संसार हमारे भीतर न आने पाए

हमें इस संसार में हमें रहना है लेकिन निरंतर इस सजगता के साथ कि संसार हमारे भीतर न आने पाए

Publish: Aug 03, 2020 02:52 PM IST

संसार हमारे भीतर न आने पाए

नाव पानी में रहे, पर पानी उसमें ना आने पाए। इसी प्रकार हम संसार में रहे पर संसार हमारे भीतर न आने पाए।

यह विश्व अकारण करुण करुणा वरुणालय सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमात्मा की रचना है। सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र, और तारागण का नियमित रूप से अपनी-अपनी कक्षाओं पर नियमित व्यवस्थित भ्रमण विभिन्न प्रकार के प्राणी पदार्थों की उपयोगिता और सार्थकता को देखकर यह बात सहज ही में समझ में आ जाती है। कुछ लोग इस जगत को जड़ प्रकृति का निरुद्देश्य परिणाम  कहते हैं। पर उनका मत बुद्धिमानों को संतुष्ट नहीं कर पाता। जैसे कोई इंजीनियर किसी मशीन का निर्माण करते समय उसमें जितने भी कलपुर्जे लगाता है उन सब की सार्थकता होती है उसी प्रकार इस विश्व का कोई भी प्राणी पदार्थ निरर्थक नहीं है हम अपने ही शरीर को देखें इसका कोई भी अंग व्यर्थ नहीं मिलता सब का उपयोग है इसलिए कहना होगा कि यह किसी वैज्ञानिक की सुविचारित कृति है।उसी प्रकार उस वैज्ञानिक के मस्तिष्क को देखकर उसके भी किसी विशिष्ट वैज्ञानिक का अनुमान कर सकते हैं। स्पष्ट है कि वैज्ञानिक के मस्तिष्क का निर्माता कोई मनुष्य या जड़ प्रकृति नहीं वरन् सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही हो सकता है।

हमारे शास्त्रों में इस विषय पर भी विचार किया गया है कि भगवान के द्वारा इस संसार और शरीरों की रचना का उद्देश्य क्या है। संसार के दुखों को देखकर कुछ जिज्ञासु प्रश्न करते हैं कि भगवान ने इस जगत की रचना क्यों की? नहीं करते तो अच्छा था पर इसका समाधान श्रीमद्भागवत के इस वचन से होता है।

 बुद्धीन्द्रियमन: प्राणान् जनाना मसृजत्प्रभु:।

 मात्रार्थं च भवार्थं च आत्मनेSकल्पनाय च।।

अर्थात् भगवान ने जीवों को अर्थ, धर्म,काम,और मोक्ष को सुलभ करने के लिए शरीर इन्द्रिय मन प्राण बुद्धि की रचना की है। इसके निर्माण के मूल में उनकी जीवो के प्रति करुणा है। प्रलय काल में अज्ञान के निद्रा में सोते हुए जीवो को जगा कर उनको अपनी प्राप्ति सुलभ कराने के उद्देश्य से ही उन्होंने अपने सत संकल्प से इनका निर्माण किया है। 

इस संसार में हमें रहना है लेकिन संसार हमारे भीतर न आने पाए इसके लिए हमें सतत सावधान रहने की आवश्यकता है।