Rabindranath Tagore Death Anniversary: दीनो दान 

महान रचनाकार 'गुरुदेव' रबींद्रनाथ टैगोर का 7 अगस्त 1941 को अवसान हुआ था। महाकाव्य गीतांजलि के लिए टैगोर को साहित्य का नोबेल दिया गया था। यहाँ प्रस्तुत कविता 'दीनो दान' 120 वर्ष पहले लिखी गई है मगर यह आज के परिवेश में भी प्रासंगिक बनी हुई है। आज रबींद्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें इस रचना के जरिए याद कर रहा है। 

Updated: Aug-07, 2020, 08:10 PM IST

Rabindranath Tagore Death Anniversary: दीनो दान 

“उस मंदिर में कोई प्रभु नहीं हैं”, कहा सन्त ने। 

राजा क्रुद्ध हो गया;

“कोई प्रभु नहीं? हे सन्त! क्या तुम 

किसी नास्तिक जैसे नहीं बात कर रहे?

अनमोल रत्नजरित सिंहासन पर,

स्वर्णिम मूर्ति चमक रही है,

फिर भी तुम कहते वह यहाँ नहीं है?”

“खाली नहीं यह मंदिर, इसमे भरा पड़ा है 

राजसी दंभ। 

तुमने अपना ही मान बढ़ाया है, हे राजा!

संसार के स्वामी का नहीं”, 

यूं कहा सन्त ने। 

झुंझलाया था फिर राजा, “बीस लाख सिक्के सोने के 

बरसाए हमने उस महान कृति पर गगनचुंबी है जो,

और देवताओं को किया समर्पित 

सब आवश्यक अनुष्ठानों के बाद,

और तुम्हारी यह धृष्टता कि कहो

नहीं इस विराट मंदिर में भगवान”?

शांति से बोला संत, “उसी साल जब,

दो करोड़ तुम्हारी प्रजा 

पीड़ित थी भयंकर सूखे से;

रोटी और छत विहीन विपन्न लोग!

आए तुम्हारे दर पर मांगने सहारा, 

मिली बस दुत्कार,

बाध्य हुए वह ढूँढने को आसरा,

जंगलों, कन्दराओं में, पथ-किनारे वृक्षों के नीचे 

और खंडहहर पुराने मंदिरों में;

और फिर उसी साल

जब तुमने बीस लाख स्वर्ण मुद्राएं खर्च कर

बनाया अपना यह मंदिर आलीशान,

वही था वह दिन जब भगवान ने कहा:

“मेरा घर तो जगमगाता है 

सदा प्रज्ज्वलित दीपों से,

नीले गगन के बीच,

मेरे घर की बुनियादें बनीं हैं मूल्यों से:

सच, शांति, करुणा और प्रेम के। 

वह राजा, निर्धन निर्बल कृपण,

अपनी ही प्रजा को जो दे न सका 

आश्रय,

क्या वह सच में आशा रखता है 

मेरा घर बना सकने की?”

यही वह दिन था 

जब त्याग दिया प्रभु ने तुम्हारा वह मंदिर।

और जा मिले पथ किनारे कंगालों से,

पेड़ों के नीचे। 

विशाल समुद्र के झाग की रिक्तता की तरह,

तुम्हारा मंदिर भी खाली है। 

धन और दंभ मात्र का यह बुलबुला है। 

गरजा था फिर राजा,

“अरे धोखेबाज बेवकूफ इंसान,

निकल जा मेरे राज्य से अभी”। 

सन्त बोला शांति से,

“वही जगह जहां तुमने किया है निर्वासित भगवान को,

वहीं भेज दो भक्त को भी”।

(अनुवादक: गौरव)

A 120-year-old Bengali poem written by Rabindranath Tegore: Translation in English

“There is no god in that temple”, said the Saint.

The King was enraged;
“No God? Oh Saint, aren’t you speaking like an atheist?
On that throne studded with priceless gems, beams the golden idol,
And yet, you proclaim that it is empty?”

“It is not empty; rather, it is full of royal pride.
You have bestowed yourself, oh King, not the God of this world”,
Remarked the saint.

The King frowned, “2 million golden coins
were showered on that grand structure that kisses the sky,
I offered it to the Gods after performing all the necessary rituals,
And you dare claim that in such a grand temple,
There is no presence of God”?

The Saint calmly replied

“In the very year in which twenty million of your subjects were struck by a terrible drought;
The desperate masses without any food or shelter,
came begging at your door crying for help, only to be turned away,
they were forced to take refuge in forests, caves, camping under roadside foliages, derelict old temples;
and in that very year,
when you spent 2 million gold coins to build that grand temple of yours,

that was the day when God pronounced:

‘My eternal home is lit by everlasting lamps,
in the midst of an azure sky.
In my home the foundations are built with the values
of Truth, Peace, Compassion and Love.
This poverty-stricken puny miser,
Who could not provide shelter to his own homeless subjects,
Does he really fancy he can give Me a home?’

That is the day God left that Temple of yours.
And joined the poor beside the roads, under the trees.
Like the emptiness of the froth in the vast seas,
Your mundane temple is hollow.
It is just a bubble of wealth and pride.”

The enraged King howled,
“oh you sham cretin of a person,
Leave my kingdom this instant”.

The Saint replied calmly,
“To the very place to which you have exiled the Divine,
Banish now the devout too”.

- Rabindranath Tagore,
20th of Shravan, 1307 (as per Bengali Calendar)