एक योद्धा सन्‍यासी का महाप्रयाण

भारत में लगातार विश्व रिकार्ड बनाने की होड़ मच गई है। 84 वर्षीय फादर ऐसे संभवतः पहले व्यक्ति होंगे जिन्हें इतने कठोर कानून में निरुद्ध किया गया होगा। वे इस तरह से प्राण छोड़ने वाले भी पहले ही व्यक्ति होंगे। यूएपीए व अन्य दमनकारी कानूनों में लोग 20-20 साल बिना अपराध सिद्ध हुए जेल में रहे और अंत में सबूतों के अभाव में छूट गए। भीमा कोरेगांव मामले में करीब दो वर्षों में चार्जशीट भी दाखिल नहीं हो पाई है। इस मामले में ऐसे तमाम लोग गिरफ्तार हैं, जिनका जीवन वंचितों को अधिकार दिलवाने में बीत गया है। ये सभी असाधारण प्रतिभाशाली लोग हैं। इनमें फादर अब कम हो गए हैं।

Updated: Jul 06, 2021, 09:52 PM IST

एक योद्धा सन्‍यासी का महाप्रयाण
Photo Courtesy: AFP

दिखाई देता है जो भेड़िये के होठों पर, वो लाल दूध हमारी सफ़ेद गाय का है | - राहत इंदौरी                                                             फादर स्टेन स्वामी (आगे सिर्फ फादर) का महाप्रयाण, महात्मा गांधी की हत्या और जयप्रकाश नारायण की रहस्यमयी बीमारी के बाद घटी सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है। फादर क्या थे, क्या नहीं, इस पर बहुत सारी बातें हो सकती हैं। मुझे लगता है एक चित्र जिसमें प्रतीत हो रहा है कि चिलचिलाती धूप है। फादर के सामने एक लड़की संभवतः जिसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है, नंगे पैर खड़ी है और फादर अपने पैरों से चप्पल उतार कर उस लड़की को पहना रहे हैं। दूर-दूर तक कोई नहीं है। इस तस्वीर को देखने के बाद कुछ भी कहने सुनने को बचता ही नहीं। साथ ही साथ यह भी लगता है कि उनकी मृत्यु की न्यायिक जांच आदि की मांग करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है। हम सबको बजाय जांच के उन परिस्थितियों पर विस्तार से विचार करना चाहिए जिसकी वजह से फादर की मृत्यु हुई है। वह न तो हत्या थी न ही आत्महत्या वह तो एक तरह से महाप्रयाण था, जिसकी घोषणा वे करीब एक महीने पहले स्वयं अदालत में कर चुके थे। क्या इसे भीष्म गांधी का विनोबा जैसी इच्छा मृत्यु कहा जा सकता है ?

पवित्र बाइबिल में लिखा है, ‘‘तुम लोगों ने सुना है कि कहा गया है, ‘आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत।‘ परंतु मैं तुमसे कहता हूँ - दुष्ट का सामना नहीं करो। यदि कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा भी उसके सामने कर दो। जो मुकदमा लड़कर तुम्हारा कुरता लेना चाहता है उसे अपनी चादर भी ले लेने दो।’’ फादर ने इस देषणा का शब्दशः पालन किया। सत्ता उन्हें गिरफ्तार कर जेल की सजा देना चाहती थी, उन्होंने कुरते के बदले चादर यानी सजा का इंतजार किए बिना अपनी जान दे दी। शायद सत्ता सीन समुदाय को इससे थोड़ा चैन मिलेगा | उन्हें अपनी जीत का अहसास होगा। जबकि वास्तविकता यह है कि फादर की मृत्यु भारतीय सत्ता व शक्ति प्रतिष्ठान, पुलिस प्रशासन, कानून, संविधान और समाज की सामूहिक हार है। एक अकेले 84 वर्षीय व्यक्ति जिसके हाथ कांपते हों, सुनाई नहीं देता हो, जो ठीक से चल भी नहीं सकता हो, वह कितना शक्तिशाली हो सकता है, फादर इसकी जीवंत मिसाल हैं। पूरा भारतीय गणतंत्र आज हतप्रभ है। और क्यों न हो। यहां न्यायालय को उन्हें सिपर (पानी पीने का बर्तन) व स्ट्रा उपलब्ध करवाने में दो महीने लगते हैं। एनआईए इसका विरोध करती है। न्यायालय तुरंत निर्णय करने की बजाए तारीख देता है। जबकि यह सुविधा जेल प्रशासन बिना किसी बाहरी अनुमति के स्वयं उपलब्ध करवा सकता था। इस बात पर भी गौर करिए न्यायालय को उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई में चार महीने लगते हैं। जबकि इसी वर्ष इसी मुकदमें में गौतम नवलखा की जमानत याचिका पर निर्णय देते हुए न्यायालय ने धारा 167 के अंतर्गत आरोपी को घर में ही निरुद्ध किये जाने संबंधी दिशानिर्देश जारी कर दिये थे और फादर उन पर खरे उतर रहे थे।

भारतीय संविधान की उद्देशिका, सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय, प्रतिष्ठा व अवसर की समानता के साथ व्यक्ति की गरिमा की बात दोहराती है। क्या फादर को यह सब मिला ? संविधान को अनुच्छेद 14 (मूल अधिकार) विधि (कानून) के समक्ष समता की बात करता है। इसी खंड का अनुच्छेद - 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण व निरायुध सम्मेलन का अधिकार देता है। और अनुच्छेद - 20 कहता है कि जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए उसे अपराधी न माना जाए। अनुच्छेद 21 प्राण व दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण का अधिकार देता है और अनुच्छेद 22 कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण देता है यहां अनुच्छेद 21 पर पुनः गौर करिए, इसमें कहा है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण का दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं। परंतु क्या इस मामले में ऐसा हुआ ? जवाब आपके पास ही है।

इधर भारत में लगातार बिस्व (विश्व) रिकार्ड बनाने की होड़ मच गई है। 84 वर्षीय फादर ऐसे संभवतः पहले व्यक्ति होंगे जिन्हें इतने कठोर कानून में निरुद्ध किया गया होगा। वे इस तरह से प्राण छोड़ने वाले भी पहले ही व्यक्ति होंगे। गौरतलब है यूएपीए व अन्य दमनकारी कानूनों में लोग 20-20 साल बिना अपराध सिद्ध हुए जेल में रहे और अंत में सबूतों के अभाव में छूट गए। भीमा कोरेगांव मामले में करीब दो वर्षों में चार्जशीट भी दाखिल नहीं हो पाई है। इस मामले में ऐसे तमाम लोग गिरफ्तार हैं, जिनका जीवन वंचितों को अधिकार दिलवाने में बीत गया है। ये सभी असाधारण प्रतिभाशाली लोग हैं। इनमें फादर अब कम हो गए हैं। इस पूरे मामले में एक और विरोधाभास नजर आता है। माओवादियों को तो नास्तिक माना जाता है उनकी वामपंथी विचारधारा के कारण। लेकिन फादर तो जबरदस्त आस्तिक रहे और ईसाई धर्म के दीक्षित पुजारी रहे। तो यह उत्तर-दक्षिण या पूर्व-पश्चिम का मेल कैसे संभव हो पाया? इसका दूसरा आशय यह निकाला जा सकता है कि वंचितों के लिए कार्य करने वाले अपने वैचारिक मतभेद तक भुला देते है।

पवित्र बाइबिल में ईसा मसीह कहते हैं, ‘‘तुम लोगों ने सुना है कि कहा गया है, ‘अपने पड़ौसी से प्रेम करो और अपने बैरी से बैर।’ पंरतु मैं तुमसे कहता हूँ - अपने शत्रुओं से प्रेम करो और जो तुम पर अत्याचार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।’’ जेल में और अदालत में जो कुछ भी फादर ने कहा है वह उपरोक्त कथन पर पूरी तरह से लागू होता है। उन्होंने किसी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला सिवाय इस बात के कि मुझे गलत फंसाया जा रहा है। बाइबिल कहती है, ‘‘यदि तुम उन्हीं से प्रेम करते हो, जो तुमसे प्रेम करते हैं, तो पुरस्कार का दावा कैसे कर सकते हो।’’

परंतु भारतीय शासन तंत्र तो जैसे असहमति के खिलाफ किसी निर्णायक युद्ध का फैसला कर चुका है। हम रोज सुन रहे हैं कि लोग वर्षों तक जेल में रहने के बाद बिना सजा के छूट रहे हैं और उनका जीवन नष्ट हो जाता है। जम्मू कश्मीर में असहमत राजनीतिज्ञों में से कई अपने घरों में नजरबंद रहे तो कई भारत के अन्य हिस्सों में जेलों में बंद हैं। किसी व्यक्ति के जीवन के स्वर्णिम वर्षों को नष्ट करने का खामियाजा भी अंततः पीड़ित ही भुगतता है और पुलिस व अन्य अधिकारी लगातार पदोन्नत होते जाते हैं। वे लाखों रु. वेतन के रूप में पाते हैं और हजारों रु. पेंशन का | जबकि गलत तरीके से फंसाया गया व्यक्ति बर्बाद हो जाता है और उसे शासन किसी तरह का मुआवजा भी नहीं देता। राहत इंदौरी लिखते हैं,

ये वो शहर है जहां राक्षस भी रहते हैं, हर एक तराशे हुए बुत को देवता न कह।                                                                               फादर की मृत्यु ने भारतीय लोकतंत्र में एक नए अध्याय की शुरुआत की है। अब यह देश भर के संघर्षरत समुदाय पर है कि वे किस तरह एकजुट होकर इस दानवी आपदा का मुकाबला करते हैं। वस्तुतः कोई भी राजनीतिक विचारधारा या दल खुलकर इस मामले में सामने आएगा, इस बात में संदेह है। कांग्रेस ने पिछले आम चुनाव में अपने घोषणापत्र में देशद्रोह वाली धारा को हटाने की बात की थी। उसने टाडा व पोटा को हटाने का साहस भी दिखाया था, क्या अब वह इन दमनकारी कानूनों के खिलाफ पूरी तरह से सामने आने का साहस कर पाएगी? कहना कठिन है। परंतु उच्च नेतृत्व की इस घटना को लेकर आई प्रतिक्रियाएं आशा तो जगाती हैं। भारत का वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य बेहद डरावना है और इसमें वैचारिक स्पष्टता की कमी लगातार बढ़ती जा रही हैं | पूरी राजनीति सिर्फ चुनाव के इर्दगिर्द केंद्रित हो गई है और इसमें सामाजिक कल्याण की भावना कमोवेश तिरोहित हो गई है।

अंत में फादर को श्रद्धांजलि देते हुए पवित्र बाइबिल की कुछ पंक्तियां, ‘‘मैं तुमसे कहता हूँ - मांगो और दिया जाएगा ; ढूंढो और तुम्हें मिल जाएगा ; खटखटाओं और तुम्हारे लिए खोला जाएगा। क्योंकि जो मांगता है, उसे दिया जाता है या जो ढूंढता है उसे मिल जाता है और जो खटखटाता है उसके लिए खोला जाता है।’’ इसलिए हमें अब उठ खड़ा होना होगा। साथ ही अपने अंदर के डर पर काबू पाना होगा। हमारी कोशिश होनी चाहिए फादर का महाप्रयाण व्यर्थ न जाए।