बुजुर्ग अपनी जिंदगी जी चुके, हमें युवाओं को बचाना चाहिए, हालांकि यह क्रूर निर्णय- दिल्ली हाईकोर्ट

एंटी फंगल इंजेक्शन की किल्लत को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकार प्राथमिकता तय करे, युवा देश के भविष्य हैं, उन्हें बचाना ज्यादा जरूरी है

Updated: Jun 02, 2021, 09:14 AM IST

बुजुर्ग अपनी जिंदगी जी चुके, हमें युवाओं को बचाना चाहिए, हालांकि यह क्रूर निर्णय- दिल्ली हाईकोर्ट
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नई दिल्ली। देश में एक ओर म्यूकरमायकोसिस यानी ब्लैक फंगल इंफेक्शन के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं दूसरी ओर इसके इलाज में उपयोगी एंटी फंगल इंजेक्शन की घोर किल्लत है। इंजेक्शन की किल्लत को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। उच्च न्यायालय ने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा है कि हमें दुख होता है कि हमने कितने युवाओं को इस बार खो दिया।

उच्च न्यायालय ने सरकार से प्राथमिकता तय करने को कहा है। जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस जसमीत सिंह की बेंच ने कहा, 'हमें इस बीमारी की जद में आए बुजुर्गों से ज्यादा युवाओं को बचाने पर ध्यान देना होगा। आप ऐसों की जिंदगी बचाने में लगे हैं जो अपनी जिंदगी जी चुके हैं। हम नहीं कह रहे कि आप सीनियर सिटिजन्स को प्राथमिकता मत दीजिए, लेकिन अगर वैक्सीन की कमी है तो कम से कम प्राथमिकताएं तो तय करें। बुजुर्ग देश को नहीं चलाने वाले। युवाओं के ऊपर ही देश का भविष्य टिका हुआ है।'

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न्यायालय ने आगे कहा कि, 'यदि एक ही परिवार में 2 लोग बीमार हैं जिनमें एक की उम्र 80 और दूसरे की 35 वर्ष है। इंजेक्शन की सिर्फ एक खुराक है तो हम इनमें से किसे बचाने का प्रयास करेंगे। यह तय कर पाना बेहद मुश्किल है, लेकिन यदि हम इस परिस्थिति में किसी को चुनना चाहें तो हमें युवाओं को प्राथमिकता देनी होगी। हालांकि, यह बेहद ही क्रूर निर्णय है। लेकिन युवाओं के ऊपर इस देश का भविष्य है। इसलिए उन्हें सबसे पहले बचाना जरूरी है।'

दिल्ली हाईकोर्ट ने वैक्सीन और दवाओं को लेकर केंद्र सरकार की स्टेटस रिपोर्ट को अस्पष्ट और नाकाम बताया। कोर्ट ने कहा, 'हमें यह जानना है कि आज की तारीख में देश को इस 2 लाख 30 हजार के प्रोजेक्टेड आंकड़े में से कितनी दवाएं मिलीं। हमें यह नहीं जानना की आप किस कंपनी से खरीद रहे हैं। हमें बताएं कि हमें कितनी दवाएं मिली।' वैक्सीन को लेकर बेंच ने कहा कि केंद्र के पास जब वैक्सीन नहीं है, तो ऐसी घोषणाएं क्यों करते हैं।

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हाईकोर्ट ने पिछले हफ्ते ही इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि हम नर्क में जी रहे हैं। न्यायालय ने कहा था कि, 'हम इस नर्क में जीने को मजबूर हैं। हर कोई इस नर्क में जी रहा है। आज स्थिति ऐसी है, की हम चाहकर भी किसी की मदद नहीं कर सकते। हम मदद करना चाहते हैं, लेकिन हम असहाय हैं। हम किसी खास मरीज के लिए कोई आदेश जारी नहीं कर सकते, की दूसरों को छोड़कर उन्हें इलाज में प्राथमिकता दी जाए।'