हिंसा: यह कोई रिटर्न गिफ्ट नहीं है

हम सबके लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि भारतीय सामाजिक संरचना में यह परिवर्तन क्यों देखने में आ रहा है कि अधिकांश असहमतियों का विरोध हिंसक होता जा रहा है.. आवश्यक है कि वर्तमान शासक व सत्तारुढ़ दल इस पर गंभीरता से विचार करें और कोशिश करें कि समाज में हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति पर तत्काल काबू पाया जाए। इसके लिए अनिवार्य शर्त है समाज व विपक्ष से संवाद.. धार्मिक अलगाव से स्थितियां प्रतिकूल ही होंगी.. सामाजिक व धार्मिक समभाव ही एकमात्र हल है और यह एक कठिन काम है। विनोबा कहते हैं, सरल काम भी किये बिना नहीं होता और कठिन काम भी करने से अवश्य हो जाता है

Updated: Jun 20, 2022, 07:54 PM IST

हिंसा: यह कोई रिटर्न गिफ्ट नहीं है

मौत का भी इलाज हो शायदजिंदगी का कोई इलाज नहीं: फिराक गोरखपुरी                                                                                     एक जुमला पिछले दिनों उछला, ‘‘रिटर्न गिफ्ट’’। यह उस वीडियो का शीर्षक है, जिसमें कुछ युवकों को दो पुलिस वाले हवालात में जानवरों की तरह नहीं पीट रहे हैं, बल्कि रुई की तरह धुनक रहे हैं। आपने कभी रजाई/गादी को सिलाई के बाद अंतिम रूप देते देखा है? उसे एक दरी के ऊपर जमीन पर बिछा देते हैं, और फिर एक लाठी लेकर उसे बेहिसाब पीटते हैं। इससे गादी या रजाई, समतल हो जाती है, उसकी मोटाई कम हो जाती है। परंतु जब मनुष्य को इस तरह पीटा जाता है, तो इसका असर उल्टा होता है। मनुष्य फूल जाता है, सूज जाता है। जहां लाठी पड़ती है, वहां निशान उभर आते हैं। बहरहाल इस वीडियो से बाहर आ रहीं चीत्कारें अंदर तक दहला रहीं थीं और यह समझ नहीं पा रहे थे कि मनुष्य कैसे इतना निष्ठुर और क्रूर हो सकता है। ये हाड़ हिला देनेवाली आवाजें लाठी मारने वाले को विचलित क्यों नहीं कर पा रहीं थीं? पर सिर्फ वे ही क्रूर नहीं हैं। जिन्होंने इस वीडियो को ‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ शीर्षक से जारी किया उनके बारे में क्या कहा जाए?

‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ सामान्यतया बच्चों के शब्दकोश के सबसे प्रिय शब्दों में से है। किसी से अपने लिए कुछ पाने की कल्पना। यह कल्पना उन्हें बेहद संप्रेषणीय बनाती है। किसी के जन्मदिन समारोह से वापस लौटते वक्त बच्चे के हाथों में जब वह उपहार ‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ आता है, तो जैसे सारा वात्सल्य और प्रेम उसकी आँखों में सिमट आता है। उसकी चाल बदल जाती है। वह एकाएक बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। उसे लगता है कि आज उसने कुछ अपना अर्जित किया है। परंतु इस वीभत्स वीडियो ने एक बेहद भावुक प्रतीक को चकनाचूर कर दिया। यह हमें दर्शाता है कि मनुष्य में कोमलता, करुणा और लगाव लगातार नष्ट होता जा रहा है। सोचिए कुछ दिन पहले जिस शब्द से बच्चों की कोमलता और करुणा प्रतिध्वनित होती थी, आज उसी शब्द से चीत्कार और रुदन की अनुभूति हो रही है। पिछले कुछ दिनों से बुलडोजर संस्कृति को प्रोत्साहन का परिणाम मुख्यतः समाज का एक ही वर्ग ‘‘मुस्लिम’’ भुगत रहा है। इन दिनों एक न्यूज चैनल पर दो न्यायाधीशॉ की टिप्पणियां प्रयागराज में श्री जावेद मोहम्मद के मकान को धराशायी किए जाने को लेकर सुनी | पहली बात तो यह है कि यह मकान उनके नाम से ही नहीं था, उनकी पत्नी के नाम से था। इसलिए नोटिस भी उन्हीं के नाम से आना था। परंतु उसे ध्वस्त कर डाला। यदि वह श्री जावेद के नाम से भी होता और अवैध भी होता तो भी उसे बिना नोटिस दिए नहीं तोड़ा जाना चाहिए था। न्यायमूर्ति ने इसे लेकर जो टिप्पणी की वह बेहद विचलित कर देती है। उनका कहना था कि मकान/भवन को ध्वस्त करना कमोवेश मृत्युदंड देने जैसा है, क्योंकि दोनों निर्णयों को पलटे जाने का कोई रास्ता नहीं होता। मृत्युदंड दे दिए जाने के बाद आप गलती का पता लग जाने पर भी जान वापस नहीं ला सकते। ठीक उसी तरह यह पता चल जाने पर निर्णय ठीक नहीं हुआ था, तो ध्वस्त मकान पुनः खड़ा नहीं हो पाएगा। इसलिए इस मामले में सबसे ज्यादा सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

इसी विषय पर दूसरे न्यायमूर्ति ने बुलडोजर न्याय की आलोचना करते हुए, एक बहुत महत्वपूर्ण और रुचिकर टिप्पणी की। प्रश्नकर्ता द्वारा प्रश्न पूछने पर उन्होंने जो जवाब दिया वह वास्तव में एक न्यायाधीश की पैनी व समावेशी दृष्टि को परिलिक्षित करता है। उन्होंने कहा कि आप जब उस दृश्य को दिखा रहीं थी, तब मैंने गिना कि जो घर गिराया जा रहा है वह उन घरों की पंक्ति में सातवां था और गली के बिल्कुल दूसरे कोने पर स्थित था। इसके पहले के छः मकान भी उसी सीध में बने थे, जिस सीध में यह आखिरी मकान था। यानी इस तरह से तो सभी अवैध निर्माण थे, तो बजाए पहले मकान से शुरु करने के आखिरी को तोड़ा गया और बाकी को नोटिस तक नहीं मिले। इससे शासन व प्रशासन की मंशा बिल्कुल स्पष्ट दिखाई दे जाती है।

‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ वाली शब्दावली का प्रयोग करना सर्वथा अनुचित लगता है। अतएव भारत की वर्तमान राजनीतिक मानसिकता को समझने के लिए, इस नवीनतम घटना ‘‘अग्निपथ’’ पर गौर करिए। यहां यह स्पष्ट कर देना निहायत जरुरी है कि हिंसा के किसी भी स्वरूप को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। हिंसा किसी भी पक्ष द्वारा की गई हो, निदंनीय ही है। नुपुर शर्मा और नवीन जिंदल के बयानों के बाद हुई हिंसा और अग्निपथ योजना की घोषणा के बाद हुई हिंसा को देखने के दो नजरिए नहीं हो सकते। असहमति व्यक्ति से हो, राजनीतिक दल से हो या किसी शासकीय नीति से, उसका विरोध तो शांतिपूर्ण ढंग से ही किया जाना चाहिए। परंतु यह दुखद है कि उपरोक्त दोनों ही परिस्थितियों में हिंसा हुई और ‘‘अग्निपथ’’ योजना के खिलाफ हिंसा बेहद उग्र होती जा रही है और बड़ी मात्रा में शासकीय संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है, उन्हें जलाया जा रहा है। परंतु शासन और प्रशासन दोनों का इन दोनों मामलों में अलग-अलग तरह से कार्यवाही किए जाने के संकेत मिल रहे हैं। राष्ट्र के नाते यह भेदभाव ठीक नहीं है। संविधान जहां समता-समानता का अधिकार देता है, तो वही कानून भी सभी वर्गों से एक ही तरह से निपटने की बात करता है। तो यह विभाजन क्यों नजर आ रहा है ?

एक ही हफ्ते में हुई हिंसा की इन वारदातों का स्वरूप अखिल भारतीय है। हिंसा की व्यापकता और उससे निपटने में क्रूरता का अतिरेक और मनमानी कानूनी व्याख्याएं भारतीय संविधान व न्याय व्यवस्था को अत्यधिक संकट में डाल रहीं हैं। पैगंबर साहब के असम्मान में बोले गए शब्दों को लेकर सरकार ने त्वरित कार्यवाही नहीं की और कमोवेश अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ने के बाद छोटी-मोटी कानूनी औपचारिकता पूरी की। मुस्लिम समाज के युवाओं की इस पर हिंसक प्रतिक्रिया सर्वथा अस्वीकार्य है। परंतु हमें यह भी देखना होगा कि कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार संस्थाओं और व्यक्तियों का रवैया भी एकतरफा न हो। राज्यों के मुख्यमंत्री किस कानूनी या संवैधानिक आधार पर बुलडोजर से मकान/भवन ढहा देने की वकालत कर रहे हैं? सजा देने की जिम्मेदारी तो न्यायालय पर है, तो उसके पहले कोई कैसे त्वरित न्याय की प्रक्रिया अपना सकता है ?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक पुस्तक “भारत के न्यायालय” का प्रकाशन किया है। इसकी प्रस्तावना में उल्लेख है, ‘‘इसका तात्पर्य यह नहीं है कि न्यायालय विवादों से मुक्त रहे हैं। यह अध्याय ऐसे ही कुछ काले क्षणों का परीक्षण करता है। न्यायिक स्वतंत्रता का प्रश्न उनमें से एक है। कुछ मौकों पर न्यायालय को सामाजिक व्यवस्था को व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विशेषाधिकार देने की प्रवृत्ति के प्रकरणों में उनके द्वारा संविधान के अनुच्छेद 25 तथा 26 के तहत अपने निर्णयों के कारण धार्मिक समूहों की नाराजगी का सामना करना पड़ा है।

इस बात में कदापि संदेह नहीं है कि विवादों के बावजूद न्यायालय हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य के सबसे महत्वपूर्ण संस्थानों में से एक था और आज भी है। यह राज्य शक्ति के संचयन के विरूद्ध महत्वपूर्ण नियंत्रण और संतुलन का केंद्र बना हुआ है।’’ न्यायालय की इस आत्म-समीक्षा के परिप्रेक्ष्य में भी हमें वर्तमान परिस्थितियों का आकलन करना जरुरी हो गया है। आज तमाम लोगों को यह महसूस हो रहा है कि न्याय व्यवस्था की सक्रियता में थोड़ी कमी आई है। पिछले दिनों जिस तरह की घटनाएं (हिंसक) हुई हैं उनमें न्यायालय से कुछ अधिक हस्तक्षेप की उम्मीद की जा रही थी। परंतु ऐसा न हो पाया। कई महत्वपूर्ण मसले वर्षों से लंबित हैं और राज्य की शक्ति का असीमित विस्तार होते जा रहा है।

हिंसा के नवीनतम मामलों में यह बात बहुत स्पष्टता से सामने आ भी रही है। इस नीति के परिणामस्वरूप सामाजिक विभाजन भी तेजी से बढ़ रहा है। मतभेद का मनभेद में बदल जाना किसी भी राष्ट्र के हित में नहीं है। न्यायालय और समाज पर जिम्मेदारी इसलिए भी बढ़ती जा रही क्योंकि भारतीय मीडिया कमोवेश एकपक्षीय हो गया है। यदि मीडिया समझदारी से काम करता तो नुपुर शर्मा वाला विवाद तूल ही नहीं पकड़ता। परंतु मीडिया के बड़े वर्ग ने ऐसा नहीं चाहा बल्कि ठीक इसके उलट कार्य किया और परिणाम हमारे सामने है। आजादी के 75 वर्षों में आजतक भारत को कोई भी देश इस तरह की नसीहत नहीं दे पाया था। परंतु अशुभ घट ही गया।

गांधी कहते हैं, ‘‘हमारे मन को रोग लग गया है। हम लगातार अपने ही बारे में क्यों सोचते रहते हैं, और दूसरे लोगों द्वारा अपने प्रति किए गए अन्यायों के बारे में मन ही मन घुलते रहते हैं? हम उन अन्यायों के बारे में क्यों नहीं सोच पाते जिनसे दूसरे लोग पीड़ित हैं? हम अपने ऊपर होने वाले अन्यायों को लेकर मन ही मन घुलते रहने से असंतुलित हो जाते हैं। दूसरों पर होने वाले अन्यायों के साथ अपने आपको जोड़ने से हम सबल बनते जाते हैं।’’

गौरतलब है पिछले कुछ वर्षों से अंग्रेजों के पहले के मुगल शासन और शासकों को लेकर तमाम तरह की बातें की जा रही हैं। अत्याचारों के प्रमाण भी हैं। परंतु आज इन सबको इतिहास और तत्कालीन राजतांत्रिक व्यवस्था के नजरिये से देखा जाना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि व्यक्ति (वादी) व्यवस्था और कानून आधारित व्यवस्थाओं में मूलभूत अंतर है। आज हम किसी व्यक्ति की सनक के मोहताज नहीं हैं। दंड देने की एक कानूनी प्रक्रिया है। अतएव इसे बनाए रखना होगा। वहीं हमें इस ऐतिहासिक तथ्य पर भी गौर करना होगा कि उसी काल में ऐसी कौन सी विशिष्ट परिस्थितियां थीं, जिसकी वजह से भारत शताब्दियों तक विश्व व्यापार का सिरमौर बना रहा। गौरतलब है कि 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक भारत की विश्व व्यापार में हिस्सेदारी 24 से 27 प्रतिशत तक की थी। इसलिए हम जब भी इतिहास का आकलन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में करेंगे तो विवाद भी खड़े होंगे।

बहरहाल यह हम सबके लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि भारतीय सामाजिक संरचना में यह परिवर्तन क्यों देखने में आ रहा है कि अधिकांश असहमतियों का विरोध हिंसक होता जा रहा है। आवश्यक है कि वर्तमान शासक व सत्तारुढ़ दल इस पर गंभीरता से विचार करें और कोशिश करें कि समाज में हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति पर तत्काल काबू पाया जाए। इसके लिए अनिवार्य शर्त है समाज व विपक्ष से संवाद | धार्मिक अलगाव से स्थितियां प्रतिकूल ही होंगी। सामाजिक व धार्मिक समभाव ही एकमात्र हल है। यह एक कठिन काम है। विनोबा कहते हैं,

‘‘सरल काम भी किये बिना नहीं होता और कठिन काम भी करने से अवश्य हो जाता है।’’

चिन्मय मिश्र

हिंसा : यह कोई रिटर्न गिफ्ट नहीं है।

मौत का भी इलाज हो शायद,

जिंदगी का कोई इलाज नहीं

फिराक गोरखपुरी

एक जुमला पिछले दिनों उछला, ‘‘रिटर्न गिफ्ट’’। यह उस वीडियो का शीर्षक है, जिसमें कुछ युवकों को दो पुलिस वाले हवालात में जानवरों की तरह नहीं पीट रहे हैं, बल्कि रुई की तरह घुनक रहे हैं। आपने कभी रजाई/गादी को सिलाई के बाद अंतिम रूप देते देखा है ? उसे एक दरी के ऊपर जमीन पर बिछा देते हैं, और फिर एक लाठी लेकर उसे बेहिसाब पीटते हैं। इससे गादी या रजाई, समतल हो जाती है, उसकी मोटाई कम हो जाती है। परंतु जब मनुष्य को इस तरह पीटा जाता है, तो इसका असर उल्टा होता है। मनुष्य फूल जाता है, सूज जाता है। जहां लाठी पड़ती है, वहां निशान उभर आते हैं। बहरहाल इस वीडियो से बाहर आ रहीं चीत्कारें अंदर तक दहला रहीं थीं और यह समझ नहीं पा रहे थे, कि मनुष्य कैसे इतना निष्ठुर और क्रूर हो सकता है। ये हाड़ हिला देने वाली आवाजें लाठी मारने वाले को विचलित क्यों नहीं कर पा रहीं थीं ? पर सिर्फ वे ही क्रूर नहीं हैं। जिन्होंने इस वीडियो को ‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ शीर्षक से जारी किया उनके बारे में क्या कहा जाए ?

‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ सामान्यतया बच्चों के शब्दकोश के सबसे प्रिय शब्दों में से है। किसी से अपने लिए कुछ पाने की कल्पना। यह कल्पना उन्हें बेहद संप्रेषणीय बनाती है। किसी के जन्मदिन समारोह से वापस लौटते वक्त बच्चे के हाथों में जब वह उपहार ‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ आता है, तो जैसे सारा वात्सल्य और प्रेम उसकी आँखों में सिमट आता है। उसकी चाल बदल जाती है। वह एकाएक बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। उसे लगता है कि आज उसने कुछ अपना अर्जित किया है। परंतु इस वीभत्स वीडियो ने एक बेहद भावुक प्रतीक को चकनाचूर कर दिया। यह हमें दर्शाता है कि मनुष्य में कोमलता, करुणा और लगाव लगातार नष्ट होता जा रहा है। सोचिए कुछ दिन पहले जिस शब्द से बच्चों की कोमलता और करुणा प्रतिध्वनित होती थी, आज उसी शब्द से चीत्कार और रुदन की अनुभूति हो रही है। पिछले कुछ दिनों से बुलडोजर संस्कृति को प्रोत्साहन का परिणाम मुख्यतः समाज का एक ही वर्ग ‘‘मुस्लिम’’ भुगत रहा है। इन दिनों एक न्यूज चैनल पर दो न्यायाधीशॉ की टिप्पणियां प्रयागराज में श्री जावेद मोहम्मद के मकान को धराशायी किए जाने को लेकर सुनी | पहली बात तो यह है कि यह मकान उनके नाम से ही नहीं था, उनकी पत्नी के नाम से था। इसलिए नोटिस भी उन्हीं के नाम से आना था। परंतु उसे ध्वस्त कर डाला। यदि वह श्री जावेद के नाम से भी होता और अवैध भी होता तो भी उसे बिना नोटिस दिए नहीं तोड़ा जाना चाहिए था। न्यायमूर्ति ने इसे लेकर जो टिप्पणी की वह बेहद विचलित कर देती है। उनका कहना था कि मकान/भवन को ध्वस्त करना कमोवेश मृत्यु दंड देने जैसा है, क्योंकि दोनों निर्णयों को पलटे जाने का कोई रास्ता नहीं होता। मृत्युदंड दे दिए जाने के बाद आप गलती का पता लग जाने पर भी जान वापस नहीं ला सकते। ठीक उसी तरह यह पता चल जाने पर निर्णय ठीक नहीं हुआ था, तो ध्वस्त मकान पुनः खड़ा नहीं हो पाएगा। इसलिए इस मामले में सबसे ज्यादा सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

इसी विषय पर दूसरे न्यायमूर्ति ने बुलडोजर न्याय की आलोचना करते हुए, एक बहुत महत्वपूर्ण और रुचिकर टिप्पणी की। प्रश्नकर्ता द्वारा प्रश्न पूछने पर उन्होंने जो जवाब दिया वह वास्तव में एक न्यायाधीश की पैनी व समावेशी दृष्टि को परिलिक्षित करता है। उन्होंने कहा कि आप जब उस दृश्य को दिखा रहीं थी, तब मैंने गिना कि जो घर गिराया जा रहा है वह उन घरों की पंक्ति में सातवां था और गली के बिल्कुल दूसरे कोने पर स्थित था। इसके पहले के छः मकान भी उसी सीध में बने थे, जिस सीध में यह आखिरी मकान था। यानी इस तरह से तो सभी अवैध निर्माण थे, तो बजाए पहले मकान से शुरु करने के आखिरी को तोड़ा गया और बाकी को नोटिस तक नहीं मिलें। इससे शासन व प्रशासन की मंशा बिल्कुल स्पष्ट दिखाई दे जाती है।

‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ वाली शब्दावली का प्रयोग करना सर्वथा अनुचित लगता है। अतएव भारत की वर्तमान राजनीतिक मानसिकता को समझने के लिए, इस नवीनतम घटना ‘‘अग्निपथ’’ पर गौर करिए। यहां यह स्पष्ट कर देना निहायत जरुरी है कि हिंसा के किसी भी स्वरूप को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। हिंसा किसी भी पक्ष द्वारा की गई हो, निदंनीय ही है। नुपुर शर्मा और नवीन जिंदल के बयानों के बाद हुई हिंसा और अग्निपथ योजना की घोषणा के बाद हुई हिंसा को देखने के दो नजरिए नहीं हो सकते। असहमति व्यक्ति से हो, राजनीतिक दल से हो या किसी शासकीय नीति से, उसका विरोध तो शांतिपूर्ण ढंग से ही किया जाना चाहिए। परंतु यह दुखद है कि उपरोक्त दोनों ही परिस्थितियों में हिंसा हुई और ‘‘अग्निपथ’’ यो जना के खिलाफ हिंसा बेहद उग्र होती जा रही है और बड़ी मात्रा में शासकीय संपत्तियों को नुक्सान पहुंचाया जा रहा है, उन्हें जलाया जा रहा है। परंतु शासन और प्रशासन दोनों का इन दोनों मामलों में अलग-अलग तरह से कार्यवाही किए जाने के संकेत मिल रहे हैं। राष्ट्र के नाते यह भेदभाव ठीक नहीं है। संविधान जहां समता-समानता का अधिकार देता है, तो वही कानून भी सभी वर्गों से एक ही तरह से निपटने की बात करता है। तो यह विभाजन क्यों नजर आ रहा है ? एक ही हफ्ते में हुई हिंसा की इन वारदातों का स्वरूप अखिल भारतीय है। हिंसा की व्यापकता और उससे निपटने में क्रूरता का अतिरेक और मनमानी कानूनी व्याख्याएं भारतीय संविधान व न्याय व्यवस्था को अत्यधिक संकट में डाल रहीं हैं। पैगंबर साहब के असम्मान में बोले गए शब्दों को लेकर सरकार ने त्वरित कार्यवाही नहीं की और कमोवेश अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ने के बाद छोटी-मोटी कानूनी औपचारिकता पूरी की। मुस्लिम समाज के युवाओं की इस पर हिंसक प्रतिक्रिया सर्वथा अस्वीकार्य है। परंतु हमें यह भी देखना होगा कि कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार संस्थाओं और व्यक्तियों का रवैया भी एकतरफा न हो। राज्यों के मुख्यमंत्री किस कानूनी या संवैधानिक आधार पर बुलडोजर से मकान/भवन ढहा देने की वकालत कर रहे हैं ? सजा देने की जिम्मेदारी तो न्यायालय पर है, तो उसके पहले कोई कैसे त्वरित न्याय की प्रक्रिया अपना सकता है ?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक पुस्तक “भारत के न्यायालय” का प्रकाशन किया है। इसकी प्रस्तावना में उल्लेख है, ‘‘इसका तात्पर्य यह नहीं है कि न्यायालय विवादों से मुक्त रहे हैं। यह अध्याय ऐसे ही कुछ काले क्षणों का परीक्षण करता है। न्यायिक स्वतंत्रता का प्रश्न उनमें से एक है। कुछ मौकों पर न्यायालय को सामाजिक व्यवस्था को व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रटा पर विशेषाधिकार देने की प्रवत्ति के प्रकरणों में उनके द्वारा संविधान के अनुच्छेद 25 तथा 26 के तहत अपने निर्णयों के कारण धार्मिक समूहों की नाराजगी का सामना करना पड़ा है। इस बात में कदापि संदेह नहीं है कि विवादों के बावजूद न्यायालय हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य के सबसे महत्वपूर्ण संस्थानों में से एक था और आज भी है। यह राज्य शक्ति के संचयन के विरूद्ध महत्वपूर्ण नियंत्रण और संतुलन का केंद्र बना हुआ है।’’ न्यायालय की इस आत्मसमीक्षा के परिप्रेक्ष्य में भी हमें वर्तमान परिस्थितियों का आकलन करना जरुरी हो गया है। आज तमाम लोगों को यह महसूस हो रहा है कि न्यायव्यवस्था की सक्रियता में थोड़ी कमी आई है। पिछले दिनों जिस तरह की घटनाएं (हिंसक) हुई हैं उनमें न्यायालय से कुछ अधिक हस्तक्षेप की उम्मीद की जा रही थी। परंतु ऐसा न हो पाया। कई महत्वपूर्ण मसले वर्षों से लंबित हैं और राज्य की शक्ति का असीमित विस्तार होते जा रहा है।

हिंसा के नवीनतम मामलों में यह बात बहुत स्पष्टता से सामने आ भी रही है। इस नीति के परिणामस्वरूप सामाजिक विभाजन भी तेजी से बढ़ रहा है। मतभेद का मनभेद में बदल जाना किसी भी राष्ट्र के हित में नहीं है। न्यायालय और समाज पर जिम्मेदारी इसलिए भी बढ़ती जा रही क्योंकि भारतीय मीडिया कमोवेश एकपक्षीय हो गया है। यदि मीडिया समझदारी से काम करता तो नुपुर शर्मा वाला विवाद तूल ही नहीं पकड़ता। परंतु मीडिया के बड़े वर्ग ने ऐसा नहीं चाहा बल्कि ठीक इसके उलट कार्य किया और परिणाम हमारे सामने है। आजादी के 75 वर्षों में आजतक भारत को कोई भी देश इस तरह की नसीहत नहीं दे पाया था। परंतु अशुभ घट ही गया।

गांधी कहते हैं, ‘‘हमारे मन को रोग लग गया है। हम लगातार अपने ही बारे में क्यों सोचते रहते हैं, और दूसरे लोगों द्वारा अपने प्रति किए गए अन्यायों के बारे में मन ही मन घुलते रहते हैं ? हम उन अन्यायों के बारे में क्यों नहीं सोच पाते जिनसे दूसरे लोग पीड़ित हैं ? हम अपने ऊपर होने वाले अन्यायों को लेकर मन ही मन घुलते रहने से असंतुलित हो जाते हैं। दूसरों पर होने वाले अन्यायों के साथ अपने आपको जोड़ने से हम सबल बनते जाते हैं।’’ गौरतलब है पिछले कुछ वर्षों से अंग्रेजों के पहले के मुगल शासन और शासकों को लेकर तमाम तरह की बातें की जा रहीं है। अत्याचारों के प्रमाण भी हैं। परंतु आज इन सबको इतिहास और तत्कालीन राजतांत्रिक व्यवस्था के नजरिये से देखा जाना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि व्यक्ति (वादी) व्यवस्था और कानून आधारित व्यवस्थाओं में मूलभूत अंतर है। आज हम किसी व्यक्ति की सनक के मोहताज नहीं हैं। दंड देने की एक कानूनी प्रक्रिया है। अतएव इसे बनाए रखना होगा। वहीं हमें इस ऐतिहासिक तथ्य पर भी गौर करना होगा कि उसी काल में ऐसी कौन सी विशिष्ट परिस्थितियां थीं, जिसकी वजह से भारत शताब्दियों तक विष्व व्यापार का सिरमौर बना रहा। गौरतलब है कि 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक भारत की विष्व व्यापार में हिस्सेदारी 24 से 27 प्रतिशत तक की थी। इसलिए हम जब भी इतिहास का आकलन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में करेंगे तो विवाद भी खड़े होंगे।

बहरहाल यह हम सबके लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि भारतीय सामाजिक संरचना में यह परिवर्तन क्यों देखने में आ रहा है कि अधिकांश असहमतियों का विरोध हिंसक क्यों होता जा रहा है। आवश्यक है कि वर्तमान शासक व सत्तारुढ़ दल इस पर गंभीरता से विचार करें और कोशिश करें कि समाज में हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति पर तत्काल काबू पाया जाए। इसके अनिवार्य शर्त है समाज व विपक्ष से संवाद | धार्मिक अलगाव से स्थितियां प्रतिकूल ही होंगी। सामाजिक व धार्मिक समभाव ही एकमात्र हल है। यह एक कठिन काम है। विनोबा कहते हैं,

‘‘सरल काम भी किये बिना नहीं होता और कठिन काम भी करने से अवश्य हो जाता है।’’

(ये लेखक के स्वतंत्र विचार हैं)