संसद में संविधान के साथ छेड़छाड़ का प्रयास नाकाम, प्रस्तावना से समाजवाद शब्द को हटाना चाहती थी बीजेपी

बीजेपी सांसद ने पेश किया था प्राइवेट मेंबर बिल, संविधान की प्रस्तावना से समाजवाद शब्द हटाने की कोशिश राज्यसभा में नाकाम, विपक्ष के विरोध के बाद नहीं मिली मंजूरी

Updated: Dec 05, 2021, 02:51 PM IST

संसद में संविधान के साथ छेड़छाड़ का प्रयास नाकाम, प्रस्तावना से समाजवाद शब्द को हटाना चाहती थी बीजेपी

नई दिल्ली। संसद में शुक्रवार को विपक्ष ने संविधान की प्रस्तावना के साथ छेड़छाड़ की कोशिशों को नाकाम कर दिया। सत्ताधारी बीजेपी के एक सांसद ने संविधान की प्रस्तावना से समाजवाद शब्द को हटाने का प्रस्ताव दिया था। इसपर विपक्षी दलों ने एकजुट होकर विरोध किया और अंततः इस प्रस्ताव को रोक दिया गया।

जानकारी के मुताबिक केरल के निवासी के जे अल्फोंस जो राजस्थान से राज्यसभा सांसद हैं, उन्होंने सदन में प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में एक संविधान संशोधन बिल पेश किया था। इस बिल में यह प्रस्तावित था कि संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवाद' शब्द को हटा दिया जाए। लेकिन जैसे ही बीजेपी सांसद ने सदन में इस बिल को पेश किया विपक्ष ने एकजुट होकर इसका विरोध किया। उप सभापति ने इसपर सदन का ध्वनिमत जानना चाहा तो बिल के विरोध में विपक्षी दलों ने अपनी आवाज बुलंद कर दी और नो के पक्ष में ज्यादा आवाज आने लगी।

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इस दौरान आरजेडी सांसद मनोज झा ने इस बिल का यह कहते हुए विरोध किया कि यह संविधान की आत्मा पर चोट है। उन्होंने उपसभापति को संबोधित करते हुए आग्रह किया कि सदन इसे पेश करने की अनुमति देकर संसदीय परंपरा को कलंकित ना करे। झा ने सदन के संचालन प्रक्रिया के नियम संख्या 62 का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि इस तरह के प्राइवेट बिल राष्ट्रपति की सहमति के बिना पेश नहीं किए जा सकते हैं।

झा के तर्क के बाद बीजेपी के समर्थन से उपसभापति बने हरिवंश नारायण सिंह को भी यह मानना पड़ा कि इस बिल के साथ राष्ट्रपति की मंजूरी या सिफारिश नहीं है और इसके बगैर इसे सदन में पेश नहीं किया जा सकता। उप सभापति ने इसके बाद बीजेपी सांसद को बोलने का मौका नहीं दिया और कहा कि सदन को बिल पर आपत्ति है। उन्होंने कहा कि इस मामले में चेयर कोई फैसला नहीं लेगा बल्कि सदन तय करेगा। हंगामे के बाद उपसभापति ने बिल को रिजर्व रख लिया।

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समाजवादी राजनीति के स्तंभ रहे लालू यादव ने इसे धूर्तता बताया है। लालू यादव ने कहा कि, 'BJP, RSS और उसकी पिछलग्गू JDU के लिए संविधान मज़ाक, संविधान की प्रस्तावना में निहित शब्द सॉवरेन सेक्युलर सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक इत्यादि मखौल, संवैधानिक प्रक्रियाएँ खेल और संसद खिलौना है। ये चुपके-चुपके बड़ी धूर्तता से संविधान की प्रस्तावना यानी उसकी आत्मा को ही बदल रहे थे। शर्मनाक!' 

बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस पूरे मामले पर कहा कि, 'केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा संविधान बदलने की एक चोरी कल संसद में पकड़ी गयी जब इन्होंने संविधान की प्रस्तावना जिसे इसकी आत्मा कहा जाता है उसमें से “समाजवादी” शब्द को हटाने का संविधान संशोधन विधेयक पेश किया लेकिन हमारे सजग और सतर्क सदस्यों ने कड़ा विरोध कर इस विधेयक को वापस कराया।'

बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब बीजेपी सांसदों ने इस तरह का प्रयास किया हो, बल्कि बीजेपी और आरएसएस द्वारा लगातार इसे हटाने का प्रयास किया जाता रहा है। 2014 में नरेंद्र मोदी जब पहली पर चुनकर आए थे तब उनकी सरकार ने अपने पहले गणतंत्र दिवस (26 जनवरी, 2015) पर अखबारों में जो संविधान की प्रस्तावना जारी किया था, उसमें भी समाजवादी शब्द नहीं था।

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अब जब ये मामला राज्यसभा में बिल तक आ गया है, तब सवाल उठता है कि भाजपा, संघ को समाजवादी शब्द से इतनी दिक्कत क्यों है? कुछ बुद्धिजीवियों की आशंका है कि सत्तारूढ़ दल आरएसएस की स्थापना के शताब्दी वर्ष (2025) में भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करना चाहती है इसीलिए वह लगातार संविधान की मूल भावना पर प्रहार कर रही। संविधान विशेषज्ञ प्रो.फैजान मुस्तफा ने एक निजी वेबसाइट से बातचीत के दौरान कहा था कि मोदी सरकार समाजवादी शब्द को इसलिए हटाना चाहती है ताकि बाद में उसे संविधान की प्रस्तावना से सेकुलर शब्द को हटाने में आसानी हो सके।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती मामले (1973) में प्रस्तावना को संविधान का मूल ढांचा घोषित करते हुए कहा था कि इसमें परिवर्तन करने का अधिकार संसद को नहीं है। बावजूद बीजेपी सरकार समय-समय पर इससे छेड़छाड़ का प्रयास करने से बाज नहीं आती है।