ऐसे थी जैसे कि किसी को समन भेजा जा रहा है।

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इसपर कुरैशी कहते हैं कि शुरुआत में मुझे ये जानकर अच्छा लगा कि इस पत्र को देखकर CEC नाराज हुए और इसके लिए मैं उन्हें सैल्यूट करता हूं। लेकिन वे बाद में इनफॉर्मल डिस्कशन में क्यों शामिल हुए? कौन जानता है कि चुनाव के ठीक पहले हुई इस मीटिंग के दौरान क्या बातचीत हुई? क्या इलेक्शन की तारीखों को लेकर बातचीत हुई? या कुछ और बातें हुई? यह पब्लिक नॉलेज में क्यों नहीं है? ये संविधान का उल्लंघन है और दोबारा ऐसा नहीं होना चाहिए।