सर्व चैतन्य रूपां तां आद्यां विद्यां च धीमहि

मां जगदम्बा सभी प्राणियों के भीतर चैतन्य रूप में विद्यमान है

Updated: Oct-19, 2020, 07:28 AM IST

सर्व चैतन्य रूपां तां आद्यां विद्यां च धीमहि

भगवती पराम्बा के परम पावन चरित्र का दर्शन हमें श्रीमद् देवी भागवत में होता है। देवी भागवत श्री युक्त है। इसका प्रारंभ गायत्री मंत्र से होता है। श्रीमद्भागवत में भी एक शब्द गायत्री मंत्र का आता है।
सत्यं परं धीमहि
और श्रीमद् देवी भागवत में भी गायत्री मंत्र का तात्पर्यार्थ है।  

सर्व चैतन्य रूपां तां
आद्यां विद्यां च धीमहि।

हम जिन जगदम्बा की आराधना कर रहे हैं, वह मात्र जड़ प्रकृति नहीं है, वह चैतन्य रूपा है।
सर्व चैतन्य रूपां तां

सभी प्राणियों में जो चैतन्य है, वह किस रूप में है? अहं- अहं के रूप में है। मैं-मैं के रूप में जो सब प्राणियों में स्फुरित हो रहा है वह क्षेत्रज्ञ चैतन्य रूप है। उसी क्षेत्रज्ञ को यहां जगदम्बा के रूप में प्रतिपादित किया जा रहा है। वास्तव में परमात्मा ने तो स्त्रीलिंग हैं, न पुल्लिंग हैं और न नपुंसक लिंग है, अपनी भावना अनुसार हम जिस रूप में उसे देखना चाहें देख सकते हैं।

एक बार विन्ध्याचल में एक पंडित जी सप्तशती का पाठ कर रहे थे-
या देवी सर्वभूतेषु,
शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्मै नमस्तस्मै
नमस्तस्मै नमो नमः।।

पंडित जी भक्त तो बहुत थे, लेकिन व्याकरण का ज्ञान कम होने के कारण उच्चारण का दोष हो रहा था। उनके पास ही में एक वैय्याकरण बैठे थे। उन्होंने उस पंडित को डांटा और कहा तस्यै की जगह तस्मै क्यूं बोल रहा है? तू स्त्री की वंदना कर रहा कि पुरुष की? (असल स्त्रीलिंग में "तस्यै" शब्द बनता है और पुल्लिंग में "तस्मै") अब उन वैय्याकरण की बात सुनकर पंडित जी संकुचित हो गए, उन्हें बहुत दुःख हुआ। भक्त के हृदय के दुःख को भगवती सहन नहीं कर पाईं। व्याकरण के विद्वान पंडित जब रात्रि में सोये तो उन्हें छाती पर एक वज़न मालूम पड़ा। आंख खुली तो सामने एक दिव्य तेज दृष्टिगोचर हुआ। उस तेज से ही शब्द निकला-बोल मैं स्त्री हूं कि पुरुष? उसने हाथ जोड़कर कहा कि आप न स्त्री हैं न पुरुष। आपमें कोई अन्तर नहीं है। तो ये जगदम्बा सभी प्राणियों के भीतर चैतन्य रूप में विद्यमान है।
सर्व चैतन्य---
जो सब प्राणियों में चैतन्य रूप से अवस्थित हैं जो क्षेत्रों की भी क्षेत्रज्ञ है वो जगदम्बा हमारी आत्मा से अभिन्न हैं

आद्यां विद्यां च धीमहि
वह सर्व व्यापिनी जो पराशक्ति है जिसको त्रिपुर सुंदरी कहते हैं। तीनों पुरों में जो साक्षी रूप से विद्यमान है। स्थूल शरीर एक पुर, सूक्ष्म शरीर दूसरा पुर और कारण शरीर तीसरा पुर। इन तीनों पुरों की साक्षी हैं वो त्रिपुर सुंदरी हैं और जो तीनों अवस्थाओं को जानती हैं,जागृत में स्वप्न नहीं,स्वप्न में सुषुप्ति नहीं। लेकिन जो सभी अवस्थाओं में एक रस रहे।साक्षी रूप से विद्यमान रहें वह त्रिपुर सुंदरी हैं। तो परमतत्व को पराविद्या को जो अपनी आत्मा से अभिन्न समझता है वही परमात्मा का दर्शन करके बंधन से मुक्त होता है।