Neemach : क्षितिज के पार आंचल की उड़ान

Indian Air Force : फ्लाइंग पायलट बनी चायवाले की बेटी

Updated: Jun-22, 2020, 08:13 PM IST

Neemach :  क्षितिज के पार आंचल की उड़ान

मध्यप्रदेश के नीमच जिले की एक बेटी ने भारतीय वायुसेना में फ्लाइंग ऑफिसर बन देशभर में प्रदेश का नाम ऊंचा कर दिया है। शनिवार 20 जून को आंचल गंगवाल ने हैदराबाद के डंडीगल वायु सेना अकादमी में कंबाइंड ग्रेजुएशन परेड में हिस्सा लिया था। मार्च पास्ट के बाद आंचल को राष्ट्रपति पट्टिका से सम्मानित किया गया। रविवार को 123 कैडेट्स के साथ आंचल गंगवाल की भारतीय वायुसेना में कमिश्निंग हो गई है। आंचल के पिता सुरेश गर्ग नीमच के सिटी रोड पर स्थित रोडवेज बस स्टैंड पर सुरेश गर्ग एक चाय की गुमटी चलाते हैं।

आंचल गंगवाल वर्ष 2018 में एयर फोर्स कॉमन टेस्ट में उत्तीर्ण हुईं थी। टेस्ट में सफल होने वाली वह अकेली मध्यप्रदेश की बेटी थी। उन्हें इसके बाद फाइटर जेट पायलट के प्रशिक्षण के लिए हैदराबाद बुलाया गया था। वहां दो वर्ष बाद उन्हें शनिवार को राष्ट्रपति पट्टिका से सम्मानित कर कमिश्निंग किया गया।

टीवी पर पासिंग आउट परेड का प्रसारण देख भावुक हुए पिता सुरेश गर्ग ने कहा कि फादर्स डे के अवसर पर बेटी की ओर से इससे अच्छा तोहफा नहीं हो सकता है। बिटिया की इस उपलब्धि ने पिता का सिर सम्मान से ऊंचा कर दिया है। इस समारोह में आंचल के माता-पिता को भी जाना था परन्तु कोरोना महामारी के कारन वे नहीं जा सके।

दो नौकरी छोड़ चुकी हैं आंचल

वायुसेना के सेंटर पर फ्लाइंग ऑफिसर के पद पर ज्वाइनिंग करने से पहले आंचल दो नौकरी छोड़ चुकी है। अप्रैल 2017 में उनका चयन मध्यप्रदेश पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद पर हुआ था। वे अगस्त 2017 में श्रम निरीक्षक के रूप में चयनित हुईं। श्रम निरीक्षक का पद छोड़ कर वे जून 2018 से हैदराबाद एयर फोर्स एकेडमी में प्रशिक्षण के लिए चली गई थीं।

उत्तराखंड की त्रासदी से मिली प्रेरणा

पिता सुरेश गर्ग बताते हैं कि आंचल को वायुसेना में जाने की प्रेरणा उत्तराखंड की त्रासदी से मिली थी। 2013 में उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ के दौरान उन्होंने भारतीय वायुसेना के जांबाजों को टीवी पर लोगों की जान बचते देखा था। इस दौरान वह वायुसेना द्वारा चलाए जा रहे रेस्क्यू ऑपरेशन से इस कदर प्रभावित हुईं की उन्होंने ठान लिया कि वह भी अब वायुसेना में भर्ती होकर देश और लोगों की सेवा करेंगी। हालांकि इसके लिए उन्हें कठिन परिश्रम करना पड़ा जिसके बाद छठवीं कोशिश में वह सफल हुईं।