क्या मैं तुम्हारी लहर नहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी

गायत्री मंत्र किसी विशिष्ट धर्म, व्यक्ति, समाज, समुदाय या प्राणी के प्राण की रक्षा की बात नहीं करता वह प्राण की रक्षा को समर्पित है। जो हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, यहूदी, जैन सभी में एक ही जैसे हैं। उसी से हमारा वजूद बनता है, बिगड़ता है। प्राण ही सबकुछ है और वह हमें वह सबकुछ देता है जिसकी की हम कभी कल्पना करते हैं।

Updated: Dec 26, 2021, 07:34 PM IST

क्या मैं तुम्हारी लहर नहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी
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इन पंक्तियों को गौर से पढ़िये और बूझिये कि आखिरकार ये क्या हैं और क्या संप्रेषित करना चाहतीं हैं ! इनका शीर्षक है ‘‘ मेरे खुदा, मेरे खुदा’’।

बख्शा मुझे तूने वजूद मेरे खुदा मेरे खुदा

हर दर्द की तू है दवा, मेरे खुदा मेरे खुदा,

रहमत की बारिश भी है तू, खुशियां भी तेरे नाम से

तू रोशनी है, तू जिन्दगी, दानिशकदा मेरे खुदा

है तेरे आब-ओ-ताब से बख़्शिश गुनाहों के मेरे खुदा,

रस्ता दिखा और इल्म दे मेरे खुदा मेरे खुदा ।।

हमें लगेगा कि यह किसी उर्दू शायर द्वारा खुदा की इबादत में लिखा पद्यांश है। शायद ऐसा हो भी ! परंतु संस्कृत की इन पंक्तियो पर गौर करिए,

‘‘ऊँ भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर्वरण्यं।

भर्गो देवस्थ धीमहि योनः प्रचोदयात’’

शायद बहुत से लोगों को याद आ गया होगा कि यह ‘गायत्री मंत्र’’ है। भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय मंत्र और संभवतः सबसे सारगर्भित मंत्रों में से एक। उपरोक्त मंत्र का भावानुवाद खुर्शीद अनवर ने किया है। सवर्ण हिंदुओं खासकर ब्राहमणों में बटुक के यज्ञोपवीत संस्कार के समय इस मंत्र को दीक्षित होने वाले युवा, के कान में सुनाया जाता है, जिससे कि यह जीवनभर उसके मस्तिष्क में स्वयं को दोह राता रहे गूंजता रहे किसी देव, देवता या देवी का कोई नाम नहीं है, गायत्री मंत्र में।  वेदों की जननी गायत्री हैं। प्राणों की रक्षा करने वाली गायत्री हैं। प्राण यानी चैतन्यता एवं सजीवता। तभी तो ऐतरेय ब्राहमण गायत्री शब्द का अर्थ, ‘‘गयान् प्राणान त्रायते सा गायत्री’’। यानी जो गय (प्राणों की) रक्षा करती है, वह गायत्री है’’ करता है।

गौरतलब है पिछले दिनों हरिद्वार में इकट्ठे हुए तमाम भगवा वस्त्रधारियों ने जिस तरह की भाषा व भाव भंगिमाओं का प्रदर्शन किया वह वास्तव में दिल दहला देने वाला है। ऐसा इसलिए क्योंकि इक्कीसवीं शताब्दी में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और दुनिया के सबसे सशक्त संविधान को अंगीकार करने वाले राष्ट्र में इस तरह के आयोजन संभव हो पाया और इसमें भागीदारी करने वाले अभी भी कानून के शिकंजे में नहीं आए हैं।

गायत्री मंत्र किसी विशिष्ट धर्म, व्यक्ति, समाज, समुदाय या प्राणी के प्राण की रक्षा की बात नहीं करता वह प्राण की रक्षा को समर्पित है। जो हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, यहूदी, जैन सभी में एक ही जैसे हैं। उसी से हमारा वजूद बनता है, बिगड़ता है। प्राण ही सबकुछ है और वह हमें वह सबकुछ देता है जिसकी की हम कभी कल्पना करते हैं। वह खुदा वह ईश्वर ही हमें अपने गुनाहों से निजात भी दिलाता है। तो सोचिए गायत्री पाठ करने वाले समुदाय में वे कौन लोग हैं जो भारत के मुसलमानों को खत्म करने की बात कह रहे हैं ? अगर ये वास्तविक साधु, साध्वी, या संत हैं, तो इनमें आक्रोश, घृणा और विषाद के तत्व अभी तक कैसे विद्यमान हैं? पाकिस्तान जा बसे शायर जान एलिया लिखते हैं,

मत पूछो कितना ग़मगी हूँ, गंगा जी और जमना जी

मैं जो था अब मैं वह नहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी

मैं जो बगुला बनके बिखरा, वक्त की पागल आंधी में

क्या मैं तुम्हारी लहर नहीं हूँ, गंगा जी और जमना जी।।

अजीब वहिशयानापन लगातार हमारे ऊपर हावी होते जा रहा है। आगरा में सांता क्लॉज या क्रिसमस फादर का पुतला जलाया गया। क्यों ? क्या हम अपने बच्चों के बेहतरीन सपने भी अब उनसे छीन लेना चाहते हैं ? क्रिसमस फादर के पुतले को जलते हुए देख गुस्सा नहीं आया। खुद पर शर्म आई और याद आए अपने स्वर्गीय पितामह और उनके जैसे सैकड़ों - हजारों - लाखों पितामह ! उन्हें बाजार से लौटते हुए दूर से देखकर हम सब उनकी और दौड़ पड़ते थे। कंधे पर लटके उनके झोले में संतरे की गोलियां होतीं थीं। तब शायद एक पैसे की पांच आती होंगी। वे अपने झोले से जादू की तरह एक एक गोली निकालते अपने आसपास लगी बच्चों की भीड़ में से प्रत्येक को एक गोली देते और, उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते जाते। वे देखते नहीं थे कि इनमें से कौन उनका अपना पोता है और कौन नहीं। सबके हाथ में वह मीठी गोली होती और सर पर आर्शीवाद की थाप। सब संतुष्ट हो जाते। फिर खेलने लगते। बाबा सबको देखते। शायद हर रोज उनकी आँखे थोड़ी भींगती थीं। फिर वे चले जाते। वे क्या सांता क्लाज नहीं थे ?

क्या वे रोज - रोज अपने साथ खुशहाली की क्रिसमस लाने वाले फादर नहीं थे। अब क्या हम पुरखों के पुतले भी जलाने लगेंगे ? दुनियाभर के बच्चे 26 दिसंबर से ही अगले क्रिसमस की राह देखना शुरु कर देते हैं। जो इस बार क्रिसमस फादर उन्हें नहीं दे पाए वह उन्हें अगली बार दे देंगे। इस तरह से क्या बच्चे माता, पिता या अभिभावकों की तरक्की व अधिक समृद्धि की कामना नही कर रहे होते? क्या वे उन्हें अधिक सक्षम बनने को प्रोत्साहित नहीं कर रहे कि वे और आगे बढ़े ? तो, अपने बच्चों के सपनों में आग लगाकर हम क्या सिद्ध करना चाहते हैं ?

शासन व्यवस्था की असफलता और उस असफलता को स्वीकार न करने की जिद वस्तुतः तंत्र को तानाशाही व अराजकता की ओर धकेलती है। भारत में यही हो रहा है? मीडिया में हरिद्वार सम्मेलन को लेकर बहुत समय बाद थोड़ी बहुत खलबली भी दिखाई दी। इसकी वजह यह भी है अब तमाम चरणवंदन करने वालों को भारत में अपनी हैसियत भी मालूम पड़ रही है। वह यह भूलते जा रहे थे कि उनका वजूद किससे है। वे जिनसे अपना वजूद बनाए रखने की उम्मीद कर रहे थे, वे तो उनका वजूद मिटा देना चाहते है। तो अब उन्हें समझ में आ जाना चाहिए कि मनुष्य का वजूद वास्तव में सत्य से है। इसीलिए गांधी कहते हैं ‘‘सत्य ही ईश्वर है’’। तो हम सबको तय करना होगा कि हमारा वास्तविक ईश्वर कौन है ?

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हरिद्वार व आगरा में जो हुआ वह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना महत्वपूर्ण यह है कि एक सभ्य समाज (यदि वह सभ्य है तो) ने इस तरह के विषवमन की तीखी निंदा नहीं की। वे सारे राजनीतिक दल जो तमाशबीन या कबूतर बने रहना चाहते हैं, को समझ लेना चाहिए कि वे भी नहीं बचेंगे। चुनावी हार-जीत राजनीति का सबसे छोटा और गैरजरूरी आयाम है। अगर हम वास्तविक जन आधारित राजनीति के झंडाबरदार हैं तो सत्ता को झक मारकर हमारे पास आना ही होगा क्योंकि सत्य और लोक आधारित राजनीति का विकल्प कुछ और हो ही नहीं सकता। कुछ समय के लिए अंधेरा छाता है और छट भी जाता है। खुर्शीद अनवर लिखते भी हैं,

शाम है ग़म के समन्दर में उतरने दो इसे,

कल ये सूरज फिर नया हो जाएगा धीरज धरो।

इसलिए राजनीति में अब वह सब करना जरुरी है, जिसे आधुनिक नीति निर्माताओं ने गैरजरुरी मान लिया था। हरिद्वार सम्मेलन हमें समझा गया है कि चुप्पी कितनी खतरनाक होती है और कुछ लोगों को इतना दुस्साहसी बना देती है कि वे समाज को नष्ट करने के फेर में आत्मघाती तक हो जाते हैं चुनाव जीतने की फिक्र छोड़कर ही चुनाव जीता जा सकता है, क्योंकि तब हार और जीत बेमतलब हो जाती है। परंतु यह करने के लिए जिस तरह की तैयारी और वैचारिक परिपक्वता की अनिवार्यता है उसके लिए थोड़ा ठहराव होगा, आत्मावलोकन करना होगा और परिस्थितियों से जूझने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा।

हरिद्वार सम्मेलन में चीखने वाले/वालियां हमारे- आपके बच्चों को उकसा रहे हैं। वे तो धर्म का लबादा ओड़े तमाशा या मजमा लगाकर उसे देखना चाहते हैं। वे गायत्री मंत्र का अर्थ नहीं जानते। वे नहीं जानते कि दुनिया में प्राण - प्राण में फर्क नहीं किया जा सकता। गांधी इस बात को जानते थे और उस तरह के जीवन को जीते भी थे। इतना ही नहीं उन्होंने यह अलख या विश्वास अपने अनेक अनुयायियों को संप्रेषित किया और उनमें स्थापित भी किया। तभी तो हमारी संविधान सभा ने भावुक होकर एक भी प्रावधान ऐसा नहीं किया जो भारत की आत्मा, संस्कृति व सभ्यता के रिंच मात्र भी प्रतिकूल हो। वे जानते थे कि उनमें और अंबेडकर में, उनमें और नेहरु में एक ही जैसे प्राण हैं और यही उन्हें और बाकी सबको जोड़ते भी हैं। इसीलिए तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद भारत में केशरिया या किसी और रंग का संविधान नहीं बना। जो संविधान बना वह सफेद कागज पर काली स्याही से लिखा एक अनमोल दस्तावेज है और वह सिर्फ भारत ही नहीं इस ब्रहमांड में रहने वाले प्रत्येक प्राण की बात करता है, उनकी चिंता करता है।

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परंतु स्वार्थी और अपने अतीत, अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता से नितांत अपरिचित लोग यह समझ ही नहीं पाएंगे कि खुर्शीद अनवर को गायत्री मंत्र के उर्दू अनुवाद की जरुरत क्यों महसूस हुई। वे नहीं समझ पाएंगे क्योंकि ये सारे लोग अपनी माँ की लोरी की मिठास भुला बैठे हैं। ये लोग मंत्रों का उच्चारण नहीं करते उन्हें किसी हथियार की तरह प्रयोग में लाना चाहते हैं और यह असंभव है। गायत्री मंत्र की महक को उर्दूभाषी समाज ठीक उसी तरह से समझेगा जिस तरह से संस्कृत समझने वाला समाज समझता है। इसे महज रहने वाला समाज इसकी भावना को नहीं समझ पाएगा। हरिद्वार सम्मेलन हम सबके लिए आँख खोलने का काम कर सकता है। सरकार या सरकारें क्या करतीं हैं या नहीं यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है समाज के भीतर से इस तरह की गतिविधियों के खिलाफ आवाज का उठना।

क्या यह हो पाएगा ? इस सवाल का जवाब यही है कि ऐसा करना ही होगा अन्यथा हममें से किसी का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बचेगा। हमारा अस्तित्व अपनी संस्कृति से, अपनी जमीन से बराबरी से जुड़ा होता है। समंदर कभी भी हमारे पास से बहती नदी की जगह नहीं ले सकता। जान एलिया छोटी सी बान नदी तट पर बसे उत्तरप्रदेश के अमरोहा कस्बे से पाकिस्तान में समंदर किनारे स्थित शहर कराची में जाकर बस गए थे। परंतु वे कहते रहे,

यूं तो समंदर है दो कदम पर जा डूबूं, पर मैं तो यहा

एक कदम बे-सतहे जमी हूँ, गंगा जी और जमना जी

बान नदी के पास अमरोहे जो लड़का रहता था

अब वो कहा है ? मैं तो वहीं हूँ गंगा जी और जमना जी।।

 (गांधीवादी विचारक चिन्मय मिश्रा के यह स्वतंत्र विचार हैं)