किस्सा ए लाल किला: यानी राजतंत्र से लोकतंत्र तक सफर

अपनी गिरप्तारी के दौरान बहादुरशाह जफर ने एक गजल “बयाने-गम” लिखी। उसके कुछ शेर पर गौर करिए.... यह रिआया-ए-हिन्दतबाह हुई, कहो क्या क्या इन पे जफा हुई, जिसे देखा हाकिमे वक्त (अधिकारी वर्ग) ने, कहा ये भी काबिलेदार (फांसी पर लटकाने लायक) हैं।।

Updated: Apr 26, 2022, 11:11 AM IST

किस्सा ए लाल किला: यानी राजतंत्र से लोकतंत्र तक सफर

पिछले दिनों दिल्ली में दो प्रकार के घटनाक्रम हुए। पहला रामनवमी पर जहांगीरपुरी में भडका सांप्रदायिक तनाव और उसके बाद गुरू तेगबहादुर के 400वें प्रकाश पर्व पर लाल किले के प्रांगण में हुआ समारोह, जिसमें प्रधानमंत्री ने मुख्य उद्बोधन दिया था। उदबोधन की विषयवस्तु का निर्धारण तो वक्ता पर ही होता है। दोनों घटनाओं में वैसे तो आपसी संबंध नही है लेकिन गौर से देखें तो लगता है कि कहीं कुछ तो है जो इन दोनों को आपस में जोड़ता है। और जो जोड़ता है वह है दिल्ली शहर, लाल किला, इसकी विशिष्ट विरासत और उस विरासत की निरंतरता!

प्रेमचंद जन्म शताब्दी वर्ष, सन 1980 में मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में अमृत राय ने कहा था, “वह बड़ा अभागा दिन होगा, जब किस्सागो लोगों का ट्रेडिशन इस दुनिया से खत्म हुआ।” गौरतलब है किस्सागोई एक घटना या परिस्थिति का विस्तार है। किस्सागोई में एक किस्से में से दूसरा किस्सा निकलता है और यह क्रम चलता चला जाता है।

किस्सा सुनिये एक सच्चा किस्सा!

औरंगजेब के अत्याचारों से घबराकर कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल गुरू तेगबहादुर के पास आया, खुद की रक्षा के लिए। मसला था पंडितों को इस्लाम धर्म के अन्तर्गत लाना! परिस्थितियों पर विचार करने के बाद गुरू ने कहा कि यदि सम्राट मुझे इस्लाम धर्म का अनुयायी बना देता है तो ये पंडित भी मेरा अनुशरण करेंगे। यह औरंगजेब को सीधी चुनौती थी। उसने आदेश दिया कि तेगबहादुर को बेड़ियों में जकड़कर दिल्ली लाया जाए। गुरू ने गिरफ्तारी का इंतजार नहीं किया और स्वयं दिल्ली की ओर कूच कर दिया। अंततः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और लोहे के पिंजड़े में 5 नवम्बर 1675 को दिल्ली ले आया गया। दिल्ली में जो हुआ वह आप सब जानते ही हैं। राजा ने गुरू से कहा कि या तो कोई चमत्कार दिखाओ या इस्लाम कुबूल कर लो। गुरू ने मना कर दिया। उनके तीनों साथियों को उनके सामने मार डाला गया और चांदनी चौक में गुरू का सिर भी काट दिया गया। इस शहादत को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि गुरू ने यह दिखा दिया कि मनुष्य की आत्मा को पिंजरे में कैद नहीं किया जा सकता और वीरता केवल तलवार चलाने में ही नहीं हैं | जो वास्तव में साहसी हैं उन्हें मौत का डर नहीं होता। यहां (मृत्यु) अंत नहीं बल्कि परंतु अनंतता की शुरूआत है। किस्सा आगे बढ़ता है। दस बरस के गोविंद के हाथ में गुरू पिता का सिर है। बहुत बाद में वे बचित्र नाटक में लिखते हैं-

“तेगबहादुर के जाने से पूरे विश्व में मातम छा गया है,

मनुष्यों की दुनिया में कोहराम है, लेकिन देवताओं की दुनिया में उनकी प्रशंसा हो रही है |”

अब किस्सागोई हमें सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरू, गुरू गोविंद सिंह के पास ले जाती है। भारतीय सभ्यता में जिस तरह के पूर्ण पुरूष की कल्पना की जाती है, आधुनिक काल में वे उसके सबसे नजदीक पहुचते हैं। असाधारण सुंदर, अद्धितीय वीर योद्धा, बेहद विद्वान, अप्रतिम कवि, तमाम भाषाएं जानने वाले, बेहतरीन संगठक, अत्यन्त र्धेर्यवान! और जो भी कल्पना एक व्यक्ति के बारे में की जा सकती है, गुरू गोविन्द सिंह उन पर खरे उतरते हैं। औरंगजेब की सेना से (धोखे से) हुई हार के बाद वे उसे जफ़रनामा लिखते हैं, यानी अपनी विजय की गाथा। फारसी में लिखे इस पत्र में 111 पद हैं। हर पद दूसरे से बढकर। इनमें वे उन्हें दिए गए प्रत्येक धोखे का जिक्र कर रहे हैं। साथ ही इसमें ईश्वर की अनूठी आराधना भी। वे उसे चेता रहे हैं कि तुमने तुम्हारे ईश्वर की शपथ ली थी और उसे तोड़ा है। अंततः औरंगजेब ने उनपर लगे प्रतिबंध हटाए। लेकिन उससे पहले गुरू का अपना सबकुछ, परिवार तक कमोवेश नष्ट हो चुका था। सभी साहबज़ादे मारे जा चुके थे। पर बात इतने तक सीमित नहीं है। उनकी असाधारण मानवता को इस किस्से से समझिये। उनकी शिक्षा में निहित मानवता को समझिये।

किस्सा कुछ यूं है, युद्ध के दौरान कुछ सिक्खों ने गुरू से शिकायत की, कि भाई घनहैया दुश्मनों का भी सिक्खों की ही तरह प्राथमिक उपचार कर रहे हैं और उन्हें पानी पिला रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह से तो ये शत्रुओं की मदद ही कर रहे हैं। क्योंकि वे स्वस्थ होकर पुनः सिक्खों से लड़ेंगे। गुरू ने भाई घनहैया को बुलाया और इन आरोपों के बारे में तफ्तीश की | भाई ने कहा, “मेरे मालिक यह सच है कि बिना फर्क किए कि वे तुर्क हैं या सिख मैं उनका इलाज करता हूँ और पानी भी पिलाता हूं। इस तरह से तो मैं आपकी ही सेवा कर रहा हू। मैं किसी सिक्ख या तुर्क की सेवा नहीं कर रहा हूं। आपकी शिक्षा ने मेरी आखें खोल दी हैं और इस वजह से जमीन पर पड़े प्रत्येक घायल शरीर में मैं आपको ही देखता हूं। तो मैं इलाज या पानी किसी और को नहीं आपको ही दे रहा हूँ |” गुरू ने कहा, “भाई घनहैया आप महान हैं, आपने आपका लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। आपने इस जगत का भवसागर पार कर लिया है और आप जीवनमरण के चक्र से बाहर हो गए हो |”

गुरू की शिक्षा को किस हद तक आत्मसात करना होता है, यह भाई घनहैया बता देते हैं। गुरू के यहां तो मित्र व शत्रु का भेद भी खत्म हो जाता है। किस्सा और आगे बढ़ता है। औरंगजेब की मृत्यु के बाद दिल्ली के शासन के लिए भाईयों में मारकाट मची हुई थी। बाद्शाह का बड़ा बेटा मुअज्जम जिसकी कि पहले भी गुरू गोविन्द सिंह से भेंट हो चुकी थी और तब वह औरंगजेब की सेना लेकर आया था तथा युद्द लड़े बिना चला भी गया था, ने गुरू से मदद मांगी। यहां इस बात पर गौर करिए और इतिहास में खंगालिये कि गुरू गोविंद सिंह औरंगजेब के सिपहसालारों के अलावा और किन-किन से लड़े थे | वे राजा कौन थे? वे किस धर्म या मजहब के थे? याद रखिये राजा तो राजा है और गुरू-गुरू। अपने बेटों के हत्यारे के बेटे की गुरू गोविन्द सिंह ने मदद की, क्योंकि उसका संघर्ष न्यायपूर्ण हक के लिए था। अंततः मुअज्जम बहादुरशाह प्रथम के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। उसने सन 1707 से 1712 ई. तक राज किया।

बहादुरशाह प्रथम के शासनकाल के करीब 145 बरस बाद सन 1837 ईस्वी में दिल्ली की गद्दी पर बहादुरशाह ज़फ़र बैठते हैं। वह मूलतः एक कमजोर शासक थे और अग्रेजों से पेंशन भी लेते थे। उस दौर के पिछले 150 वर्ष भारतीय राजनीतिक परिदृष्य में आए बडे परिवर्तन के सूचक थे। सन 1757 में प्लासी में सिराजुददौला के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कंपनी (ब्रिटेन) के खिलाफ पहला बड़ा युद्ध हुआ था। जिसमें भारत की हार हुई और देश गुलाम हो गया। इसके ठीक 100 वर्ष पश्चात सन 1857 में कंपनी राज के खिलाफ एक तरह से राष्ट्रव्यापी स्वतंत्रता संघर्ष शुरू हुआ | दिल्ली के मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को इसकी अगुवाई के लिए चुना गया और उन्हें हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित किया गया। यह व्यापक संघर्ष था। भारत की विभिन्न रियायतों के राजा व सिपाही कंपनी बहादुर से लड़ रहे थे। कुछ अंग्रेजों की तरफ भी थे और कुछ तटस्थ भी। वैसे तटस्थ अकसर आक्रांता की ओर ही होते हैं।

तो अब लाल किले के एपिसोड पर लौटते हैं। बात कुछ यूं है कि भारतीय लड़ाई हार गए हैं। बहादुरशाह जफर को दिल्ली के उसी लाल किले में कैद कर लिया गया है जहां से वे शासन करते थे।

किस्सा आगे बढ़ता है। इस किस्से में से तमाम किस्से निकलते हैं। मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं, “बादशाह की गिरफ़्तारी के बाद उनके दो बेटे मिर्जा मुगल और मिर्जा असगर सुल्तान तथा उसके पोते मिर्जा अबुबकर हुमांयु गिरफ्तार कर लिए गए। तीनों राजपुत्रों को मेजर हडसन ने पहरे के अंदर एक रथ से रवाना करवाया। फिर शहर से एक मील दूर वह एकाएक उतरा और अपने सिपाही के हाथों से बंदूक ले तीनों को वही ठंडा कर दिया। तीनों के सिर काटकर बहादुरशाह के सामने पेश किए। कहा जाता है कि इस पर बूढे बादशाह ने अपरिसिम धैर्य के साथ कहा, “अलहमदुलिल्लाह तैमूर की औलाद ऐसी ही सुर्खरू होकर बाप के सामने आया करती थी |” एक और किस्सा है, “अंग्रेजों का प्रतिशोध इससे भी शांत नहीं हुआ और दिल्ली के खूनी दरवाजे पर इनके सिर टांगे गए और कोतवाली के सामने धड़ लटकाए गये|” इसी से जुड़ा तीसरा किस्सा भी है | इसके अनुसार, “हडसन ने शाहजादों को मारा और चुल्लु भर-भर कर उनका खून पिया और कहा कि यदि मैं उनका खून न पीता तो पागल हो जाता। इस प्रकार तैमूर का वंश खत्म किया|” एक चौथा किस्सा भी है कि बहादुरशाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अग्रेजों को जवाब दिया कि हिन्दुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आते हैं।

इस पूरे किस्से का लब्बेलुबाब यह नहीं है कि कोई पुराना हिसाब चुकता हो गया। बल्कि मुद्दा यह है कि समय के साथ व्यक्ति बदलता है। समय बदलता है तो समाज में आपसी संबंध बदलते हैं। बादशाह के बेटों के सिर भी देश के लिए कलम कर दिए जाते हैं। साथ ही यह भी मत भूलिए कि उस घनघोर पुरूष प्रधान समय और समाज में दो महान महिलाएं, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और अवध (लखनऊ) की रानी हजरत महल भी अंग्रेजों के खिलाफ टूट पड़ती हैं। इसलिए व्यक्ति को उसके जन्म से नहीं उसके कर्म से पहचानिये। आज जो सत्ता में हैं उनके पूर्वज क्या कर रहे थे उसे उतना महत्वपूर्ण नहीं माना जा रहा है | यह एक बेहतर स्थिति है। लेकिन किसी सामान्य भारतीय नागरिक को उसके जन्म या धर्म के आधार पर नीचा दिखाना बेहद दुखदायी व निदंनीय है।

अपनी गिरप्तारी के दौरान बहादुरशाह जफर ने एक गजल “बयाने-गम” लिखी। उसके कुछ शेर पर गौर करिए-

  • यह रिआया-ए-हिन्दतबाह हुई, कहो क्या क्या इन पे जफा हुई,

जिसे देखा हाकिमे वक्त (अधिकारी वर्ग) ने, कहा ये भी काबिलेदार (फांसी पर लटकाने लायक) हैं।।

  • न था शहर देहली, यह था चमन, कहो किस तरह का था यां अमन,  जो खिताब था वह मिटा दिया, फकत अब तो उजड़ा दयार है।।
  • यही तंग हाल जो सब का है, वह करिश्मा कुदरते रब का है,

जो बहार थी सो खिजा हुई, जो खिजा थी अब वह बहार है।।

तो तब लाल किले या दिल्ली की बहार पतझड़ में बदल गई थी। परंतु खास बात यह है कि गुरू जैसे महान लोगों की शिक्षा अंततः एक ऐसे समाज के निर्माण में सहायक होती है जहां पर सदभाव व आपसी सौहार्द कायम होता है। लाल किला एक ही है। इसके दो शासक हैं और दोनों की अपनी अपनी तासीर है | परंतु लाल किला तो गवाह है परिवर्तन का |

लाल किला इसके बाद एक और बड़े परिवर्तन का गवाह है। वह है राजशाही से लोकतंत्र या लोकशाही का देश में प्रवेश कर जाने का | राजशाही‘”अ” की हो या “ब” की या “क” की, वह राजशाही ही है और उसमें राजा का आदेश ही कानून है | मुगल राजवंश में बाबर भी है, अकबर भी है, जहांगीर भी है, शाहजहां भी है, औरंगजेब भी है और बहादुरशाह जफर भी। सबके अपने अपने कानून हैं | कोई सुलहे-आम की बात करता है तो कोई ताजमहल बनाता है। कोई धर्मांध हैं तो किसी के बेटे देश के लिए बलि चढ़ा दिए जाते हैं। पर अब भारत का एक संविधान है और हर नये शासक को अब मनमानी की छूट नहीं है। अब राजाज्ञा नहीं संविधान की धाराएं और मर्यादा ही शासन का पर्याय हैं। संविधान “सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय व विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता तथा प्रतिष्ठा और अवसर की समता” की बात करता है। इस सबके अलावा वह “व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता को सर्वाधिक महत्वपूर्ण” मानता है। साफ जाहिर है, अखंडता के लिए बंधुता अनिवार्य शर्त है। संविधान बुलडोजर संस्कृति या सांप्रदायिकता या धर्मांधता की कोई गुंजाइश भारत देश में नहीं छोड़ता।

दुष्यंत कुमार लिखते हैं,

“वक्त की तकदीर स्याही से लिखी जाती नहीं,

खून में कलम डुबोने का समय आ गया |”

 

                                                                                                              ((यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं))