क्या ग़लत है मौजूदा कृषि क़ानूनों में, जानिए अर्थशास्त्रियों की राय

हम समवेत ने दिसंबर 2020 में इसे प्रकाशित किया था जब देश के दस अर्थशास्त्रियों ने कृषि मंत्री तोमर को चिट्ठी लिखकर समझाया था की कृषि क़ानूनों में क्या खामियां हैं

Updated: Nov 20, 2021, 10:44 AM IST

क्या ग़लत है मौजूदा कृषि क़ानूनों में, जानिए अर्थशास्त्रियों की राय

नई दिल्ली। लंबी लड़ाई के बाद देश के किसानों ने सरकार को विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद शुक्रवार को माफी के साथ कानून वापसी का ऐलान कर चुके हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि इन कानूनों में क्या खामियां थी। देश के 10 बड़े अर्थशास्त्रियों ने पिछले साल कृषि कानूनों के 5 प्रमुख खामियों को सामने रखा था।

हम समवेत ने दिसंबर 2020 में इसे प्रकाशित किया था जब देश के दस अर्थशास्त्रियों ने कृषि मंत्री तोमर को चिट्ठी लिखकर समझाया था की कृषि क़ानूनों में क्या खामियां हैं। सरकार को नए कृषि क़ानून वापस लेने की सलाह देने वाले इन दस बड़े अर्थशास्त्रियों के नाम हैं - प्रोफेसर डी नरसिम्हा रेड्डी, प्रोफेसर कमल नयन काबरा, प्रोफेसर अरुण कुमार, प्रोफेसर के एन हरिलाल, प्रोफेसर रंजीत सिंह घुमन, प्रोफेसर सुरिंदर कुमार, प्रोफेसर राजिंदर चौधरी, प्रोफेसर आर रामकुमार, प्रोफेसर विकास रावल और प्रोफेसर हिमांशु।

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इन अर्थशास्त्रियों का कहना था कि वे लंबे समय से कृषि नीति के मुद्दों का अध्ययन करते रहे हैं और अपने उस अनुभव के आधार पर कह सकते हैं कि केंद्र सरकार के नए कृषि क़ानून देश के छोटे और सीमांत किसानों के हक़ में नहीं हैं। उन्होंने ये भी लिखा था कि इन क़ानूनों के बारे में किसान संगठनों ने जो आपत्तियाँ उठाई हैं, वे बेहद वाजिब हैं।

इन अर्थशास्त्रियों ने कृषि मंत्री के नाम अपनी चिट्ठी में लिखा था कि, “हम मानते हैं कि देश के करोड़ों छोटे किसानों की बेहतरी के लिए कई सुधारों और कृषि उत्पादों की मार्केटिंग के सिस्टम में बदलाव की ज़रूरत है। लेकिन कृषि क़ानूनों के ज़रिए जो बदलाव किए जा रहे हैं, वो इस मक़सद को पूरा नहीं करते। ये क़ानून ग़लत मान्यताओं और दावों पर आधारित हैं। हम पाँच प्रमुख कारण आपके सामने रख रहे हैं, जिनकी वजह से केंद्र सरकार की तरफ़ से एक पैकेज के रूप में लाए गए तीनों क़ानून बुनियादी तौर पर भारत के छोटे किसानों के लिए नुक़सानदेह हैं।”

कृषि कानूनों के खिलाफ अर्थशास्त्रियों की 5 अहम दलीलें

आइए जानते हैं कि इन अर्थशास्त्रियों ने कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की अपनी सलाह के पक्ष में कौन से 5 कारण गिनाए थे:

1. राज्यों की अनदेखी करना ग़लत: कृषि उत्पादों की ख़रीद-बिक्री के मामले में राज्यों की भूमिका को नज़रअंदाज़ करते हुए पूरे देश पर एक केंद्रीय क़ानून थोपने का तरीका अपने आप में ग़लत है। यह तरीक़ा न सिर्फ़ संविधान के तहत केंद्र और राज्य सरकारों के बीच किए गए अधिकारों के बँटवारे की अनदेखी करता है, बल्कि किसानों के हित में भी नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि राज्य सरकारों की मशीनरी गाँवों में रहने वाले किसानों के प्रति न सिर्फ ज़्यादा जवाबदेह है, बल्कि उस तक किसानों की पहुँच भी ज़्यादा होती है। इसीलिए कृषि उत्पादों के बाज़ार को सीधे केंद्र सरकार के क़ानून के दायरे में लाने की बजाय उस पर राज्यों का नियंत्रण रहना बेहतर होता है। राज्य सरकारें अपने किसानों और कृषि उत्पादों के बाज़ार की ज़रूरतों का ध्यान रखने में केंद्र के मुक़ाबले ज्यादा संवेदनशीलता और जवाबदेही से काम लेंगी। इस संदर्भ में केंद्र सरकार की तरफ़ से सभी राज्यों में एक समान तरीक़े से लागू होने वाला क़ानून थोप देना सही नहीं है।

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2. बेलगाम होंगी निजी मंडियां: नए कृषि क़ानून कृषि उत्पादों के लिए पूरे देश में एक साथ दो तरह के बाज़ार क़ायम कर देंगे, जिनमें दो अलग-अलग तरह के नियम लागू होंगे। इसमें बड़ी समस्या इसलिए आएगी क्योंकि APMC एक्ट के तहत चलने वाली रेगुलेटेड मंडी के मुकाबले में एक तकरीबन अनियंत्रित खुली या प्राइवेट मंडी भी खड़ी हो जाएगी। दोनों बाज़ारों पर लागू होने वाले नियम-कानून और वसूले जाने वाले शुल्क बिलकुल अलग-अलग होंगे। इस सिस्टम की वजह से ट्रेडर का नियंत्रित मंडी को छोड़कर अनियंत्रित मंडी की तरफ जाना अभी से ही शुरू हो चुका है। अगर एपीएमसी के बाज़ार में ट्रेडर्स की मिलीभगत और बाज़ार को मैनुपुलेट करने जैसी चिंताएं जाहिर की जा रही हैं, तो ये बुराइयां तो अनियंत्रित मंडी में भी जारी रह सकती हैं। एपीएमसी के तहत रेगुलेट होने वाले बाज़ार में तो इन बुराइयों को रोकने की कुछ व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं, लेकिन प्राइवेट मंडी के अनियंत्रित बाज़ार में नए कानून के तहत ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है। बाज़ार में किसानों के शोषण के तरीकों में कीमतों को प्रभावित करने के अलावा नाप-तोल, ग्रेडिंग और नमी की जांच जैसे मामलों में की जाने वाली गड़बड़ियां भी शामिल हैं। खासतौर पर आदिवासी इलाकों समेत दूरदराज़ के इलाकों में, जहां व्यवस्थित मंडियां नहीं हैं, इस तरह की हेराफेरी का खतरा और भी बढ़ जाता है।

3. एकाधिकार का ख़तरा: इस तरह के अनियंत्रित और बिखरे हुए बाज़ार में क़ीमतों के निर्धारण और मोनोपोली यानी एकाधिकार की वजह से भी नई परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं। नए क़ानूनों के बनने से पहले भी कृषि उत्पादों के बड़े हिस्से की ख़रीद-फरोख्त एपीएमसी के तहत आने वाली मंडियों से बाहर होती रही है। लेकिन एपीएमसी की मंडियों की वजह से किसानों को क़ीमतों का कुछ  संदर्भ और अंदाज़ा मिल जाता है। अगर यह व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी तो बिखरे हुए बाज़ार में स्थानीय स्तर पर ख़रीदारों का एकाधिकार क़ायम हो जाएगा। बिहार में 2006 में एपीएमसी एक्ट ख़त्म किए जाने के बाद का तजुर्बा यही बताता है कि इससे किसानों की फसलों के बिक्री के लिए विकल्प कम हो गए हैं, जिससे उनकी मोल-भाव करने की क्षमता और कम रह गई है। यही वजह है कि बिहार में फसलों के भाव बाक़ी राज्यों के मुक़ाबले काफ़ी कम हो गए हैं।

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4. ठेके की खेती से जुड़े खतरे:  छोटे किसानों और कंपनियों के बीच होने वाली ठेके की खेती (contract farming) के मामले में दोनों की हैसियत के बीच का भारी अंतर काफी मायने रखता है। इस व्यवस्था में किसानों के हितों की रक्षा का पर्याप्त इंतज़ाम नहीं है। आज भी ज़्यादातर ठेके की खेती बिना लिखा-पढ़ी वाले जुबानी अनुबंधों के आधार पर होती है, जिसमें किसानों की हितों की सुरक्षा का कोई इंतज़ाम नहीं होता। कंपनियां भी एग्रीगेटर्स या बिचौलियों का इस्तेमाल करके ऐसी व्यवस्था कर सकती हैं, जिसमें उनकी कोई सीधी जवाबदेही साबित नहीं हो सकेगी। नए कानून में इस खतरे को दूर करने का कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

5. बड़ी कंपनियों के क़ब्ज़े का ख़तरा: पाँचवा और अंतिम कारण है कृषि उत्पादों के कारोबार से जुड़ी बड़ी कंपनियों के आधिपत्य का ख़तरा। यह बात सच है कि तीनों क़ानूनों को मिलाकर देखें तो इससे कृषि उत्पादों के बिज़नेस से जुड़ी बड़ी कंपनियों को राज्य सरकारों के तमाम नियम-कानूनों और लाइसेंसिंग से जुड़ी बंदिशों से छुटकारा मिल जाएगा। इसमें किसानों, ट्रेडर्स, मार्केट एजेंट्स के बीच के मौजूदा संबंधों और स्टॉक लिमिट, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से जुड़े तमाम नियम-कानून भी शामिल हैं। कृषि उत्पादों का बिज़नेस करने वाली बड़ी कंपनियों को मिलने वाली इस छूट की वजह से यह आशंका होना जायज़ है कि इससे कृषि उत्पादों का बाज़ार कुछ गिनी-चुनी बड़ी कंपनियों के क़ब्ज़े में चला जाएगा। अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों में ऐसा हो भी चुका है। उन देशों में ऐसा होने पर छोटे किसान, छोटे ट्रेडर्स और कृषि उत्पादों के स्थानीय कारोबारी हाशिए पर धकेल दिए गए। सिर्फ़ वही टिके रह पाए जो काफ़ी बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट अंदाज़ में खेती करते थे। भारत के किसानों को ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए। उन्हें तो ऐसा सिस्टम चाहिए जिसमें न सिर्फ उनकी मोलभाव करने की ताक़त बढ़े, बल्कि स्टोरेज, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग की बेहतर सुविधाओं में भी किसानों और उनके संगठनों की भागीदारी हो। किसानों की आय बढ़ाने का सही रास्ता यही हो सकता है।