दुनिया का सबसे गर्म देश बना भारत, 1877-78 जैसे अल नीनो का खतरा

दुनिया के 20 सबसे गर्म शहरों में से 19 भारत के हैं। यहां पारा 45°C पार कर गया है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 2027 तक सुपर अल नीनो ला सकता है महा-सूखा और अकाल।

Updated: Apr 22, 2026, 06:51 PM IST

देश इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि दुनिया के 20 सबसे गर्म शहरों में से 19 भारत में दर्ज किए गए हैं। 21 अप्रैल को जारी AQI.in के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के कई शहरों में तापमान 44 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। इसी बीच वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में गर्मी का असर और बढ़ सकता है। साथ ही साल 2027 तक एक शक्तिशाली सुपर अल नीनो दुनिया भर में सूखा, खाद्यान्न संकट और गंभीर जलवायु आपदा का कारण भी बन सकता है।

सबसे अधिक तापमान पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में 45 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। जबकि, बिहार के भागलपुर, ओडिशा के तालचेर और पश्चिम बंगाल के आसनसोल में पारा 44 डिग्री तक पहुंच गया है। इसके अलावा बेगूसराय, मोतिहारी, मुंगेर, भोजपुर, सिवान, बेतिया, बलांगीर, दुर्गापुर, बीरभूम, गोरखपुर, वाराणसी, रायगंज और बैंकुरा समेत कई शहर भी दुनिया के सबसे गर्म स्थानों की सूची में शामिल हैं। इस सूची में भारत के बाहर केवल नेपाल का लुंबिनी शहर शामिल है।

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मौसम विज्ञान विभाग ने चेतावनी दी है कि 22 अप्रैल से 24 अप्रैल के बीच उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत में हीटवेव की स्थिति और गंभीर हो सकती है। मौसम विभाग के अनुसार, इस दौरान अधिकतम तापमान 43 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक रह सकता है। भारत में जब अधिकतम तापमान 40 डिग्री से ऊपर पहुंचता है तो उसे हीटवेव की स्थिति माना जाता है।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस असामान्य गर्मी के पीछे कई वजहें हैं। अप्रैल के दौरान लगातार तेज धूप से जमीन तेजी से गर्म हुई है। साफ आसमान के कारण सूरज की किरणें बिना किसी रुकावट के धरती तक पहुंच रही हैं। इसके अलावा हिमालय और यूरेशिया क्षेत्र में इस बार सामान्य से कम बर्फबारी हुई थी। जिसकी वजह से गर्मी को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित करने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया कमजोर पड़ गई।

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विशेषज्ञों ने एक और बड़ी वजह हीट डोम को बताया है। यह उच्च दबाव का ऐसा क्षेत्र होता है जो गर्म हवा को किसी इलाके के ऊपर फंसा देता है। इस समय यह सिस्टम इंडो गैंगेटिक प्लेन्स और पूर्वी भारत के ऊपर सक्रिय है। यह बादल बनने से रोक रहा है और समुद्री ठंडी हवाओं को अंदर आने नहीं दे रहा है। जिसकी वजह से तापमान लगातार रिकॉर्ड स्तर पर बना हुआ है।

मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, इस साल वेस्टर्न डिस्टर्बेंस भी सामान्य से कमजोर रहे हैं। आमतौर पर ये सिस्टम उत्तर भारत में ठंडी हवाएं, बादल और प्रीमानसून बारिश लाते हैं। लेकिन इस बार इनके कमजोर पड़ने से उत्तर पश्चिम की गर्म और शुष्क हवाओं को खुला रास्ता मिल गया। यही हवाएं लू का रूप लेकर मैदानी इलाकों को और अधिक गर्म कर रही हैं।

इसके साथ ही वैज्ञानिक प्रशांत महासागर में बढ़ते समुद्री तापमान को लेकर भी चिंतित हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि समुद्र की सतह तेजी से गर्म हो रही है जो अल नीनो बनने का बड़ा संकेत है। यदि यही रुझान जारी रहा तो 2027 तक मेगा या सुपर अल नीनो बन सकता है। यह 1877-78 की ऐतिहासिक जलवायु आपदा से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। उस समय भीषण सूखा, फसल बर्बादी और अकाल की वजह से दुनिया भर में भारी जनहानि हुई थी।

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अल नीनो दक्षिणी दोलन के तहत बनने वाला अल नीनो तब होता है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इससे वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है। भारत, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और अमेजन क्षेत्र में सूखा, जंगलों में आग और भीषण गर्मी बढ़ सकती है। जबकि, अमेरिका के कुछ हिस्सों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति बन सकती है।

भारत के लिए यह स्थिति और गंभीर मानी जा रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि देश की कृषि और जल आपूर्ति काफी हद तक मानसून पर निर्भर करता है। अल नीनो की वजह से मानसून कमजोर पड़ सकता है। जिसकी वजह से उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत में लंबी अवधि तक लू चलने की आशंका है। इससे फसल उत्पादन घट सकता है। साथ ही खाद्यान्न की कीमतें बढ़ सकती हैं और जल संकट गहरा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल साल 2027 के सुपर अल नीनो को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी लेकिन मौजूदा संकेत बेहद गंभीर हैं। वैज्ञानिकों ने सरकारों से अभी से हीट एक्शन प्लान मजबूत करने, जल संरक्षण बढ़ाने और सिंचाई व्यवस्था सुधारने की तैयारी शुरू करने की सलाह दी है। ताकि संभावित जलवायु संकट के असर को कम किया जा सके।

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