छठ महापर्व की शुरुआत, व्रतियों ने नहाय खाय के साथ आरंभ किया व्रत

लोक आस्था के चार दिवसीय महापर्व के पहले दिन छठ व्रतियों ने स्नान कर पहने नए वस्त्र, लौकी और कद्दू की सब्जी के साथ चावल का किया भोजन, शुरू की पूजा की खरीददारी

Updated: Nov 08, 2021, 02:47 PM IST

छठ महापर्व की शुरुआत, व्रतियों ने नहाय खाय के साथ आरंभ किया व्रत

आस्था के पर्व छठ की शुरुआत हो चुकी है। पहले दिन व्रतियों ने पवित्र नदियों में स्नान कर नहाय-खाय की रस्म के साथ व्रत का संकल्प लिया। दूसरे दिन व्रती खरना की रीत निभाएंगे। तीसरे अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। चौथे दिन उदय होते सूर्य को नदी या तालाब में खड़े होकर अर्घ्य देकर व्रत पूरा किया जाएगा। 

चार दिवसीय महा पर्व के पहले दिन नहाय खाय के लिए सुबह स्नान कर नए कपड़े पहनें। महिलाएं सिंदूर लगाकर छठ का प्रसाद और पकवान तैयार करने के लिए या तो मिट्टी का चूल्हा बनाएं नहीं तो गैस चूल्हे को स्वच्छता के साथ साफ करें। नहाय खाय के दिन नमक खाया जा सकता है, आज के दिन चावल और कद्दू या लौकी की सब्जी सेंधा नमक के  साथ खाई जा सकती है।

यह प्रसाद घर के सभी लोग करते हैं।  नहाया खाय के बाद छठ पूजा सामग्री खरीदने का विधान है। इसी दिन से छठ पूजन की सामग्री जैसे बांस की टोकरी, सूप, लोटा, फल, मिठाई, नरियल, गन्ना, सब्जियां खरीदी जाती हैं। पूजा में दूध, जल के लिए एक ग्लास, हल्दी, मूली और अदरक का हरा पौधा, बड़ा मीठा नींबू, शरीफा, केला और नाशपाती, पानी वाला नारियल, मिठाई, गुड़, गेहूं, चावल और आटे से बना ठेकुआ, चावल, सिंदूर, दीपक, शहद और धूप नए वस्त्र, शकरकंदी और सुथनी, पान, सुपारी भी अर्पित किया जाता है।

लोक आस्था के महापर्व को लेकर घरों से लेकर बाजार तक रौनक बढ़ने लगी है। पूजा में उपयोग होने वाले मिट्टी के हाथी और मिट्टी की कोशी तैयार भी बाजारों में उपलब्ध है। छठ के दूसरे दिन खरना होता है। इस दिन व्रती शाम को पूजा करते हैं। उस दौरान इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि पूजा के दौरान किसी तरह का शोर शराबा नहीं हो। पूजा के समय शांति होना आवश्यक है। छठ पूजा के लिए भोग के दौरान साफ-सफाई का खास ख्याल रखा जाता है। भोग बनाने वाला कोरे वस्त्र पहन कर काम करता है। वहीं साफ-सफाई से काम करने के लिए वह अंगूठी भी नहीं पहनता है। नहाय खाय में लौकी चावल खाने वाले श्रद्धालु खरना की शाम भोजन ग्रहण करते हैं।

खरना के दौरान फीकी याने बिना शक्कर की खीर बनाई जाती है, वहीं कुछ  इलाकों में गुड़ की खीर और पूड़ी का भोग लगाया जाता है। वहीं कई जगहों पर खीर पूड़ी के साथ पका केला भी अर्पित किया जाता है।

खरना के दौरान खाना खाते समय इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि जब व्रती खाना खाए तो किसी भी तरह की कोई आवाज न हो। खास तौर पर कहीं    कोई बच्चा रोए नहीं। क्योंकि खाना खाते समय अगर कोई आवाज हो जाती है तो व्रती खाना छोड़कर वहीं रुक जाता है और उसके बाद भोजन नहीं करता है। इस दौरान बचा हुआ खाना परिवार बाकी लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इसके बाद करीब 36 घंटों का निर्जला व्रत आरंभ होता है। खरना प्रसाद लेने से पहले छठी माई से व्रत पूरा करने की प्रार्थना कर आशीर्वाद लिया जाता है। व्रती का छोड़ा भोजन प्रसाद के रूप में घर के सभी लोग ग्रहण करते हैं।

 10 नवंबर को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। शाम के अर्घ्य को संझका अरग कहते हैं। वहीं संध्या में अर्घ्य अर्पण करने के बाद सूप का प्रसाद अलग रखते हैं। फिर अगले दिन सुबह के अर्घ्य के लिए उसी सूप को साफ कर तैयार कर लिया जाता है। उसी सूप में नया प्रसाद रखा जाता है। जिसे सूर्योदय से पहले ही सजा लिया जाता है। इसे भोर का अरग कहते हैं। भोर का अर्घ्य 11 नवंबर की सुबह दिया जाएगा।

नहाय-खाय- सोमवार, 8 नवंबर 2021

 खरना- मंगलवार, 9 नवंबर 2021

डूबते सूर्य को अर्घ्य- बुधवार, 10 नवंबर 2021

उगते सूर्य को अर्घ्य-गुरुवार, 11 नवंबर 2021