MP By Elections: दलित आदिवासी वोटर्स तय करेंगे सीएम का चेहरा, 28 में से 11 सीटें हैं आरक्षित

उपचुनाव की कुल 28 में से 10 सीटों पर लगभग 40 फीसदी एससी-एसटी मतदाता, जबकि 13 सीटों पर 20 से 30 फ़ीसदी और पाँच सीटों में 14 से 20 फीसदी है मतदाताओं की संख्या

Updated: Oct 18, 2020, 01:22 PM IST

MP By Elections: दलित आदिवासी वोटर्स तय करेंगे सीएम का चेहरा, 28 में से 11 सीटें हैं आरक्षित

भोपाल। मध्य प्रदेश उपचुनाव में उम्मीदवारों की जीत-हार का फैसला करने में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मतदाताओं की इस बार बड़ी भूमिका रहने वाली है। प्रदेश की जिन 28 सीटों पर उपचुनाव होने हैं उनमें से 10 सीटें ऐसी हैं, जिनपर 30 से 50 फीसदी वोटर्स एससी-एसटी यानी दलित आदिवासी समुदाय से आते हैं। यही नहीं तेरह विधानसभा सीटों पर इनकी संख्या 20 से 30 फीसदी है। बाकी 5 सीटों पर भी दलित आदिवासी वोटों की संख्या लगभग 20 फीसदी है।

इन 28 विधानसभा सीटों में से 9 एससी और 2 एसटी उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं यानी कि कुल 11 सीटें आरक्षित हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने आगर-मालवा को छोड़कर सभी सीटों पर जीत दर्ज की थी। आगर-मालवा में भी कांग्रेस की मात्र 2,400 वोटों से हार हुई थी। अगर ग्वालियर-चंबल अंचल की बात की जाए तो यहां जिन 16 सीटों पर चुनाव होने हैं वहां के 6 सीटें आरक्षित हैं।

इन 10 सीटों पर हैं 30 से 50 फीसदी SC-ST वोटर्स

जिन 10 सीटों पर अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के मतदाताओं की संख्या 30 से 50 फीसदी है उनमें नेपानगर (50 फीसदी), बमोरी (44 फीसदी), बदनावर (42 फीसदी), अनूपपुर (41 फीसदी) पोहरी (34 फीसदी), सांवेर (32 फीसदी), गोहद (31 फीसदी), सांची (30 फीसदी), मुंगावली (30 फीसदी) व भांडेर (30 फीसदी) शामिल है।

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इसके अलावा 20 से 30 फीसदी वोट-प्रतिशत वाले क्षेत्रों में डबरा (28%), महगांव (22%), ग्वालियर पूर्व (21%), मुरैना (21%), दिमनी (23%), करैरा (26%), अंबाह (25%), सुरखी (27%), हाट पिपलिया (27%), अशोकनगर (26%), सुवासरा (21%), जौरा (21%), आगर-मालवा (25%) शामिल है। इसके अलावा शेष पांच सीटों पर 14 से 20 फीसदी तक एससी-एसटी मतदाता हैं।

किस ओर होगा SC-ST मतदाताओं का रुख

फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि अनुसूचित जाति व जनजाति के मतदाताओं का रुख किस पार्टी की ओर होगा। लकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार के चुनाव में पिछले विधानसभा चुनाव से ज्यादा अलग स्थितियां नहीं हैं। साल 2018 के अप्रैल में भारत बंद के दौरान हुए दंगे में पांच दलितों के हत्या के बाद दलित वोटर्स का बीजेपी से जो मोहभंग हुआ वह अब भी कायम है। अगर ऐसा होता है तो 15 महीने में सत्ता से बाहर जाने वाली कांग्रेस एक बार फिर से वापसी कर सकती है।

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देश-प्रदेश में बढ़ रहे दलित उत्पीड़न के मामलों का प्रभाव

मध्यप्रदेश में पोल्स पर नजर रखने वाले लोगों का मानना है कि उपचुनाव में वोटिंग का पैटर्न साल 2018 वाला ही रहेगा। देशभर में और खासतौर पर मध्यप्रदेश बढ़ रहे दलित उत्पीड़न के मामले चुनाव को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं। माना जा रहा है कि पिछले दिनों प्रदेश में लगातार जो दलित उत्पीड़न की खबरें आई है उससे सत्तापक्ष के खिलाफ उन तबकों में आक्रोश पहले के मुताबिक ज्यादा बढ़ा है। हाल में हुए बीजेपी शासित उत्तरप्रदेश में हाथरस गैंगरेप को लेकर भी सत्तापक्ष के नेताओं के खिलाफ नाराजगी बढ़ी है।

उपचुनाव में बसपा का क्या है रोल ? 

मध्यप्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी तीसरे नंबर पर रही है और बीएसपी का रोल तब और बढ़ जाता है जब चुनाव बहुजन बहुल्य इलाकों में हो। लेकिन जानकारों का मानना है कि एक समय में दलितों के वोट पर अपना अधिकार रखने वाली पार्टी बीएसपी ने अब अपनी जमीन खो दी है। वहीं हाथरस से लेकर गुना जैसे दर्जनों मामलों में बीएसपी प्रमुख मायावती की चुप्पी से पार्टी ने अपने कैडर्स का भरोसा खो दिया है। इसके पहले भी मायावती के सक्रियता में कमी के कारण साक 2018 में बीएसपी मध्यप्रदेश में मात्र दो सीटें जितने में कामयाब हुई थी वहीं पार्टी का वोट प्रतिशत में भी साल 2013 के मुकाबले काफी गिरावट दर्ज की गई थी।

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हालांकि बीएसपी नेता लगातार दावा कर रहे हैं कि उपचुनाव के बाद हम किंग-मेकर की भूमिका में होंगे और प्रदेश में सरकार उसी पार्टी की बनेगी जिसे बीएसपी सपोर्ट करेगी। बीएसपी को कम से कम 28 में से दस सीटें जितने की उम्मीद है। हालांकि बीएसपी नेताओं की बीजेपी शासित प्रदेशों में दलित उत्पीड़न के मामलों में चुप्पी और अब किंगमेकर बताने वाले इस बयान के बाद अब पार्टी की छवि बीजेपी की 'बी-टीम' के रूप में हो गई है जिसका असर आने वाले उपचुनाव में देखने को मिल सकता है।

किसे मिलेगा आदिवासियों का समर्थन ?

उपचुनाव वाले कई सीटों पर आदिवासी मतदाता जीत हार को प्रभावित करने में सक्षम हैं। आदिवासियों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा भूमि-अधिग्रहण का है। साल 2006 में आई फॉरेस्ट राइट्स एक्ट के बाद जमीन खोने वाले आदिवासी मतदाताओं में सत्तापक्ष के प्रति आक्रोश है। कमलनाथ सरकार गिरने के बाद प्रदेश के कई हिस्सों में वन अधिकारियों के द्वारा आदिवासियों के साथ मारपीट या फसलों के जलाने की आधा-दर्जन से ज्यादा घटनाएं दर्ज की गई। वन भूमि पर अतिक्रमण के नाम पर आदिवासियों के साथ बुरा बर्ताव बीजेपी के लिए काफी हद तक नुकसानदेह साबित हो सकता है।

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वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई का इस बारे में मानना है कि सत्तापक्ष से नाराज दलित और आदिवासी मतदाओं को साधने में अगर कांग्रेस सफल रहती है तो पार्टी उपचुनाव में आसानी से 15 से ज्यादा सीटें जितने में सफल रहेगी।