कल्पवृक्ष धरती पर नहीं हमारे भीतर

हर व्यक्ति की इच्छा पूर्ति में उसका विश्वास ही काम करता है, आत्मा के रूप में जो हमारे भीतर ईश्वर बैठा हुआ है वही पूर्ण करता है हमारी कामनाएं

Publish: Aug 01, 2020 02:22 PM IST

कल्पवृक्ष धरती पर नहीं हमारे भीतर

आज हमारी एक अत्यंत प्रिय और विदुषी भगिनि श्रीमती अमृता सिंह ने प्रश्न किया है कि क्या धरती पर भी कहीं कल्पवृक्ष है? क्यूंकि मनुष्य स्वभावत: सदैव सुगम मार्ग का अन्वेषण करता है। इस संदर्भ में मैं अपने पूज्य गुरुदेव भगवान से जो श्रवण की हूं और जितना समझ पाई हूं वह आपके सम्मुख परोसने का प्रयास कर रही हूं।

कल्पवृक्ष धरती पर नहीं हमारे भीतर ही है। इस धरित्री का क्षेत्र फल अत्यधिक विस्तृत है यदि किसी दूर देश में कल्प वृक्ष हो भी तो एक सामान्य व्यक्ति के लिए वहां पहुंचना कदाचित् असम्भ हो सकता है किन्तु अपने भीतर पहुंचना किसी के लिए भी असंभव नहीं प्रयास करने पर संभव हो सकता है।

एकबार कोई व्यक्ति लम्बी यात्रा में निकला।मार्ग में वह अत्यधिक श्रमित हो गया।उस सघन वन में उसे सुदूर तक न कोई जलाशय दिखाई दे रहा था और ना ही कोई फलदार वृक्ष जिससे कि वह अपनी क्षुधा पिपासा को शांत कर सके।तृषा के वेग से तृषित उस पथिक को एक सघन पत्रावली वाला विशाल वृक्ष दृष्टि गोचर हुआ।आतप संतप्त वह श्रमित पथिक उस विशाल वृक्ष की छाया में अपने श्रम का अपनोदन करने के उद्देश्य से गया।जब उसका शरीर किंचित स्थिर हुआ तो क्षुधा ने घेर लिया अब उसने विचार किया कि कहीं से भोजन पानी की व्यवस्था हो जाती तो मैं तृप्त होकर अपनी शेष यात्रा को भी पूर्ण कर लेता क्यूंकि शरीर में अब चलने का सामर्थ्य ही नहीं रहा इतने में उसे चमत्कृत करने वाला एक आश्चर्य उसके सामने उपस्थित हुआ।एक थाली में विविध प्रकार के व्यंजन उसके सामने आ गया भोजन करके तृप्त हुआ प्यास लगी तो उसी प्रकार जल भी आ गया,शयन की इच्छा हुई तो तो एक सुन्दर पलंग,विस्तर, तकिया सब आ गया। शीतल मन्द और सुगन्धित वायु ने उसके श्रम का हरण किया उसे नींद आ गई।जब सोकर उठा तो विचार किया कि आखिर इस वृक्ष में ऐसा कौन सा चमत्कार है जिसने हमारे भोजन पानी और शयन का समुचित प्रबंध कर दिया। इतने में संध्या हो आई और वह भयभीत हुआ कि कहीं शेर न आ जाय तो शेर भी आ गया। वह और भयभीत हुआ कि कहीं ये शेर मुझे खा न ले। उसने सोचा और शेर ने उसे खा लिया। असल में वह कल्प वृक्ष था इसलिए वह पथिक जो-जो संकल्प करता गया वह पूर्ण होता गया।

 यह एक दृष्टांत है। इसका संदेश यह है कि वस्तुत: हमारी आत्मा ही कल्पवृक्ष है। उस आत्मा रूपी कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर हम जो-जो कल्पना करते हैं वो पूर्ण होती जाती हैं। हमारी इच्छा पूर्ति का कारण हमारी आत्मा ही है हम उसका आरोप बाहर कर लेते हैं। हमें ये लगता है कि हमारी इच्छा पूर्ति का कारण अमुक व्यक्ति है। हर व्यक्ति की इच्छा पूर्ति में उसका विश्वास ही काम करता है। आत्मा के रूप में जो हमारे भीतर ईश्वर बैठा हुआ है वही हमारी कामनाओं को पूर्ण करता है।   

ईश्वर: सर्व भूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति

गीता में भगवान ने कहा कि अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में बैठकर सभी की इच्छाओं को पूर्ण कर रहा है।पर हम उसका आरोप बाहर कर लेते हैं। यही हमारा कल्पवृक्ष है।