भगवत तत्व का बोध करवाने वाले हमारे सद्गुरु

97 वर्ष पूर्व आज ही के दिन हमारे परम पूज्य गुरुदेव का प्रादुर्भाव हुआ था। एक राम भक्त के लिए जितना महत्व श्री राम नवमी का है,एक कृष्ण भक्त के लिए जितना महत्व श्री कृष्ण जन्माष्टमी का है,उससे भी अधिक महत्व हम गुरु भक्तों के लिए तृतीया का है

Updated: Aug-22, 2020, 02:46 AM IST

भगवत तत्व का बोध करवाने वाले हमारे सद्गुरु

आज भाद्र शुक्ल तृतीया है। आज का दिन हम सभी गुरु भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि आज से 97 वर्ष पूर्व आज ही के दिन हमारे परम पूज्य गुरुदेव भगवान का पावन प्रादुर्भाव हुआ था। एक राम भक्त के लिए जितना महत्व श्री राम नवमी का है,एक कृष्ण भक्त के लिए जितना महत्व श्री कृष्ण जन्माष्टमी का है, उससे भी अधिक महत्व हम गुरु भक्तों के लिए तृतीया का है। क्योंकि हम श्रीराम श्रीकृष्ण को नहीं जानते थे भगवत तत्व का बोध तो हमारे सद्गुरु ने ही हमें कराया।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः

इसीलिए कबीर बाबा ने कहा है-
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय। 
बलिहारी गुरुदेव की जिनने गोविंद दियो बताय।।
 

इसलिए हमारे लिए अष्टमी और नवमी से अधिक महत्वपूर्ण तृतीया है।

सन 1924 में जब द्वि पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य परम पूज्य गुरुदेव भगवान का प्राकट्य हुआ उस समय भारत माता ब्रिटिश के कब्जे में थी। उन्हें मुक्त कराने के लिए आपने अपने अल्प आयु में ही घोर लड़ाई लड़ी। जननी और जन्मभूमि के ममत्त्व और उसके प्रति कर्तव्य को छोड़ पाना बड़े-बड़े विरक्तों के लिए भी दुस्त्यज  होता है, किंतु अपनी जन्म दात्री जननी और जन्मभूमि शिवनी दोनों को सहज में ही त्याग कर अपनी भारत माता को बंधन मुक्त करने के लिए प्राण और प्रण दोनों से लग गए।

उत्तर प्रदेश में वाराणसी के निकट गाजीपुर जनपद को ही आपने अपना कार्यक्षेत्र बनाया। वहां संस्कृत महाविद्यालय रामपुर में निरंतर संस्कृत व्याकरण का अध्ययन करते हुए परम पूज्य गुरुदेव भगवान ने देशभक्ति और हरि भक्ति की ऐसी अलख जगाई कि रामपुर इचवल क्षेत्र के सैकड़ों सेनानियों ने आपके नेतृत्व को स्वीकार किया और तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की गतिविधियों को अवरुद्ध कर दिया। और गाजीपुर में एक सप्ताह तक महाराज श्री का शासन रहा।

आपके इस अद्भुत उत्साह और वीरता को देखकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के क्रांतिकारी छात्रों ने भी आपका नेतृत्व स्वीकार कर काशी अंचल में सरकार के विरुद्ध जंग छेड़ दी। किंतु दुर्भाग्यवश थोड़े ही दिनों में सरकार ने पूज्य महाराज श्री को गिरफ्तार कर वाराणसी के कारागार में बंद कर दिया। लेकिन वहां भी आपने अपने समय का सदुपयोग करते हुए आंग्ल भाषा और बंग्ला भाषा का अध्ययन किया और उस में पारंगत हो गए। 9 माह की लंबी अवधि के पश्चात जब आप कारागार से मुक्त हुए तब मध्यप्रदेश की ओर चलें किन्तु नृशंस सरकार ने पुनः आपको गिरफ्तार कर नरसिंहपुर कारागार में डाल दिया। वाराणसी की गिरफ्तारी तो केवल 9 महीने की ही थी, किंतु नरसिंहपुर की गिरफ्तारी तो जीवन भर के लिए हो गई कारागार से अवश्य ही स्वल्प समय में मुक्त हो गए किंतु नरसिंहपुर के भक्तों के प्रेम बंधन ने आपको ऐसा आबद्ध किया कि अपनी तपस्थली और कर्मभूमि का मुख्यालय इसी जनपद के ज्योतिरीश्वर  क्षेत्र को बनाने का संकल्प आपने लिया। यही कारण है कि आप के सर्वाधिक आश्रम नरसिंहपुर में ही स्थित है। 

भारत की स्वतंत्रता के पश्चात सन् 1949 में धर्म सम्राट परम पूज्य स्वामी श्री करपात्री जी महाराज के द्वारा संस्थापित और संरक्षित अखिल भारतीय राम राज्य परिषद जो कि एक राजनीतिक पार्टी थी उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद को आप ने संभाला। और सन 1952 में भारत में प्रथम लोकसभा का चुनाव हुआ तो परिषद के घोषणापत्र में बड़ी ही दृढ़ता पूर्वक पार्टी का संकल्प था कि यदि भारत में राम राज्य परिषद की सरकार बनती है तो श्री राम जन्म भूमि, श्री कृष्ण जन्मभूमि, और काशी विश्वनाथ मंदिर का उद्धार करना सरकार की प्राथमिकता होगी। फिर तो बड़ी ही मजबूती से चुनाव लड़ा गया।मध्य प्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में तो पार्टी बहुमत के बहुत निकट पहुंच गई थी। भारत में गोवध बंद हो इसके लिए आप ने जेल की यातनाएं भी सही। ऐसे ही आपकी अद्भुत प्रतिभा को देखकर काशी के विद्वान, भारत धर्मा मंडल, और परम पूज्य स्वामी श्री करपात्री जी महाराज ने आपको 2500 वर्ष प्राचीन शंकराचार्य परंपरा में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद पर अभिषिक्त किया।

ज्योतिष पीठ को स्वीकार किए अभी 10 वर्ष भी नहीं हुए थे कि द्वारका के जगत गुरु जी महाराज ब्रह्मलीन हुए और अपनी वसीयत में साग्रह अनुरोध किया कि ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य जी महाराज द्वारका को भी संभाल लें तो शारदा पीठ का सौभाग्य होगा। उनका मान रखते हुए महाराज श्री ने द्वारका की पीठ को भी संभाला और पीठ का जीर्णोद्धार कराते हुए अनेक दिशा में विकास किया। इसी बीच महाराज श्री का पदार्पण चाईबासा (झारखंड) में हुआ। वहां एक श्रीरामचरितमानस का सम्मेलन हो रहा था जिसमें आप को आमंत्रित किया गया था। आदरणीय श्री सीताराम जी रूंगटा ने महाराज श्री से निवेदन किया कि भगवन्! इस क्षेत्र में ईसाइयत बड़ी ही तीव्र गति से पांव पसार रही है। इतना सुनते ही आपने अपना आगे का सारा कार्यक्रम स्थगित कर दिया। और आदिवासियों के बीच में जाकर मुंडारी भाषा में जो वहां की भाषा है, उसमें उन आदिवासियों को सनातन धर्म का उपदेश कर लगभग 500000 धर्मांतरित आदिवासियों का स्वल्प प्रायश्चित के द्वारा स्वधर्मानयन कराया।

इस यात्रा में उस क्षेत्र के जसपुर नरेश के साथ उस क्षेत्र में भी गए।चक्रधरपुर, गोइलकेरा, आनंदपुर आदि क्षेत्रों में जो आदिवासी धर्मांतरित हो रहे थे उनको अपने धर्म में ले आए, तथा वहां एक विशाल आश्रम, विश्व कल्याण आश्रम के नाम से वहां स्थापित किया। और भगवती राजराजेश्वरी माता का मंदिर और भगवान वायु वीरा श्री हनुमान जी का मंदिर बना करके वहां के आदिवासियों को पूजा पद्धति से जोड़कर  उनके मन को स्वस्थ किया। तथा विशाल अस्पताल का निर्माण और उसे समस्त सुविधाओं से युक्त कराकर वहां के लोगों के शरीर को भी स्वस्थ किया।

शंकराचार्य पद पर रहते हुए अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि का उद्धार करने के लिए आप जेल भी गए 2500 2कवर्ष की प्राचीन शंकराचार्य परंपरा में यह एक नया इतिहास बना। पहली बार कोई शंकराचार्य जेल गया हो। मुझे स्मरण है कि उस समय पीसीएस की परीक्षा में यह प्रश्न आया था कि ऐसे शंकराचार्य का नाम बताओ जो आचार्य पद पर रहते हुए जेल गए हों। आज के तथाकथित हिंदू वादियों को अपना मुंह खोलने से पहले महाराज श्री के व्यक्तित्व और कृतित्व का अध्ययन करना चाहिए।

हमारी बहुत सी गुरु बहनें विरक्त भाव से भजन करना चाहती थीं लेकिन उनके लिए सनातन धर्म में कोई व्यवस्था नहीं थी। और ना ही किसी आचार्य ने इस ओर ध्यान दिया। किन्तु गुरु देव का निर्मल हृदय करुणा प्रपूरित हो गया और आपने अखिल  भारतीय उभय भारती महिला आश्रम की स्थापना करके उन विरक्त भाव से जीवन व्यतीत करने वाले बहनों की भी व्यवस्था किया।

वर्तमान समय में नशे की बढ़ती हुई प्रवृत्ति से करोड़ों घर बर्बाद हो रहे है। उनकी पीड़ा को समझते हुए आपने हिंगलाज  सेना की स्थापना की और अपने हजारों कार्यकर्ताओं को "भारत नशा मुक्त हो" का पाठ पढ़ा कर कार्य में लगाया जिसके कारण आज हजारों लोगों के उजड़े हुए घर बस गये। महाराज श्री ने देखा कि किस प्रकार लोग अपने देवी-देवताओं को भूलकर साईं (जो कि एक मुस्लिम था) उसको अपना कर  भगवान मानने लगे हैं। वहां लोगों को सावधान किया। यह सब सामाजिक कार्य करने में गुरुदेव भगवान को बहुत सी प्रतिकूलताओं का भी सामना करना पड़ता है। किंतु यहां तो निर्भयता रग-रग में भरी है निर्भय होकर धर्म की रक्षा में सदैव सन्नद्ध रहते हैं। महाराज श्री के गुणों का वर्णन करने में मुझे गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की वह पंक्ति बरबस ही ध्यान में आती है कि-
होहिं सहस दस सारद सेषा।करहिं कल्प कोटिक भरि लेखा।।
मोर भाग राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा।।

अधिक न कहकर अंत में यही कहना चाहूंगी कि-
मोहिं विलोकि धरहु मन धीरा।
राम कृपा कस भयउ सरीरा।।
आपन कीन्ह राम जबहीं ते।
 भयउं भुवन भूषन तबहीं ते।।

आपके अवतार से यह धरा धन्य हो गई। 

जयति तेSधिकं जन्मना व्रज:

देवताओं की आयु से शतायु हो कर आप इसी प्रकार धर्म की रक्षा करते रहे, जगदंबा आपको स्वस्थ और प्रसन्न रखे, इसी प्रार्थना के साथ श्री चरणों में प्रणिपात होती हुई वाणी को विराम।