जल्दी लॉकडाउन लगाने के बाद भी कोरोना का एपिसेंटर क्यों बन गया भारत

भारत अकेला ऐसा देश है, जहां एक दिन के भीतर 90 हजार से अधिक कोरोना मामले सामने आए हैं, ऐसा क्यों हुआ, आइए जानते हैं

Updated: Sep 20, 2020 01:16 AM IST

जल्दी लॉकडाउन लगाने के बाद भी कोरोना का एपिसेंटर क्यों बन गया भारत
Photo Courtsey: AL Jazeera

भारत में कोरोना वायरस के मामले 53 लाख के पार हो गए हैं। हर दिन एक हजार से अधिक लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। भारत पहले ही ब्राजील को पीछे छोड़ चुका है और जिस तरह से देश में संक्रमण बढ़ रहे हैं, ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले एक महीने में भारत अमेरिका को पीछे छोड़कर कोरोना के मामलों में सबसे ऊपर होगा।

अमेरिका और ब्राजील के राष्ट्रपतियों के मुकाबले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ना केवल जल्दी लॉकडाउन लगाया था, बल्कि यह पूरी दुनिया के सबसे कड़े लॉकडाउन में से एक रहा। साथ ही जहां ट्रंप और बोलसोनारो मास्क लगाने और सामाजिक दूरी बनाने को लेकर अपने अपने देश की जनता को लापरवाह बनाते रहे, वहीं मोदी ने बार बार इन प्रोटोकॉल के पालन की बात पर जोर दिया।

इसके बाद भी अब भारत दुनिया में कोरोना वायरस का एपिसेंटर बन गया है। अगस्त की शुरुआत से ही लगातार देश में कोरोना के रिकॉर्ड मामले सामने आ रहे हैं। भारत अकेला ऐसा देश है, जहां एक दिन के भीतर 90 हजार से अधिक कोरोना मामले सामने आए हैं। ऐसा क्यों हुआ, आइए जानते हैं

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लॉकडाउन समस्या का हल नहीं

इंडियन कॉउन्सिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के सदस्य और महामारी विशेषज्ञ गिरिधर बाबू का कहना है कि कोरोना वायरस पर केवल लॉकडाउन से नियंत्रण नहीं पाया जा सकता। 

उन्होंने कहा कि लॉकडाउन आपको महामारी के खिलाफ लड़ाई के लिए जरूरी आधारभूत ढांचे और अन्य तैयारियां करने के लिए समय देता है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो पाया। 

एक समय था जब मध्य अप्रैल में केंद्र सरकार ने कहा था कि लॉकडाउन से अगले महीने तक कोरोना वायरस का नामोनिशान मिट जाएगा। लेकिन आज हालात उसके उलट हैं।

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सघन आबादी

यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि भारत में निम्न आय वर्ग वाली करोड़ों की आबादी झुग्गी झोपड़ियों और सघन घरों में रहती है। इस वजह से इस आबादी में कोरोना वायरस बहुत तेजी से फैला है। अनेक शहरों में हुए सीरो सर्वे ने इस बात की पुष्टि की है।

उदाहरण के लिए मुंबई में हुए सीरो सर्वे में पाया गया कि जहां निम्न आय वर्ग के 57 प्रतिशत लोगों में एंटीबॉडी पाई गई, वहीं मध्यम और उच्च आय वर्ग के लिए यह पैमाना महज 16 फीसदी रहा। 

विशेषयों ने बताया कि झुग्गी झोपड़ियों में बहुत सारे लोगों के लिए एक ही शौचालय होता है, वे एक ही जगह से पानी भरते हैं। ऐसे में इन कारणों से निम्न आय वर्ग के बीच कोरोना संक्रमण बहुत तेजी से फैला।

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राजनीतिक और प्रशासनिक अयोग्यता

इस बात के अब बहुत सारे सबूत सामने आ चुके हैं कि महामारी का सामना करने के लिए स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर नदारद रहा। कई राज्यों में ऑक्सीजन तक ठीक तरीके से सप्लाई नहीं हो पाई। प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं ने अपने काम में कोताही बरती।

दूसरी तरफ स्वास्थ्यकर्मियों की भी कमी रही। स्वास्थ्यकर्मियों को समय और पीपीई किट और मास्क तक नहीं मिले, जिससे मरीजों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया।

सबसे ज्यादा कोताही कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग में बरती गई। कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग कोरोना वायरस प्रसार को नियंत्रित करने का महत्वपूर्ण टूल है। लेकिन दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरू जैसे महानगरों में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग टीम पर भार बढ़ता गया और सीमित कर्मचारी अपना काम नहीं कर पाए।

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टेस्टिंग में दिक्कत

भारत में टेस्टिंग को लेकर काफी समस्याएं सामने आईं। सबसे बड़ी दुविधा एंटीजन टेस्ट और आरटी पीसीआर टेस्ट को लेकर रही। एंटीजन टेस्ट से सटीक जानकारी नहीं मिलती है, इसके बाद भी अनेक राज्यों में इसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया गया।

दिल्ली जैसे शहर में एंटीजेन टेस्ट का हिस्सा 83 प्रतिशत है। वहीं कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मणिपुर में यह क्रमशः 54, 54 और 65 प्रतिशत है।

कई बार कोरोना के गंभीर लक्षण वाले मरीज भी एंटीजन टेस्ट द्वारा नेगेटिव घोषित कर दिए गए। इसके बाद आईसीएमआर ने कहा कि अगर लक्षण वाले संदिग्ध मरीजों का टेस्ट नेगेटिव आता है तो उनका फिर से आरटी पीसीआर टेस्ट किया जाए। लेकिन प्रशासनिक अक्षमता के कारण यह हो नहीं पाया। 

दूसरी तरफ भारत ने टेस्टिंग भी बहुत कम की। आज भी टेस्टिंग के मामले में भारत दुनिया में 115वें स्थान पर है। प्रति दस लाख की आबादी पर भारत में 42,170 टेस्ट हुए, जबकि अमेरिका में यह अनुपात 281,353 रहा। 

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सरकारी सहायता में कमी

लॉकडाउन के चलते अप्रैल महीने में 12 करोड़ नौकरियां चली गईं। केंद्र सरकार ने आर्थिक पैकेज का एलान किया लेकिन यह भूखमरी और गरीबी में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देश के निवासियों को मदद नहीं दे पाया। मजबूरन उन्हें काम खोजने के लिए निकलना पड़ा और खतरनाक परिस्थितियों में काम करना पड़ा। भारी संख्या में मजदूरों की आवाजाही ने कोरोना संक्रमण को गांव देहात तक भी पहुंचा दिया। 

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर शुरुआत में ही गरीबों को कुछ प्रत्यक्ष आर्थिक मदद दी जाती तो देश में कोरोना संक्रमण के हालात ऐसे नहीं होते। जिन देशों ने अपने गरीब नागरिकों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता दी, वहां कोरोना को लेकर हालात नियंत्रण में हैं।