पेगासस स्पाइवेयर के जरिए राहुल गांधी और उनके सहयोगियों की भी हुई जासूसी, रिपोर्ट में हुआ खुलासा

द वायर समेत विश्वभर के 16 प्रमुख मीडिया संस्थानों द्वारा की गई जांच में खुलासा हुआ कि भारतीय एजेंसी द्वारा पत्रकारों के अलावा देश के प्रमुख विपक्षी नेताओं की भी जासूसी की गई थी

Updated: Jul 19, 2021, 06:57 PM IST

पेगासस स्पाइवेयर के जरिए राहुल गांधी और उनके सहयोगियों की भी हुई जासूसी, रिपोर्ट में हुआ खुलासा
Photo Courtsey : IndiaToday

नई दिल्ली। पेगासस रिपोर्ट ने देशभर में तहलका मचा दिया है। इस खतरनाक स्पाइवेयर के जरिए 40 पत्रकारों की जासूसी के बाद अब देश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस नेता राहुल गांधी का नाम भी जुड़ गया है। द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक राहुल गांधी का मोबाइल नंबर भी उन 300 भारतीयों की सूची में शामिल हैं, जिनकी इजरायली स्पाईवेयर के जरिए जासूसी की गई। राहुल गांधी ने कथित जासूसी की इस घटना को भारतीय लोकतंत्र के नींव पर हमला करार देते हुए कहा है कि दोषियों कि पहचान कर उन्हें दंडित किया जाना चाहिए।

द वायर वेबपोर्टल की रिपोर्ट के मुताबिक राहुल का फोन साल 2018 के मध्य से 2019 लोकसभा चुनावों तक टारगेट पर था। इस दौरान वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और बीजेपी के खिलाफ चुनाव का नेतृत्व कर रहे थे। इतना ही नहीं राहुल गांधी के 5 दोस्तों अथवा करीबियों के भी हैंडसेट की जासूसी की गई। जबकि इनमें से कोई भी पार्टी में मुख्य भूमिका नहीं निभाता। उनके हैंडसेट सिर्फ इसलिए टारगेट पर थे क्योंकि वह राहुल के संपर्क में थे।

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इनमें राहुल के दो करीबी सहयोगी अलंकार सवाई और सचिन राव का नाम शामिल है। सचिन सीडब्ल्यूसी के मेंबर हैं तथा पार्टी कैडर को ट्रेनिंग देने का काम करते हैं। वहीं सवाई राहुल के ऑफिस में काम करते हैं और अधिकांश समय उनके साथ ही बिताते हैं। सवाई का फोन साल 2019 में ही चोरी हो गई, जबकि राव का हैंडसेट खराब होने के कारण फॉरेंसिक जांच के लिए उपलब्ध नहीं हो पाया। राहुल के फोन कि भी फॉरेंसिक जांच नहीं हो पाई क्योंकि उन्हें पहले ही शक था और वे हैंडसेट और कॉन्टैक्ट नंबर बदलते रहते हैं।

राहुल गांधी ने न्यूज़ पोर्टल द वायर को बताया कि उन्हें कई बार संदिग्ध वॉट्सऐप मैसेज प्राप्त हुए। इसके बाद उन्होंने सुरक्षा की दृष्टि से अपना फोन और नंबर बदल लिया था। ताकि आसानी से उन्हें पेगासस स्पाईवेयर का निशाना न बनाया जा सके। राहुल गांधी ने इस जासूसी को लेकर कहा कि, 'मेरे संबंध में, किसी अन्य विपक्षी नेताओं के संबंध में या वास्तव में भारत के किसी भी नागरिक जो कानून का पालन करता हो, उसका जासूसी करना निदंनीय है। यह हमारे लोकतंत्र के नींव पर हमला है। इसकी जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों का पहचान कर उन्हें कठोर सजा दी जानी चाहिए।'

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राहुल गांधी की जासूसी किए जाने की बात सामने आने के बाद अब राजनीतिक तूफान मच सकता है। चूंकि, इस स्पाइवेयर की निर्माता कंपनी NSO ग्रुप का दावा है कि वे अपना सॉफ्टवेयर सिर्फ किसी देश की सरकार को बेचते हैं, निजी संस्थान को नहीं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि यदि पत्रकारों और प्रमुख नेताओं के फोन हैक किए गए तो उसमें केंद्र सरकार की संलिप्तता जरूर रही होगी। केंद्र की मर्जी के बगैर कोई संस्थान इस तरह की जासूसी नहीं कर सकता।

इस अंदेशा को इसलिए भी बल मिलता है क्योंकि केंद्र की मोदी सरकार इस मामले में स्पष्ट प्रतिक्रिया देने से बार-बार इनकार कर रही है। केंद्र सरकार इन आरोपों का खंडन भले ही कर रही है, लेकिन यह नहीं बता रही कि सरकार द्वारा पेगासस का इस्तेमाल कभी भी किया है या नहीं। बता दें कि ऐसा ही एक घटना साल 1972 में अमेरिका में सामने आई थी। जिसमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अपने विरोधियों की जासूसी कराया था। इस वॉटरगेट स्कैंडल को लेकर अमेरिका में इतना बवाल मचा था कि राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा।

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हालांकि, भारत में इस घटना के जिम्मेदारों का इस्तीफा तो दूर यह मुद्दा पूरी तरह से कथित मेनस्ट्रीम मीडिया से गायब है। हैरानी की बात ये है कि जिन मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की जासूसी की गई, वे खुद या उनके संस्थाओं में भी इस बात को लेकर आक्रोश नहीं है और न ही वे इसे रिपोर्ट कर रहे हैं। विडंबना ये है कि भारतीय संविधान अपने नागरिकों को निजता का अधिकार देती है, लेकिन खुद संविधान के रक्षकों द्वारा ही कथित रूप से नागरिकों के इन अधिकारों की हनन की जा रही है।