हॉर्वर्ड में पत्रकारिता पढ़ाने के नाम पर ठगी गईं निधि राज़दान, लेकिन वहाँ ऐसा कोई विभाग ही नहीं

Nidhi Razdan Phishing Case: वरिष्ठ पत्रकार निधि राज़दान को हॉर्वर्ड में पत्रकारिता पढ़ाने के लिए ही दिया गया था फर्ज़ी ऑफ़र लेटर, शुक्रवार को ख़ुद निधि ने दी इस फ़िशिंग अटैक की जानकारी

Updated: Jan 16, 2021, 02:29 PM IST

हॉर्वर्ड में पत्रकारिता पढ़ाने के नाम पर ठगी गईं निधि राज़दान, लेकिन वहाँ ऐसा कोई विभाग ही नहीं
Photo Courtesy: Yahoo News

नई दिल्ली। दशकों तक एनडीटीवी के लिए काम कर चुकीं जानमानी पत्रकार और न्यूज़ एंकर निधि राज़दान ख़ुद ही जानकारी दे चुकी हैं कि किस तरह उन्हें हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता पढ़ाने का फ़र्ज़ी ऑफ़र देकर ठगा गया। अब ये बात भी सामने आ रही है कि दरअसल हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता का कोई विभाग ही नहीं है। यानी जालसाज़ों ने इतनी तेज़तर्रार पत्रकार को एक ऐसे विभाग में पढ़ाने के नाम पर महीनों तक गुमराह किया, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। निधि राज़दान अपने साथ हुई इस ऑनलाइन धोखाधड़ी का ट्विटर पर कल ही खुलासा कर चुकी हैं। उन्होंने इस मामले की शिकायत पुलिस से भी की है।

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अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक़ हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी ने अपने स्टाफ़ से जुड़े तमाम रिकॉर्ड्स और सिस्टम्स की बारीकी से छानबीन करने के बाद इस बात की पुष्टि कर दी है कि उसके पास निधि राज़दान की नियुक्ति के बारे में कोई दस्तावेज़ तो दूर ऐसी कोई सूचना तक मौजूद नहीं है। निधि राज़दान ने अपने बयान में यह तो साफ़ नहीं किया था कि उन्हें हॉर्वर्ड के किस डिपार्टमेंट या फ़ैकल्टी के नाम पर नियुक्ति का ऑफ़र दिया गया था। लेकिन यह ज़रूर बताया था कि उन्हें एसोशिएट प्रोफ़ेसर के तौर पर जर्नलिज़्म पढ़ाने का ऑफ़र मिला है। निधि ने 13 जून 2020 को सोशल मीडिया के ज़रिये इस ऑफ़र की जानकारी सबको दी थी। इस ऑफ़र के चक्कर में उन्होंने पत्रकारिता छोड़कर अध्यापन का काम शुरू करने का एलान भी कर दिया था। लेकिन अब यह बात सामने आ रही है कि हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी की फ़ैकल्टी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज़ में जर्नलिज़्म का कोई डिपार्टमेंट या कोई प्रोफेशनल स्कूल तक नहीं है।

निधि राज़दान ने शुक्रवार को जारी बयान में बताया है कि उन्हें गड़बड़ी की आशंका तब हुई जब उनकी हॉर्वर्ड ज्वाइन करने की तारीख़ सितंबर 2020 से बढ़ाकर जनवरी 2021 कर दी गई। राज़दान के मुताबिक़ उन्हें बताया गया कि यह देरी कोरोना महामारी की वजह से हो रही है। जबकि सच्चाई यह है कि  हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी उन गिने चुने संस्थानों में शामिल है, जहां महामारी की वजह से सारी पढ़ाई-लिखाई सिर्फ़ ऑनलाइन तरीक़ों से की जा रही है। यानी हॉर्वर्ड में आपने-सामने की पढ़ाई हो ही नहीं जा रही है।

अखबार के मुताबिक यह भी पता चला है कि राज़दान को दिए गए ऑफ़र लेटर और दूसरे दस्तावेज़ों में एचआर डिपार्टमेंट के अधिकारियों के तौर पर कुछ ऐसे नामों का ज़िक्र है, जिन नामों वाला कोई शख्स यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों की लिस्ट में शामिल ही नहीं है। इसके अलावा भी निधि राज़दान को भेजे गए एग्रीमेंट लेटर में कई गड़बड़ियाँ हैं। एक तो हॉर्वर्ड में अध्यापकों की नियुक्तियाँ ग्रेड के आधार पर नहीं होतीं, जैसा कि निधि राज़दान को भेजे गए दस्तावेज़ों में लिखा है। दूसरे, उसमें ऐसे कई प्रावधान शामिल हैं, जो हॉर्वर्ड के फ़ैकल्टी मेंबर्स पर लागू ही नहीं होते। अख़बार ने इस बात का खुलासा नहीं किया है कि ये प्रावधान कौन से हैं। इसके अलावा एग्रीमेंट पर दो ऐसे लोगों के दस्तख़त हैं, जिन्होंने साफ़ किया है कि उन्होंने ऐसे किसी अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

यानी कुल मिलाकर निधि राज़दान को दिया गया ऑफ़र पूरी तरह फ़र्ज़ी था, जैसा कि ख़ुद वरिष्ठ पत्रकार शुक्रवार को खुलासा कर चुकी हैं। लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस फर्ज़ीवाड़े को इतने शातिर ढंग से अंजाम दिया गया कि निधि राज़दान जैसी अनुभवी और तेज़ तर्रार पत्रकार भी कई महीने तक उसके झाँसे में रहीं।