MP में हर तीसरा व्यक्ति दूषित जल पीने को मजबूर, 33 फीसदी पानी के सैंपल हुए फेल
मध्य प्रदेश में सिर्फ 63.3 फीसदी पानी के सैंपल ही गुणवत्ता जांच में पास हुए। यानी राज्य के 36.7 फीसदी ग्रामीण पेयजल सैंपल असुरक्षित पाए गए जिनमें बैक्टीरिया और रासायनिक प्रदूषण मौजूद हैं।
भोपाल। 'जल ही जीवन है' ये मशहूर स्लोगन तो आपने जरूर सुना ही होगा। लेकिन मध्य प्रदेश में जल जीवन नहीं बल्कि मौत का कारण बनता जा रहा है। इंदौर में दूषित जल पीने से 20 लोगों की मौत हो गई जबकि सैंकड़ों लोग बीमार हैं। केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन की एक रिपोर्ट बताती है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में हर तीसरा गिलास पानी इंसान के पीने लायक नहीं है।
4 जनवरी 2026 को जारी Functionality Assessment Report के मुताबिक मध्यप्रदेश में सिर्फ 63.3% पानी के सैंपल ही गुणवत्ता जांच में पास हुए, जबकि राष्ट्रीय औसत 76% है। यानी राज्य के 36.7% ग्रामीण पेयजल सैंपल असुरक्षित पाए गए जिनमें बैक्टीरिया और रासायनिक प्रदूषण मौजूद है। अर्थात प्रदेश का हर तीसरा व्यक्ति दूषित जल पीने को मजबूर है। ये सैंपल सितंबर-अक्टूबर 2024 में राज्य के 15,000 से अधिक ग्रामीण घरों से लिए गए थे और नतीजों ने पूरे सिस्टम की विफलता उजागर कर दी।
हालात उन जगहों पर और भी भयावह हैं जहां लोगों को बचाया जाना चाहिए। सरकारी अस्पतालों में सिर्फ 12 फीसदी पानी के सैंपल माइक्रोबायोलॉजिकल जांच में पास हुए, जबकि देश का औसत 83.1% है। यानी मध्य प्रदेश के 88 फीसदी अस्पताल मरीजों को दूषित पानी पिला रहे हैं। स्कूलों में 26.7 फीसदी सैंपल फेल हुए। अर्थात प्रदेश में बच्चे रोज़ ज़हर पीकर पढ़ाई कर रहे हैं।
आदिवासी बहुल जिलों अनूपपुर और डिंडौरी में एक भी पानी का सैंपल सुरक्षित नहीं पाया गया। बालाघाट, बैतूल और छिंदवाड़ा में 50 फीसदी से ज्यादा सैंपल दूषित मिले। जल जीवन मिशन ने पाइप और नल तो लगाए लेकिन गुणवत्ता गिरती चली गई। देश में 78 फीसदी घरों में नल जल कनेक्शन है, मध्यप्रदेश में पाइप से पानी तो सप्लाई हो रहा है लेकिन नल (टैप) सिर्फ 31.5% घरों में है, जबकि राष्ट्रीय औसत 70.9 फीसदी है।
हालत ये है कि 99.1% गांवों में पाइप लाइन है, लेकिन सिर्फ 76.6% घरों में ही नल काम कर रहा है। यानी हर चौथे घर में नल या तो बंद है या पानी ही नहीं आता। और जहां पानी आता है, वह सुरक्षित नहीं। इंदौर जिले में, जिसे 100 फुआदी कनेक्टेड घोषित किया गया है, सिर्फ 33% घरों को पीने लायक साफ पानी मिलता है। केंद्र सरकार ने चेतावनी दी है कि अगर पानी की गुणवत्ता नहीं सुधरी तो 2026 में जल जीवन मिशन की फंडिंग घटाई जा सकती है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस संकट को अब औपचारिक रूप से जन स्वास्थ्य आपातकाल माना है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि “अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पेयजल का अधिकार भी शामिल है।” मौजूदा हालात एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति के दायरे में आते हैं।




