आंदोलन कभी हारते नहीं 

सरकार से असहमति का अर्थ यह नहीं कि सामने वाला पक्ष देश विरोधी और गैर जिम्मेदार है, दो महीनों तक समस्या का हल न निकाल पाना केंद्र सरकार की बड़ी नाकामी

Updated: Jan 29, 2021, 09:05 PM IST

आंदोलन कभी हारते नहीं 
Photo Courtesy: India News

 

“जब कोई मरता है,

अपने कृतज्ञ देश की बांहों में

संताप समाप्त होता है, जेलों के बंधन चकनाचूर हो जाते हैं

अंततः मृत्यु से प्रारंभ होता है जीवन।"

- फिदेल कास्त्रो

दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर पिछले करीब 2 महीनों से किसान बैठे हैं। वे तीन कृषि कानूनों की मुखालफत करते हुए उन्हें वापस लिए जाने की बात पर अड़े हैं। इसी दौरान 26 जनवरी को आयोजित ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा की वजह से आंदोलन के स्वरूप व नीयत पर सवालिया निशान लगाया जा रहा है। जाहिर है सवाल तो उठेंगे ही। उनमें से कुछ वाजिब होंगे और कुछ गैर वाजिब। आरोप-प्रत्यारोप में यह होगा कि एक पक्ष आंदोलन के दौरान हुई हिंसा की आड़ लेकर कृषि कानूनों के सत्यापन का प्रयास भी करेगा और आंदोलन के उस दिन अधिकांशत: शांत रहने की बात को नजरअंदाज करेगा। यह बात मीडिया के अधिकांश वर्ग पर लागू होती है। परंतु हमें यह याद रखना होगा कि वास्तविक व उद्देश्यपूर्ण आंदोलनों की कभी हार नहीं होती। वे एक महायुद्ध लड़ रहे होते हैं, जिसमें कई बार विजेता छोटी लड़ाई हार भी जाते हैं। आंदोलन ठिठक कर रुकते जरूर हैं, कई बार वे अपने को वापस भी ले लेते हैं, परंतु अंततः वे एक शाश्वत इकाई की तरह समाज व आंदोलनकारियों के अवचेतन में प्रतिष्ठित हो जाते हैं और किसी एक दिन पुनः अवतरित भी हो जाते हैं।

वर्तमान किसान आंदोलन में अब तक करीब 150 से ज्यादा किसान अपने आप को पूर्ण समर्पित कर चुके हैं। सरकार व आंदोलनकारियों के बीच की 11 दौरों की चर्चा का परिणामहीन होना यह समझा रहा है कि गतिरोध का हल निकालने के तरीके पर कोई गंभीरता नहीं बरती जा रही है। हम देखते हैं कि राष्ट्र की सरकारें अपने विरोधी राष्ट्रों से संबंध ठीक बनाने के लिए पिछले दरवाजे से चर्चाएं हमेशा जारी रखती हैं, जबकि हम सबको यह लगता रहता है कि सब कुछ ठंडे बस्ते में चला गया है। परंतु यहां ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है। किसी भी समझौते की अनिवार्य शर्त यह है कि आपको अपने विरोधी के प्रति सम्मान का प्रदर्शन करना होगा। सरकार जिस पर कि समस्या के निराकरण की जिम्मेदारी है, उसे सही व सहनशील बनना और रहना ही पड़ेगा। परन्तु किसान आंदोलन में तो सारे अनर्गल आरोप सरकार की ओर से ही लगाए जा रहे हैं। क्यों? यह हम और आप अच्छी तरह से जानते और समझते हैं।

सरकार से असहमति का अर्थ कभी भी यह नहीं हो सकता है कि सामने वाला पक्ष देशविरोधी और गैर जिम्मेदार है, दो महीनों तक समस्या का हल न निकाल पाना केंद्र सरकार की बड़ी नाकामी है। किसान आंदोलन के ऐसे नेता जिनका कि हिंसा और षड्यंत्र में विश्वास नहीं है, उन पर हिंसा भड़काने व षड्यंत्र करने के आरोप लगाना व पुलिस रिपोर्ट में उन्हें नामजद करना, सरकार की एक और असफलता है। गौरतलब है, सरकारों के पास प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्ताओं और आंदोलन की अगुवाई करने वालों /वाली के बारे में पूरी जानकारी होती है। अधिकारी और राजनीतिज्ञ जानते हैं कि वास्तविक सच क्या है। इसके बावजूद एक बनेबनाए ढर्रे पर कलम घसीटते रहते हैं। वे कोशिश करते हैं कि शांतिपूर्ण आंदोलन की अगुवाई करने वालों को बदनाम कर आंदोलन को बदनाम किया जाए और अंतत: इसे समाप्त कर दिया जाए अथवा करा दिया जाए।

आधुनिक प्रशासन की यही सबसे बड़ी चूक है। वे समस्या के समाधान के बजाए उसे दबा देते हैं। इसके परिणामस्वरूप वह समस्या राख के ढेर के नीचे आग की तरह कभी भी पुनः भभक सकती है। सच्चे एवं ईमानदार नेतृत्व को नस्त करने से स्थितियां बेकाबू होती चली जाती हैं और नेतृत्व कुछ ऐसे लोगों के हाथ में आ जाता है जो क्षणिक आवेश जतलाकर इसे दिशाहीनता की ओर प्रस्थान करवा देते हैं।

इसे एक जीवंत उदाहरण से समझने का प्रयास कीजिए। नर्मदा बचाओ आंदोलन की वरिष्ठ कार्यकर्ता मेधा पाटकर पर भी दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई की है। वे पिछले करीब चार दशक से सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय हैं। किसी आंदोलन में उनकी उपस्थिति मात्र ही यह संदेश देती है कि अब इसमें हिंसा और षड्यंत्र की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है। अहिंसा के प्रति उनका समर्थन कई बार आन्दोलन में चिड़चिड़ाहट तक पहुंचा देता है, परंतु सरकारें इस सत्य को स्वीकारने से डरती हैं। यदि सरकार को लोकतांत्रिक ढंग से दिल्ली में हुई हिंसा के मामले में किसी निर्णय पर पहुंचना होता, तो वे उनसे चर्चा करते और समझते कि मेधा पाटकर के रहते आंदोलन हिंसक कैसे हो गया ? इसके लिए आवश्यक यह है कि सर्वप्रथम अपने विरोधी को अपना दुश्मन न माने। यह बात दोनों पक्षों पर लागू होती है। यहां एक और तथ्य पर गौर करना आवश्यक है। तमाम लोग इस हिंसा की तुलना चौरी-चौरा में हुई हिंसा से कर रहे हैं। वहां हुई हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लिया था। यह वाकया 4 फरवरी 1922 को हुआ था। गांधी जी ने आंदोलन वापस लेते हुए कहा था कि भारतीय जनता अभी जिस तरह की वे आजादी चाहते हैं, उसके लिए तैयार नहीं है।

परंतु इसके बाद 20 वर्षों तक भारत की जनता के साथ लगातार संवाद करने के बाद 8 अगस्त 1942 को ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन की घोषणा हुई। 9 अगस्त से यह सारे भारत में शुरू हो गया था। परंतु अंग्रेजों ने 8 अगस्त 1942 की रात को ही सभी प्रमुख नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया था। गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया और सभी को स्वयं का सेनापति बनने की सलाह भी दी। बहरहाल यह आंदोलन करीब दो साल चला। इसमें कुल 940 लोग मारे गए। 1630 घायल हुए 18000 से ज्यादा नजरबंद हुए और और 60,229 लोग गिरफ्तार हुए। तत्कालीन सरकारी आंकड़े बताते हैं इस दौरान 208 पुलिस थाने, 1275 सरकारी कार्यालय 382 रेलवे स्टेशन और 945 डाकघरों को जनता ने नष्ट किया था। सच-झूठ अपनी जगह है परंतु आंदोलन दबा नहीं। इन आंकड़ों को सामने लाने का अर्थ यह है कि एक अहिंसक आंदोलन को नेतृत्वविहीन करना हमेशा खतरनाक ही सिद्ध होता है।

गौरतलब है कि 8 अगस्त को कांग्रेस अधिवेशन में प्रस्ताव पारित होने के बाद गांधी जी ने कहा था, ‘वास्तविक संघर्ष तुरंत ही प्रारंभ नहीं हो जाता आप लोगों ने कुछ अधिकार मुझे सौंपे हैं। मेरा पहला काम होगा वायसराय से मुलाकात करना और उनसे प्रार्थना करना कि कांग्रेस की मांग स्वीकार की जाए।’ परंतु वास्तव में जो हुआ वह पहले ही लिखा जा चुका है। 26 जनवरी 2021 की घटना के बाद यह आवश्यक हो जाता है कि हम महात्मा गांधी और तत्कालीन वायसराय के लिनलिथगो के संवादों पर गौर करें। ज्ञातव्य है महात्मा गांधी उस दौरान कारागार में थे। उन्होंने 31 दिसंबर 1942 को वायसराय लिखा था यह बिलकुल व्यक्तिगत पत्र है। मेरा ख्याल है हम आपस में मित्र हैं। मगर 9 अगस्त की घटनाओं से मुझे शंका हो गई है कि आप  मुझे मित्र समझते हैं या नहीं। कड़ी कार्यवाही करने के पहले आपने मुझे बुलाया क्यों नहीं ? इसी पत्र में वे उपवास का अपना निश्चय भी बताते हैं। वायसराय अपने उत्तर में लिखते हैं ‘मुझे दुख है कि इस हिंसा और अपराध के लिए एक शब्द भी नहीं लिखा।’ गांधीजी जवाब देते हैं ‘9 अगस्त की घटनाओं के लिए मुझे खेद है है किंतु क्या इसके लिए भारत सरकार को दोषी ठहराया है ? इसके अलावा जिन घटनाओं पर न तो मेरा प्रभाव है और न ही काबू तथा जिनके बारे में मुझे केवल एकतरफा बयान मिला है, उन पर मैं कोई मत प्रकट नहीं कर सकता। इस पर लिनलिथगो ने जवाब में कहा कि ‘ मेरे पास इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं है’ और लूटमार के आंदोलन के लिए कांग्रेस और उसके अधिकृत प्रवक्ता आपको जिम्मेदार मानें। इसके जवाब में गांधी जी ने लिखा ‘सरकार ने ही जनता को उघाड़कर पागलपन की सीमा तक पहुंचा दिया है मैंने जीवन भर अहिंसा के लिए प्रयत्न किया है फिर भी आप मुझ पर हिंसा का आरोप लगाते हैं, इसलिए मेरे दर्द को जब तक मरहम नहीं मिलती मैं सत्याग्रही के नियम का पालन करूंगा अर्थात शक्ति के अनुरूप उपवास करूंगा जो 9 फरवरी को शुरू होगा और 21 दिन बाद समाप्त होगा’। इसके बाद भी दोनों के बीच विस्तृत संवाद हुआ था।

इन संवादों की तारीख हटा दीजिए और मनन कीजिए क्या आज स्थितियों में ज्यादा परिवर्तन आया है ? हमें याद रखना होगा कि आंदोलन की कोई समय सीमा नहीं होती। दलितों की अस्मिता का आंदोलन सहस्त्राब्दियों से अनवरत चल रहा है। इसमें अपनी उम्मीद जागी है। आदिवासियों के आंदोलन भी शताब्दियों से चल रहे हैं, परंतु उम्मीद आज भी धूमिल है। नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे आंदोलन चार दशक के बाद अब जीत से ज्यादा स्वाभिमान की प्राप्ति के लिए संघर्षरत हैं।  सारे राजनीतिक दल जो आज सत्ता में हैं और जो कल आ सकते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि आंदोलन न तो हारते हैं और न मरते हैं। सिर्फ उनकी जीत स्थगित रहती है। वस्तुतः वे अजर अमर रहते हैं।

भारत के किसानों का आंदोलन भी ऐसा ही है। शाश्वतता के साथ वह आज नहीं तो कल अपना लक्ष्य प्राप्त कर ही लेगा। यह आन्दोलन आज अपनी विजय या जीत से ज्यादा की आकांक्षा लिए हुए है, जो अवश्य पूरी होगी। आंदोलन में गांधी की उपस्थिति इतनी व्यापक है कि वह अनुपस्थित सी हो गयी है। वह एक सुवास सी है जो दिखाई तो नहीं देती पर महसूस हमेशा होती है। अंत में गाँधी से अलग राह पकड़ उसी गंतव्य पर पहुँचने वाले कास्त्रो की ही कुछ पंक्तियाँ ‘ए मृत शरीरों/ कल तक तुम अपनी मातृभूमि की आशा थे / अपनी हड्डियों की आग से मेरे माथे पर तिलक लगा दो/ और मेरे हृदय को अपने ठन्डे हाथों से स्पर्श करो/ मेरे कानों के पास आकर चीत्कार करो/ मेरी एक-एक आह/ एक और जालिम के कानों के परदे को फाड़ देगी/ मेरे आसपास जमा हो जाओ ताकि/ मैं तुम्हारी आत्मा को आत्मसात कर सकूँ/  तुम कब्रिस्तान की वीभत्सता मुझे दे डालो/ क्योंकि गुलामी में जीवन बिताने वाले को/ आंसू कभी भी पर्याप्त नहीं होते।’

इसीलिए आंदोलनों का सर्वाधिक प्रिय नारा है ‘लड़ेंगे जीतेंगे’ ।