MP में बढ़ा बिना चर्चा कानून बनाने का ट्रेंड, BJP की सत्ता वापसी के बाद 89 घंटे में पास हो गए 74 विधेयक

मार्च 2020 से लेकर अगस्त 2021 तक बीजेपी शासित मध्य प्रदेश में सत्तापक्ष ने 89 घंटे में पारित किया 74 विधेयक, मौत की सजा से जुड़ा विधेयक पास करने में लगे सिर्फ दो मिनट

Updated: Dec 25, 2021, 02:48 PM IST

MP में बढ़ा बिना चर्चा कानून बनाने का ट्रेंड, BJP की सत्ता वापसी के बाद 89 घंटे में पास हो गए 74 विधेयक

भोपाल। मध्य प्रदेश विधानसभा का पांच दिवसीय शीतकालीन सत्र शुक्रवार को समाप्त हो गया। इस सत्र के चौथे दिन 'मध्य प्रदेश लोक एवं निजी संपत्ति को नुकसान का निवारण एवं नुकसान की वसूली विधेयक 2021' ध्वनिमत से पारित किया गया। विधानसभा में इस विवादास्पद बिल को पास करते वक़्त कोई चर्चा तक नहीं हुई। यह हैरान करने वाला जरूर है पर कोई नई बात नहीं है, क्योंकि बीते कुछ समय से यह मध्य प्रदेश विधानसभा का ट्रेंड बना गया है।

सदन के भीतर सत्ता की मनमानी को विधानसभा के आंकड़ों से स्पष्ट समझा जा सकता है। विधानसभा के रिकॉर्ड के मुताबिक मार्च 2020 से लेकर अगस्त 2021 बीच करीब 74 विधेयक पारित हुए। जबकि इस दौरान महज 89 घंटे ही सदन की कार्रवाई हुई। यानी एक कानून को पास होने में औसत 1 घंटे से थोड़ा ज्यादा समय लगा। इस दौरान कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए जिनमें सजा ए मौत तक के प्रावधान थे।

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उदाहरण के तौर पर मॉनसून सत्र के दौरान 10 अगस्त 2021 को आबकारी नीति में सुधार से संबंधित बिल पास हुआ। इनमें आजीवन कारावास से लेकर सजा ए मौत और 20 लाख रुपए फाइन तक के प्रावधान थे। विधानसभा रिकॉर्ड के मुताबिक इस बिल के साथ चार अन्य बिलों को महज पांच मिनट से भी कम समय में पारित कराया गया।अमूमन विवादास्पद बिलों को गहन चर्चा के बाद पास कराने का रिवाज मध्य प्रदेश विधानसभा से अब लगभग खत्म सा होता जा रहा है।

बिना चर्चा कानून पास कराने का यह ट्रेंड तब से अधिक बढ़ा है जब कमलनाथ सरकार गिराकर शिवराज सिंह चौहान की दोबारा सत्ता में वापसी हुई। खुद बीजेपी विधायक व मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके सीताशरण शर्मा का कहना है विधानसभा में चर्चा के बगैर विधेयकों को पारित कराने का हालिया ट्रेंड लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। 

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विधानसभा की परंपराओं के अनुसार किसी कानून को लागू करने के तीन स्टेज होते हैं। पहले सदन में उसके प्रावधानों को रखा जाता है, फिर उसपर गहन चर्चा होती है और तब अधिकांश सदस्यों की सहमति के साथ उसे लागू किया जाता है। विधानसभा में चर्चा के माध्यम से यह जानने की कोशिश होती है कि किसी भी बिल का आम नागरिकों के जीवन पर क्या असर होगा और इससे जुड़ी भविष्य की सभी संभावनाओं पर विचार होता है। हालांकि, बीते डेढ़ साल में इस परंपरा को दरकिनार करने के अनेक उदाहरण देखने को मिले हैं जब कानून के अच्छे–बुरे पहलुओं पर कोई चर्चा नहीं हुई।

कांग्रेस के सीनियर प्रवक्ता केके मिश्रा ने कहा कि सत्तापक्ष नहीं चाहता है कि विपक्ष किसी भी विधेयक की आलोचना करे इसलिए बहस नहीं होने देता। मिश्रा ने ये भी आरोप लगाया कि यदि कोई आलोचना करता है तो गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा उसे सदन के भीतर धमकाने लगते हैं। मामले पर विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम का कहना है कि वे हमेशा सदन के भीतर चर्चा और विमर्श के पक्ष में रहते हैं, लेकिन ये समझने की जरूरत है कि कौन लोग व्यवधान डालते हैं। गौतम का इशारा विपक्षी सदस्यों की ओर था।

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विधानसभा के एक उच्च पदस्थ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पिछले कुछ दशकों का डेटा यह बताता है कि कांग्रेस सरकार में सदन की कार्यवाही ठीक से चलती है। उन्होंने बताया कि 80 के दशक में बीजेपी के सुंदरलाल पटवा जब विपक्ष में थे तब वे अधिक सत्र की मांग करते थे लेकिन 1990 मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने सत्र को छोटा रखना शुरू कर दिया। सन 1993 में जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बनें तो 2003 तक उनके कार्यकाल में भी ज्यादा सत्र हुए। सिंह के 10 साल के मुकाबले बीजेपी के 17 वर्षों में सत्र की अवधि कम हुई है। उन्होंने इसका कारण बताया कि बीजेपी आलोचना को सकारात्मक रूप से नहीं लेती है।