बिहार-बंगाल में चुनावी रैलियां संभव हैं तो संसद का सत्र क्यों नहीं, विपक्ष का सरकार से तीखा सवाल

संसद का शीतकालीन सत्र नहीं बुलाने के मोदी सरकार के फ़ैसले पर विपक्ष के कई नेताओं ने गंभीर सवाल उठाए हैं

Updated: Dec 15, 2020, 11:49 PM IST

बिहार-बंगाल में चुनावी रैलियां संभव हैं तो संसद का सत्र क्यों नहीं, विपक्ष का सरकार से तीखा सवाल
Photo Courtesy : The Hindu

नई दिल्ली। दिल्ली में बढ़ती कोरोना महामारी का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने संसद का शीतकालीन सत्र नहीं बुलाने का फैसला किया है। संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी ने कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी को लिखे पत्र में यह जानकारी देते हुए कहा है कि अब सीधे जनवरी में संसद का बजट सत्र आयोजित किया जाएगा। सरकार के इस फैसले पर विपक्षी दलों के नेताओं ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है और सरकार की जमकर आलोचना भी की है। कांग्रेस महासचिव रणदीप सुरजेवाला ने प्रधानमंत्री मोदी पर तंज कसते हुए कहा है कि जब बिहार बंगाल में चुनावी रैलियां संभव हैं तो ऐसे में संसद का शीतकालीन सत्र आयोजित क्यों नहीं हो सकता? 

संसद में जनता के मुद्दे नहीं उठेंगे तो लोकतंत्र का अर्थ क्या बचेगा : सुरजेवाला 

कांग्रेस महासचिव और प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने प्रधानमंत्री मोदी से पूछा है कि जब संसद में जनता के मुद्दे ही नहीं उठेंगे तो लोकतंत्र का क्या अर्थ रह जाएगा? सुरजेवाला ने अपने एक ट्वीट में लिखा है, 'मोदी जी,कोरोना काल में NEET/JEE व IAS की परीक्षाएं संभव हैं। स्कूलों में कक्षाएं, यूनिवर्सिटी में परीक्षाएं संभव हैं। बिहार-बंगाल में चुनावी रैलियां संभव हैं। तो संसद का शीतकालीन सत्र क्यों नहीं? जब संसद में जनता के मुद्दे ही नहीं उठेंगे तो लोकतंत्र का अर्थ ही क्या बचेगा ? 

यह बीजेपी की गलतफहमी है कि किसान आंदोलन समय के साथ समाप्त हो जाएगा : विवेक तन्खा

विपक्ष सरकार पर आरोप लगा रहा है कि मोदी सरकार किसानों के मुद्दे से भागना चाहती है, इसलिए सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र को रद्द करना ही मुनासिब समझा है। हालांकि कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने कहा है कि अगर बीजेपी ये सोच रही है कि किसानों का आंदोलन समय के साथ समाप्त हो जाएगा और बीजेपी किसानों से छुटकारा पा लेगी तो यह उसका भ्रम है। विवेक तन्खा ने कहा है कि संसद के शीतकालीन सत्र को आयोजित न करना बीजेपी की बड़ी भूल है। अगर सत्र का आयोजन होता तो कृषक आंदोलन जैसे ज्वलंत मुद्दों पर मंथन होता और संभव है कि इसका कोई हल भी सामने आ जाता। लेकिन यह भाजपा की गलतफहमी है कि किसानों का आंदोलन समय के साथ समाप्त हो जाएगा। प्रजातांत्रिक तरीका ही ज्वलंत मुद्दों को हल करने का उत्तम तरीका है। 

ज़रूरत से ज़्यादा लोकतंत्र की बानगी देखिए : मनोज झा 

शीतकालीन सत्र को रद्द किए जाने को लेकर आरजेडी नेता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने भी केंद्र सरकार और बीजेपी पर तंज कसा है। मनोज झा ने शीतकालीन सत्र नहीं बुलाने के फैसले पर व्यंग्य करते हुए इसे ज़रूरत से ज़्यादा लोकतंत्र की मिसाल करार दिया है। मनोज झा ने कहा है कि देश में भुखमरी, बेरोज़गारी चरम पर है। किसान मज़दूर देश की सड़कों पर हैं। लेकिन सरकार की संवेदनहीनता सातवें आसमान पर है। मनोज झा ने प्रधानमंत्री मोदी पर तंज कसते हुए कहा है कि यह कैसे संभव है कि साहेबान ज़मीन का दर्द समझेंगे।' 

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सत्र के आयोजन को लेकर पत्र लिखा था, रद्द करने के लिए नहीं : अधीर रंजन चौधरी 
इससे पहले,प्रहलाद जोशी के पत्र को लेकर कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने यह आरोप लगाया कि सरकार केन्द्र सरकार के कृषि कानूनों को लेकर सदन में बहस करने से बचना चाहती है। सरकार बहस से भागना चाहती है इसलिए शीतकालीन सत्र का आयोजन नहीं करा रही है। अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि जब कई राज्यों में विधानसभा सत्र का आयोजन हो रहा है तो ऐसे में संसद में शीतकालीन सत्र का आयोजन करने से सरकार को परहेज़ क्यों है ? स्पष्ट है सरकार अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए ही ऐसा कर रही है।

अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि उन्होंने संसद का शीतकालीन सत्र आयोजित करने की मांग करते हुए पत्र लिखा था। इसे आयोजित नहीं कराने के लिए पत्र नहीं लिखा था। दरअसल तीन दिसंबर को अधीर रंजन चौधरी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने संसद के शीतकालीन सत्र को आयोजित कराने की मांग की थी। जिसे संसदीय मामलों के मंत्री प्रहलाद जोशी ने कोरोना का हवाला देकर खारिज कर दिया है।